राजनीति के उस पार की रणनीति

राजनीति के उस पार की रणनीति

देश में लोकसभा चुनाव के चार चरण पूरे हो चुके हैं पांचवें चरण के लिए 20 मई को मतदान होगा। हर राजनैतिक दल के अपने अपने दावे हैं। कोई कह रहा है अबकी बार चार सौ पार तो कोई कह रहा है लिख कर लेलो 4 जून के बाद नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बनने वाले। कोई बोल रहा है यूपी में अस्सी में से अस्सी तो कोई कह रहा है अस्सी में से उन्यासी। आखिर इस तरह के दावे क्यों किये जाते हैं और क्या होता है इनके पीछे का मकसद। दरअसल इस तरह से जनता के ऊपर एक मानसिक दबाव बनाया जाता है।

कुछ समय पहले टेलीविजन पर एक्जिट पोल का कार्यक्रम चलता था। और उसमें सर्वे करने वाली कंपनियां मतगणना से पहले ही बता देती थीं कि किसकी सरकार बनने वाली है। लेकिन कभी कभी ही यह एक्जिट पोल सही साबित होते थे ज्यादातर सही आंकड़ों तक नहीं पहुंच पाते थे। फिर इसमें भी राजनीतिक प्रवेश कर गई। ये एक्जिट पोल वाली कंपनियां राजनैतिक दलों के इशारे पर काम करने लगीं। चुनाव आयोग के पास इनको लेकर शिकायतें पहुंची तब चुनाव आयोग ने इस पर संज्ञान लिया और एक्जिट पोल पर रोक लगा दी। आखिर पांच दस हजार के सैंपल पर आप पूरे चुनाव के नतीजों पर कैसे पहुंच सकते हैं।

जहां लाखों की संख्या में वोट पड़ते हैं। लेकिन सत्यता यह थी कि इससे मतदाताओं पर एक मानसिक दबाव बनाया जाता था कि किसकी सरकार बनने जा रही है। देश में आज भी बहुत सा मतदाता ऐसा है जो जीतते हुए को ही मतदान करना पसंद करता है। अगर प्रत्याशी हार गया तो वह समझता है कि हमारा वोट खराब हो गया। और इसी का फायदा यह राजनैतिक दल उठाते हैं।

 खैर इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है और न ही कोई शिकायत अब तक इस मुद्दे पर चुनाव आयोग तक पहुंची है क्योंकि ऐसा सभी दल करते हैं बाद में परिणाम क्या आयेगा इससे किसी को कोई मतलब नहीं। यह एक तरह से अपने पक्ष में में माहौल बनाने की प्रक्रिया है। इसलिए कोई अस्सी में से अस्सी और कोई अस्सी में से उन्यासी बोल रहा है। इसको ही कहते हैं जुमले बाजी। हालांकि जुमले बाजी को लेकर भारत में काफी लंबे समय तक बहस चली है लेकिन इसका अंत होता नहीं दिखाई दे रहा है।
 
अभी तक राजनैतिक दल सरकार बनने पर अपने चुनाव घोषणा पत्र को भी पूरी तरह से लागू नहीं कर पाते थे। लेकिन अब इससे अलग हटकर एक शब्द और आ गया है जुमले बाजी। लेकिन क्या यह उचित है। यह जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है। चूंकि इस तरह की जुमले बाजी की सभी राजनैतिक पार्टियां शिकार हैं तो इस पर चुनाव आयोग को भी कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या बिना शिकायत के चुनाव आयोग इस तरह की प्रतिक्रियाओं पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता।
 
लेकिन चुनाव के वायदे कभी पूरे नहीं होते यह अब जनता भी समझने लगी है। इसके अलावा आजकल एक ट्रेंड और चल रहा है और वह है एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप। अगर हम दूसरे को गलत सिद्ध कर देने में कामयाब हो जाते हैं तो हमें अपनी अच्छाइयों का बखान करने की आवश्यकता ही नहीं है।
 
