सोनभद्र अपनों की सरकार में आदिवासियों की उपेक्षा मंत्री-विधायकों की फौज, फिर भी लकड़ी के मेड़ पर टिकी 50 परिवारों की जिंदगी

अपनों की सरकार में आदिवासियों की उपेक्षा मंत्री-विधायकों की फौज, फिर भी लकड़ी के मेड़ पर टिकी 50 परिवारों की जिंदगी

सोनभद्र अपनों की सरकार में आदिवासियों की उपेक्षा मंत्री-विधायकों की फौज, फिर भी लकड़ी के मेड़ पर टिकी 50 परिवारों की जिंदगी

अजित सिंह / राजेश तिवारी ( ब्यूरो रिपोर्ट) 

सोनभद्र / उत्तर प्रदेश-

 एक ओर भारत डिजिटल इंडिया और अमृत काल के भव्य नारों के साथ वैश्विक पटल पर अपनी धमक जमा रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश के ऊर्जांचल जिले सोनभद्र से आई एक तस्वीर इन दावों की कड़वी हकीकत बयां कर रही है।आजादी के 78 साल बाद भी जनपद के चोपन विकास खण्ड का कोटा ग्राम सभा के छीकराडांण अंतर्गत पटीहिवा टोला के करीब 50 आदिवासी परिवार आज भी एक अदद पुलिया के लिए तरस रहे हैं।

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ग्रामीण अपनी जान जोखिम में डालकर नाला पार करने के लिए लकड़ी के अस्थाई और जर्जर मेड़ (पुल) का सहारा लेने को मजबूर हैं। सोनभद्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ चार विधायक, एक सांसद और सरकार में कल्याण समाज स्तर के मंत्री होने के बावजूद धरातल पर विकास की गति थमी हुई है। ग्रामीणों का आक्रोश विशेष रूप से प्रदेश के समाज कल्याण मंत्री संजीव सिंह गौड़ के प्रति है, जो स्वयं इसी आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं।

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ग्रामीणों का सवाल है कि जब मंत्री स्वयं उनके समाज से हैं, तो उनके अपने ही लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए क्यों भटक रहे हैं। स्थानीय लोगों ने तीखा सवाल उठाया है कि आखिर विधायक निधि और सांसद निधि का बजट कहाँ खर्च हो रहा है। जिला मुख्यालय से मात्र 45 किमी की दूरी पर आदिवासियों की यह बदहाली जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। पुलिया न होने का सबसे अमानवीय पहलू स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता है। पटीहिवा टोला के निवासियों ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया सड़क और पुल के अभाव में एंबुलेंस टोले तक नहीं आ पाती।

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गंभीर मरीजों और गर्भवती महिलाओं को चारपाई पर लादकर उफनते नाले के बीच से पार ले जाना पड़ता है। मानसून के दौरान नाला उफान पर होते ही ये 50 परिवार पूरी दुनिया से कट जाते हैं। संपर्क टूटने के कारण आपातकालीन स्थिति में ये ग्रामीण भगवान भरोसे होते हैं। मासूम बच्चे हर दिन अपनी जान हथेली पर रखकर इस लकड़ी के मेड़ को पार करते हैं। एक छोटी सी चूक यहाँ बड़ी दुर्घटना को आमंत्रण दे सकती है।

स्थानीय निवासी रामशरण ने बताया कि पिछले सात दशकों में कई प्रधान आए और गए, बड़े-बड़े वादे किए गए, लेकिन धरातल पर एक ईंट तक नहीं लगी। ग्रामीणों ने वर्तमान प्रधान पहलाद चेरो पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वे समस्या से पूरी तरह अवगत हैं, लेकिन इसके बावजूद आज तक टोले का हाल जानने नहीं आए। पुलिया न होने के कारण निर्माण सामग्री (ईंट, सीमेंट, बालू) ले जाने वाले वाहन टोले के अंदर नहीं जा सकते। इसका सीधा असर प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी कल्याणकारी स्कीमों पर पड़ रहा है। वाहन न पहुँच पाने के कारण गरीब ग्रामीण अपने स्वीकृत कच्चे घरों को पक्का बनाने में भी असमर्थ हैं।

यह केवल एक पुलिया का निर्माण नहीं, बल्कि उस भरोसे की बहाली का सवाल है जो आदिवासियों ने अपनी जाति के मंत्रियों और क्षेत्र के विधायकों पर जताया था। समाज कल्याण मंत्री के गृह जनपद में आदिवासियों का लकड़ी के पुल पर चलना लोकतंत्र के लिए एक बड़ी विडंबना है। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन और सरकार इन 50 परिवारों की सुध लेती है या इन्हें फिर से उन्हीं जर्जर लकड़ियों के सहारे छोड़ दिया जाएगा।

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