“मराठा आरक्षण और मनोज जरांगे का संघर्ष”

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महाराष्ट्र की राजनीति और समाज में पिछले कई महीनों से जिस मुद्दे ने सबसे अधिक हलचल मचाई हुई थी, वह मराठा आरक्षण का सवाल है। इसी संदर्भ में मराठा समाज के नेता और कार्यकर्ता मनोज जरांगे पाटिल ने एक बार फिर आमरण अनशन का रास्ता चुना। मुंबई के आज़ाद मैदान में उन्होंने लगातार पांच दिनों तक भूख हड़ताल की। उनका यह आंदोलन न केवल मराठा समाज की चिंताओं और अधिकारों का प्रतीक बना बल्कि महाराष्ट्र सरकार और न्यायपालिका के सामने भी एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरा। 29 अगस्त से शुरू हुआ उनका अनशन आज निर्णायक मोड़ पर पहुंचा जब सरकार ने उनकी आठ में से छह मांगें मान लीं और मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल ने स्वयं उन्हें जूस पिलाकर अनशन तुड़वाया। इस घटना ने मराठा आरक्षण आंदोलन को नई दिशा दी है और भविष्य की राजनीति पर भी गहरा असर डालने की संभावना पैदा कर दी है।

 

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मनोज जरांगे की मांगों में सबसे प्रमुख मुद्दा सभी मराठाओं को कुणबी प्रमाणपत्र देने का था। कुणबी जाति ओबीसी आरक्षण में शामिल है और मराठा समाज लंबे समय से यही मांग कर रहा है कि उन्हें भी इसी श्रेणी में मान्यता दी जाए। जरांगे का कहना था कि ऐतिहासिक दस्तावेज़, गजट और पुराने रेकॉर्ड इस बात की पुष्टि करते हैं कि मराठा और कुणबी समाज आपस में जुड़े हुए हैं। उनकी दूसरी अहम मांग थी कि हैदराबाद, सतारा और औंध रियासतों के गजट्स को लागू किया जाए, क्योंकि इन गजट्स में मराठाओं को कुणबी के तौर पर दर्ज किया गया है। इसके अलावा आंदोलनकारियों पर दर्ज आपराधिक मामलों को वापस लेने, आंदोलन में शहीद हुए लोगों के परिवारों को आर्थिक सहायता और सरकारी नौकरी देने, 58 लाख कुणबी नोंदी ग्राम पंचायत स्तर पर चिपकाने, और वंशवली समिति को अधिक समय और कार्यालय देने जैसी मांगें भी उन्होंने रखीं।

 

सरकार ने इनमें से छह मांगों को मान लिया। हैदराबाद गजट लागू करने का निर्णय लिया गया, सतारा और औंध गजट्स की प्रक्रिया भी शुरू करने पर सहमति बनी, आंदोलनकारियों पर दर्ज केस वापस लेने का आश्वासन दिया गया, आंदोलन में मारे गए लोगों के परिवारों को पंद्रह करोड़ रुपये और पात्रता अनुसार नौकरी देने का वादा किया गया, ग्राम पंचायत स्तर पर कुणबी नोंदी चिपकाने की प्रक्रिया जल्द शुरू करने का भरोसा दिया गया और वंशवली समिति को कार्यालय व कार्यावधि बढ़ाने पर भी सहमति बन गई। हालांकि, दो बड़ी मांगें अब भी अधूरी हैं। इनमें पहली है मराठा-कुणबी एक का सरकारी आदेश जारी करना और दूसरी है सगे-सोयरे प्रमाणपत्र की जांच प्रक्रिया को अंतिम रूप देना। सरकार ने इन पर केवल यह कहा कि प्रक्रिया जारी है और जल्द निर्णय होगा।

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जरांगे ने अपने समर्थकों के बीच इसे जीत बताया और कहा कि आंदोलन ने अपना मकसद पूरा किया है। उन्होंने साफ कहा कि जब तक सरकार मराठा-कुणबी एक का जीआर जारी नहीं करती, तब तक आंदोलन पूरी तरह खत्म नहीं माना जाएगा। उन्होंने सरकार को इसके लिए दो महीने का अल्टीमेटम भी दिया। उनका कहना था कि अगर जीआर जारी हो जाता है तो वे उसी रात मुंबई छोड़ देंगे। यह बयान एक ओर आंदोलनकारियों के लिए राहत भरा था तो दूसरी ओर सरकार के लिए एक चेतावनी भी थी।