 वर्तमान लोकसभा चुनाव में यही बात सबसे अधिक देखने को मिल रही है कि राजनैतिक पार्टियां अपने काम पर कम दूसरों की कमियों का बखान ज्यादा करती दिखाई दे रहीं हैं। ढूंढ ढूंढ कर एक दूसरे की कमियां निकाली जा रही हैं। और मतदाताओं को उन कमियों को लेकर ऐसे डराया जा रहा है कि यदि ये सत्ता में आ गए तो ऐसा करेंगे। धर्म जाति और सब कुछ आ गया है कि किसी तरह से हम मतदाताओं को रिझाने में कामयाब हो सकें। कोई मोहब्बत की दुकान चलाने निकला है तो कोई धर्म का वास्ता दे रहा है। और इन्हीं सब में बीच में पड़कर मतदाता गुमराह हो जाता है।
 
मतदाता भूल जाता है कि कोई हमारी ग़रीबी की बात नहीं कर रहा है, कोई मंहगाई की बात नहीं कर रहा है कोई रोजगार की बात नहीं कर रहा है कोई शिक्षा की बात नहीं कर रहा है और कोई भी स्वास्थ्य की बात नहीं कर रहा है। तो इस तरह से मतदाताओं के मन को डायवर्ट करने की कोशिश की जाती है। यह सब आम मतदाताओं की समझ से परे है। इस पर चुनाव आयोग कुछ भी नहीं बोल सकता क्योंकि जब सरकार बन जाती है तो वह अपने तरीके से ही कार्य करती है। चुनावों में वायदों की इतनी झड़ी लग जाती है कि शायद कोई भी सरकार अपने एक कार्यकाल में तो पूरा कर ही नहीं सकती। यह सब राजनैतिक रणनीति होती हैं जो कि जनता को सीधे अटैक करती हैं।
 
राजनैतिक दल कभी नहीं कहते कि हमको केवल पांच साल के लिए मौका दीजिए। क्यों कि वह भी जानते हैं कि हमने जितने वायदे जनता से कर दिए हैं वह कभी पांच साल में तो पूरे हो ही नहीं सकते। चुनाव के पीछे की रणनीतियां बहुत होती हैं और वह केवल राजनैतिक ज्ञानी ही जान सकते हैं कि किसी भी दल के कौन से वायदे पूरे होने हैं और कौन से नहीं। यदि आप केवल अमेठी संसदीय क्षेत्र को ही लेलें तो यह हमेशा से गांधी परिवार की सीट ही रही है। लेकिन अमेठी विकास से कोसों दूर रही।
 
पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को टक्कर देने के लिए अमेठी को चुना और जनता को दिखाया कि आपने हमेशा कांग्रेस को वोट किया लेकिन कांग्रेस ने आपके अमेठी के लिए क्या किया हम जीते तो अमेठी को ऐसा कर देंगे। मतदाताओं का मन बदला स्मृति ईरानी चुनाव जीत गईं लेकिन अमेठी आज भी वैसी ही है जैसी कि पहले थी और यही हाल देश के अधिकांश संसदीय क्षेत्रों का है। वायदे तो तमाम किये जाते हैं लेकिन जनप्रतिनिधि जीतने के बाद उस क्षेत्र में अपने पूरे कार्यकाल में पैर तक नहीं रखते। आखिर ऐसे जनप्रतिनिधियों पर जनता कब तक विश्वास करती रहेगी।
 
और यही कारण होता है कि जहां किसी जनप्रतिनिधि का ज्यादा विरोध होता है तो वहां पर एक नया प्रत्याशी खड़ा कर दिया जाता है और फिर वह भी पांच साल में एक बार भी जनता से नहीं मिल पाता है। उसको मतलब नहीं रहता कि जिस क्षेत्र की जनता ने उसे वोट देकर जिताया है वह किस हाल में जी रही है। और यही है राजनीति के पीछे का खेल। जो आम जनता नहीं समझ सकती।
 
           -- जितेन्द्र सिंह पत्रकार 

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