संकुचित व षड्यंत्रकारी चुनावी विमर्श अत्यंत चिंतनीय

संकुचित व षड्यंत्रकारी चुनावी विमर्श अत्यंत चिंतनीय

विगत चार दशकों से भारतीय जनता पार्टी भगवान राम के नाम पर राजनीति कर स्वयं को स्थापित करने की कोशिश करती रही है। आख़िरकार धार्मिक ध्रुवीकरण व राम मंदिर की राजनीति ने उसे केंद्रीय सत्ता में आने में मदद की और यह भाजपा का लोकप्रिय मुद्दा बन गया। अब वही भाजपा इससे भी दो क़दम आगे बढ़कर जहाँ सर्वव्यापी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को अपना निजी 'भगवान ' समझने लगी है वहीँ अपने विरोधी दलों को राम विरोधी तो राम द्रोही आदि प्रचारित कर रही है। इसी दल की एक सांसद यहाँ तक कह चुकी है कि जो हमारे साथ हैं वह रामज़ादे हैं और जो ख़िलाफ़ हैं वह 'हराम ज़ादे ' हैं। इसके साथ ही स्वयं बहुसंख्यकवाद की राजनीति करने वाली यही भाजपा अपने विरोधी दलों को अल्पसंख्यक परस्त व मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाले दलों के रूप में पूरे ज़ोर शोर से प्रचारित कर रही है। अपने इस 'अनैतिक' अभियान में वह वर्तमान चुनावी बेला में सार्वजनिक मंचों से जिन शब्दों व वाक्यों का इस्तेमाल कर रही है वह भारतीय राजनीति के इतिहास का अब तक का सबसे गिरा व निम्नस्तरीय चुनाव अभियान है। यह इस बात का भी परिचायक है कि अबकी बार चार सौ पार का हवाई नारा देने वाली भाजपा व इसके शीर्ष नेता समझ चुके हैं कि जनता अब उनके विघटनकारी मंसूबों को समझ चुकी है। और 400 पार की बात तो दूर इस बार तो उनकी सत्ता में वापसी पर भी प्रश्न चिन्ह लग चुका है।  
 
ग़ौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर अयोध्या स्थित विवादित मंदिर मस्जिद मुक़ददमे का निर्णय सुनाया गया। इसी फ़ैसले में केंद्र सरकार से एक ट्रस्ट बनाकर मंदिर निर्माण करने को कहा गया। यहाँ यह भी क़ाबिल-ए-ग़ौर है कि मंदिर-मस्जिद अदालती वाद परिवाद में मुद्दई के रूप में न तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ था न विश्व हिन्दू परिषद् न ही भाजपा। परन्तु केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली एन डी ए सरकार होने के नाते बड़ी ही चतुराई से ट्रस्ट के गठन से लेकर मंदिर निर्माण व उद्घाटन तक के इस पूरे प्रकरण का भाजपा द्वारा 'निजीकरण ' कर लिया गया। यहाँ तक कि 22 जनवरी 2024 को हुये मंदिर उद्घाटन के दौरान इसके प्राण प्रतिष्ठा के धार्मिक विधि विधान सम्बन्धी तौर तरीक़ों व समय को लेकर देश के चारों शंकराचार्यों सहित तमाम संतों महंतों द्वारा इसका कितना तार्किक विरोध किया गया। परन्तु उन सब की अनसुनी कर दी गयी। और मंदिर ट्रस्ट से लेकर इसके उद्घाटन तक को पूर्णतः भाजपाई इवेंट के रूप में पेश किया गया। और अब उसी आधार पर यह कहकर वोट माँगा जा रहा है कि 'जो राम को लाये हैं हम उनको लाएंगे'। 
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 देश के चारों शंकराचार्य ही नहीं बल्कि हज़ारों वरिष्ठ संतों ने तथा भाजपा विरोधी दलों ने यह बख़ूबी समझ लिया था कि ट्रस्ट गठन से लेकर प्राणप्रतिष्ठा तक का पूरा कार्यक्रम पूरी तरह राजनैतिक व अनैतिक है। इसी लिये जहां शंकराचार्यों ने इस आयोजन में शिरकत नहीं की वहीँ विपक्षी दलों के नेताओं ने भी 22 जनवरी के इस 'राजनैतिक आयोजन ' से दूरी बनाये रखी। इतना ही नहीं बल्कि कई प्रमुख केंद्रीय मंत्री व भाजपाई मुख्यमंत्री भी अभी तक अयोध्या के नवनिर्मित मंदिर दर्शन करने नहीं गए हैं। परन्तु भाजपा के निशाने पर केवल कांग्रेस व इंडिया गठबंधन के नेता हैं। भाजपा इसे लेकर ऐसे ऐसे दुष्प्रचार कर रही है ताकि वह किसी तरह कांग्रेस व इंडिया गठबंधन के अन्य दलों व उनके नेताओं को राम विरोधी साबित कर सके। अफ़सोस की बात तो यह है कि कल के धर्मनिर्पेक्षतावादी जो आज भगवा रंग में रंग रहे हैं उनसे भी भाजपा यही कहलवा रही है कि कांग्रेस राम विरोधी है। और कांग्रेस अयोध्या मंदिर दर्शन करने का विरोध करती है।  
 
जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। कांग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेट अयोध्या दर्शन करने जा चुकी हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय रॉय पूरी उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के साथ राम मंदिर जा चुके। सांसद दीपेंद्र हुडा , छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जेसे तमाम कांग्रेस नेता 22 जनवरी के बाद अयोध्या जा चुके हैं। परन्तु कांग्रेस आला कमान ने किसी नेता से इस विषय पर कोई सवाल नहीं किया। क्योंकि कांग्रेस शुरू से यही मानती आ रही है कि धर्म व धर्म पालना किसी भी व्यक्ति का आस्था सम्बन्धी अत्यंत निजी विषय है। इसकी पालना करने या न करने का प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी अधिकार है। कांग्रेस ने न तो कभी राम के नाम पर वोट माँगा न ही राम के विरोध के नाम पर। परन्तु दुष्प्रचार की इंतेहा यह कि नरेंद्र मोदी स्वयं यह कह रहे हैं कि मैं  'लोकसभा चुनाव में 400 सीट इसलिए जीतना चाहता हूं कि ताकि कांग्रेस अयोध्या में राम मंदिर पर बाबरी ताला ना लगा दे। कांग्रेस की चली तो कांग्रेस कहेगी कि भारत में जीने का पहला हक भी उसके वोट बैंक (मुसलमानों) का है। लेकिन जब तक मोदी ज़िंदा है, नक़ली सेक्युलरिज़्म के नाम पर भारत की  पहचान मिटाने की कोई भी कोशिश मोदी सफल नहीं होने देगा, और ये हज़ारों वर्ष पुराने भारत को, उसकी इस संतान की गारंटी है। '' देश के प्रधानमंत्री के मुंह से निकला हुआ यह वाक्यविपक्षी दलों के लिये कितनी कुंठा से भरा व हताशा से परिपूर्ण प्रतीत होता है ?
 
आज देश मंहगाई,बेरोज़गारी,शिक्षा,स्वास्थ्य,अमेरिकी डालर के मुक़ाबले भारतीय मुद्रा में आ रही अभूतपूर्व गिरावट, सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम, (पीएसयू) के चंद निजी हाथों में सौंपे जाने जैसे अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों से जूझ रहा है। परन्तु सरकार के पास इनका न तो कोई जवाब है न ही इनके समाधान की कोई नीति। 2019 का चुनाव इसी मोदी सरकार ने मुफ़्त राशन पाने वाले लाभार्थी मतदाताओं के दम पर जीत लिया था । इसबार वही लाभार्थी श्रेणी भी यह समझ चुकी है कि यह तो राशन पर उन्हें आश्रित बनाये रखने की सत्ता की एक गहरी चाल है। लिहाज़ा इसबार बड़ी ही बेशर्मी के साथ हिन्दू मुसलमान,राम मंदिर,मंगल सूत्र,भैंस,मछली,गाय,जिहाद जैसे मुद्दों को चुनावी विमर्श के बीच लाकर लड़ा जा रहा है। आश्चर्य की बात तो यह है कि यह बातें भाजपा के किसी दूसरे व तीसरे दर्जे के नेता द्वारा नहीं बल्कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की जा रही हैं। जोकि देश के प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च गरिमामयी पद पर बैठे किसी भी व्यक्ति की मान व प्रतिष्ठा के विरुद्ध है। और यह देश की बदनामी का भी कारक है। मूल मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने की इस तरह का संकुचित व षड्यंत्रकारी चुनावी विमर्श अत्यंत चिंतनीय है।  
 
निर्मल रानी 
 
                                     
 
 
 

 
 
 
 
 
 
 

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