 

इस आंदोलन के दौरान बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी हस्तक्षेप किया। कोर्ट ने आदेश दिया था कि आज़ाद मैदान को खाली किया जाए और सामान्य स्थिति बहाल की जाए। पुलिस जब इसे लागू कराने पहुंची तो समर्थकों और पुलिस में बहस हुई, लेकिन जरांगे ने अपने अनुयायियों से अपील की कि वे किसी तरह की हिंसा या अव्यवस्था न करें। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आंदोलन जनता के लिए है और आम लोगों को परेशानी नहीं होनी चाहिए। इसके बावजूद उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर उन्हें जबरन हटाया गया या गिरफ्तार किया गया तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। इस संतुलित रुख ने एक तरफ आंदोलन की शांति बनाए रखी और दूसरी तरफ सरकार पर दबाव भी बनाया।

 

मंत्रियों के समूह ने जरांगे को लिखित में आश्वासन दिया और वचन दिया कि आंदोलनकारियों पर दर्ज मामलों को वापस लिया जाएगा तथा गजट्स को कानूनी मान्यता दिलाई जाएगी। कैबिनेट मंत्री शिवेंद्र राजे भोंसले ने तो यहां तक कहा कि सतारा गजट को लागू करना उनका व्यक्तिगत वचन है। यह गजट मराठा को कुणबी शब्द से जोड़ता है, जिससे आरक्षण की मांग को मजबूती मिलती है। इसी तरह राधाकृष्ण विखे पाटिल ने भी कहा कि हैदराबाद गजट को लागू करने की दिशा में तुरंत कदम उठाए जाएंगे।

 

मराठा आंदोलन का यह अध्याय केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र की राजनीति और समाज की जटिलताओं का भी आईना है। यह आंदोलन दिखाता है कि समाज का बड़ा वर्ग अपने अधिकारों के लिए किस हद तक जाने को तैयार है। हजारों लोग मुंबई में इकट्ठा हुए, सैकड़ों ने उपवास किया और कई परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया भी। इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट किया कि जब तक आरक्षण के मुद्दे पर ठोस और स्थायी समाधान नहीं निकलता, तब तक ऐसी परिस्थितियाँ बार-बार पैदा होती रहेंगी।

 

अब सवाल यह है कि सरकार अगले दो महीनों में क्या करती है। क्या वह मराठा-कुणबी एक का जीआर जारी कर पाती है या फिर यह मुद्दा दोबारा सड़कों पर उतरता है? राजनीतिक दलों के लिए भी यह परीक्षा की घड़ी है क्योंकि मराठा समाज महाराष्ट्र की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। सरकार की ओर से दी गई आर्थिक सहायता और नौकरियों का वादा अगर समय पर पूरा नहीं हुआ तो भरोसे का संकट गहरा सकता है। वहीं, अगर सरकार ने तेजी से ठोस कदम उठाए तो यह राज्य की राजनीति में स्थिरता ला सकता है।

 

इस आंदोलन का एक और बड़ा पहलू यह रहा कि जरांगे पाटिल ने हमेशा शांति और अहिंसा का संदेश दिया। उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि किसी भी हाल में जनता को कष्ट न पहुंचे। उनकी यह अपील आंदोलन को वैधता और नैतिक शक्ति देती है। अनशन के दौरान उनका स्वास्थ्य बिगड़ रहा था, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और अंततः सरकार को झुकना पड़ा। यह बात मराठा समाज की भावनाओं को गहराई से छूती है और आने वाले समय में जरांगे पाटिल की लोकप्रियता और राजनीतिक महत्व को और बढ़ा सकती है।

 

अंततः यह कहा जा सकता है कि मनोज जरांगे का अनशन और सरकार का झुकाव महाराष्ट्र के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है। छह मांगों का स्वीकार होना आंदोलन की सफलता है लेकिन दो मांगों के अधूरे रहने से संघर्ष की संभावना भी बनी हुई है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ को अनदेखा नहीं किया जा सकता। जब समाज का एक बड़ा तबका संगठित होकर अपनी बात रखता है तो सरकार को सुनना ही पड़ता है। अब आने वाला समय ही बताएगा कि सरकार अपने वादों पर कितनी गंभीरता से अमल करती है और मराठा समाज की आकांक्षाओं को कितना न्याय मिलता है।

 

- महेन्द्र तिवारी

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