संभल से इम्फाल तक हिंसा की एक ही बीमारी

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उत्तर प्रदेश में संभल हिंसा की आग में जल रहा है।  हिंसा में 4  लोग मारे जा चुके हैं। मणिपुर में हिंसा का जघन्य  रूप सामने है लेकिन सरकार महारष्ट्र में जीत का जश्न मना रही है।  उत्तर प्रदेश में सरकार और सरकारी पार्टी के लोग मस्जिदों के नीचे दबे मंदिरों को खोजने की सनक में गड़े मुर्दे उखाड़ने से पीछे नहीं हैट rah।  वैसे भी उसका नारा है ' बटोगे तो कटोगे ' का है।  महारष्ट्र के विधानसभा चुनाव ने समाज को एक नहीं किया बल्कि बाँट दिया है। ये बँटवारा मणिपुर में पूरी तरह हो चुका है और उत्तर प्रदेश में जारी  है।  उत्तर प्रदेश  बहराइच से होता हुआ साम्भल तक आ पहुंचा है।

मणिपुर और संभल की बीमारी एक जैसी है ,लेकिन उसका इलाज अलग-अलग तरीके  से किया जा रहा है।  उत्तर प्रदेश में सरकार और सरकार संरक्षित लोग / संस्थाएं जामा मस्जिद की जामा तलाशी लेने के लिए अदालती आदेशों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण महकमे का सहारा ले रही है।  ये काम अयोध्या की बाबरी मस्जिद से शुरू हुआ था और आज तक जारी है। कभी ज्ञानवापी के रूप में तो कभी संभल   के रूप में। ये घृणित कोशिश उत्तराखंड में भी हुई और देश के दूसरे हिस्सों में भी। देश में लोगों के पास महंगाई के खिलाफ लड़ने का माद्दा नहीं है। लोग बेरोजगारी के खिलाफ नहीं लड़ सकते, महिला हिंसा के खिलाफ खड़े नहीं  हो सकते ।  भूख-गरीबी के खिलाफ एकजुट होकर अदालतों के चक्कर नहीं काट सकते,  लेकिन जामा मस्जिद की जामा तलाशी के लिए अदालतों के चक्कर काटने की फुरसत उन्हें है।

देश में स्पष्ट क़ानून है कि आजादी के बाद जिन पूजा स्थलों की जो स्थिति है उसमें कोई छेड़छाड़ नहीं होगी, किन्तु  देश की अदालतों को इस कानून से शायद कोई लेना-देना नहीं है। वे कभी भी ,किसी को भी किसी भी मस्जिद का सर्वे करने का आदेश दे सकतीं हैं। अदालतों   को भी सियासत और सत्ता की तरह गड़े मुर्दे उखाड़ने में मजा आता है शायद। अन्यथा क्या जरूरत है किसी मस्जिद की जड़ें खोदने की? माना कि अतीत में किसी मस्जिद को, किसी मंदिर को जमीदोज कर बनाया गया होगा, लेकिन क्या आज फिर वो ही गलती जानबूझकर दोहराये जाने की जरूरत है?

महाराष्ट्र विधान सभाचुनावों में मिली प्रचंड जीत ने भाजपा और उसके अनुसांगिक  संगठनों का हौसला और बढ़ा दिया है। वे हर कीमत पर अल्पससंख्य्क  समाज को सबक सिखाना चाहते हैं और इसी का नतीजा बहराइच और संभल   की हिंसा है। सरकार और सरकारी लोगों को रोज-रोज ये नाटक करने के बजाय एक बार में देश की तमाम मस्जिदों के सर्वेक्षण का आदेश अदालत से हासिल कर लेना चाहिए।  आपको शायद पता न हो इसलिए मै बता दूँ कि देश में एक -दो नहीं कोई 6 लाख  छोटी-बड़ी मस्जिदें है। इनमें से अधिकांश के नाम जामा मस्जिद हैं। क्या सरकार इन सबका सर्वे करा सकती ही? मेरे ख्याल से सरकार को वक्फ बोर्ड क़ानून में संशोधन करने के इन लाखों मस्जिदों का सर्वेक्षण करने के लिए एक विधेयक लाना चाहिए।

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उत्तर प्रदेश में जो काम 5 -6  दिसंबर 1992  को अयोध्या  से शुरू हुआ था वो काम आज भी जारी है।  कभी ज्ञानवापी   के रूप में कभी संभल के रूप में तो कभी उत्तराखंड की किसी मस्जिद केो तोड़ने के रूप में। सरकार देश को धर्मनिरपेक्ष नहीं देखना चाहती ।  सरकार का एजेंडा देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने का है ,इसलिए बेहतर हो कि केंद्र सरकार एक क़ानून लेकर पहले देश को मस्जिद विहीन करे ,बाद में देश को हिन्दू राष्ट्र बनाये। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी। देश के 20  करोड़ से ज्यादा मुसलमानों को भी हिंदुस्तान से बेदखल कर दुनिया के तमाम मुस्लिम राष्ट्रों में तकसीम कर देना चाहिए।  सरकार ये कर सकती है।  सरकार के तमाम मुस्लिम देशों से मैत्रीपूर्ण रिश्ते भी हैं। लेकिन सरकार ऐसा कर नहीं पायेगी।

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इस समय देश एक कठिन दौर से गुजर रहा है। डेढ़ साल से मणिपुर यदि जल रहा है तो केवल केंद्र और राज्य सरकार की नाकामी की वजह से।  मणिपुर में धार्मिक स्थलों को जिस तरह से तबाह किया गया है उसकी कोई मिसाल हमारे इतिहास में नहीं मिलती।  क्या भविष्य में मणिपुर की तरह उत्तर प्रदेश या दूसरे सूबों में दूसरे  धर्म के पूजा स्थलों को आग के हवाले किया जाएगा ? क्या उनकी नीवों को सर्वे के नाम पर खोदा जाएगा ? क्या जानबूझकर वक्फ बोर्ड कानून में संशोधन की कोशिश की जाएगी ? ये ऐसे तमाम सवाल हैं जिनके उत्तर इस देश के अल्पसंख्यक ही  बल्कि बहुसंख्यक समाज को भी चाहिए।  

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संसद का शीत सत्र शुरू हो चुका है।  देखना ये है कि संसद में देश की भलाई के लिए कोई काम होता है या फिर संसद हिन्दू-मुसलमान करती रह जाएगी। ये देश इस मामले में बदनसीब है कि इसे आजादी के पहले भी साम्प्रदायिक हिंसा की आएग में जलना पड़ा और आजादी के 77  साल बाद   भी यहां बहराइच और संभल काण्ड हो रहे हैं। सांप्रादियक हिंसा से ग्रस्त इलाकों में शान्ति स्थापना केलिए हमारे पास सशस्त्र बल हैं,बंदूकें हैं, आंसू गैस के गोले  हैं,लाठियां हैं लेकिन कोई गांधी नहीं है  जो वहां जाकर उपवास कर सके।

लोगों से शांति की अपील कर सके। हमारे पास आज गांधी जी नहीं ,मोदी जी हैं और  मोदी जी  संभल जाने से रहे, उन्हें उपवास करना आता ही कहाँ है / वे तो हिमालय की कंदराओं में ध्यान लगा सकते हैं। उन्हें तो  डेढ़ साल से धधक रहे मणिपुर जाने की फुरसत नहीं है। हे भगवान इस देश की रक्षा कीजिये।

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