खेल में सिर्फ़ जीत ही नहीं होती

खेल में सिर्फ़ जीत ही नहीं होती

 
                                                                निर्मल रानी
                                            
विश्व कप क्रिकेट का फ़ाइनल मैच पिछले दिनों अहमदाबाद में भारत व ऑस्ट्रेलिया के मध्य खेला गया। इसमें ऑस्ट्रेलिया ने भारत को 6 विकेटों से पराजित कर दिया। 43 ओवरों में चार विकेट खोकर ऑस्ट्रेलिया ने भारत द्वारा बनाये गये 241 रनों का लक्ष्य आसानी से हासिल कर लिया। भारत की पूरी टीम 50 ओवरों में मात्र 240 रन ही बना सकी। ऑस्ट्रेलिया की ओर से  ट्रेविस हेड ने 137 रन और मार्नस लाबुशेन ने 58 रनों की शानदार पारी खेली ।
 
ट्रेविस हेड को प्लेयर ऑफ़ द मैच जबकि विराट कोहली को प्लेयर ऑफ़ द सीरीज़ घोषित किया गया। जैसे जैसे ऑस्ट्रेलिया की टीम जीत के अपने लक्ष्य के क़रीब पहुँच रही थी,स्वभाविक रूप से भारतीय टीम के प्रशंसकों में मायूसी बढ़ती जा रही थी। हालांकि भारतीय खिलाड़ियों की हौसला अफ़ज़ाई करने के लिये स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गृह मंत्री अमित शाह,गुजरात के राज्यपाल  व मुख्यमंत्री आदि के साथ स्वयं स्टेडियम में मौजूद थे।  इनके अतिरक्त भी राजनीति,उद्योग व सिनेमा जगत के कई चर्चित लोग भारतीय टीम की हौसला अफ़ज़ाई के लिये स्टेडियम में उपस्थित थे। परन्तु ऑस्ट्रेलिया की सधी गेंदबाज़ी व बल्लेबाज़ी के आगे भारतीय टीम न ही अपेक्षित स्कोर खड़ा कर सकी न ही निर्धारित लक्ष्य 241 को पूरा करने से पहले ऑस्ट्रेलिया की टीम को आउट कर सकी। इस तरह ऑस्ट्रेलिया ने भारत पर छह विकेटों से आसान जीत हासिल कर  रिकॉर्ड छठी बार वर्ल्ड कप पर कब्ज़ा कर लिया।
 
                                     ऑस्ट्रेलिया के छठी बार विश्व विजेता होने के बाद जहां खेल समीक्षकों द्वारा जीत हार के तकनीकी कारणों पर रौशनी डाली गयी वहीं भारतीय क्रिकेट प्रेमियों की मायूसी से जुड़ी भी तमाम ख़बरों ने सुर्ख़ियां बटोरीं। अत्यधिक विश्वास से लेकर अंधविश्वास तक से लबरेज़ कई समाचार देखने को मिले। कहीं खेल समाप्त होने से पहले ही टी वी स्क्रीन बंद कर दिए गये ,कहीं लोगों को आंसू बहाते देखा गया, कहीं आतिशबाज़ियाँ धरी रह गयीं तो कहीं मिठाइयां बिना बंटे रखी रह गयीं। अलीगढ़ में तो भारत की हार से दुखी किसी व्यक्ति ने अपना टी वी ही फोड़ दिया। यह तो मैच के बाद के कुछ दृश्य थे। जबकि मैच के पहले देश के अनेक प्रमुख ज्योतिषियों व भविष्य वक्ताओं ने भारत की टीम की जीत की भविष्यवाणी कर भारतीय प्रशंसकों में जीत की उम्मीद और भी जगा दी थी। परन्तु इन सब भविष्यवाणियों पर पानी फिर गया। एक नये नवेले,विवादित व बड़बोले कथावाचक जो भविष्यवाणियां भी करते फिरते हैं उन्होंने भी भारत के जीतने की भविष्यवाणी की थी। परन्तु खेल में जीत न तो भविष्यवाणियों से होती है न ही भाग्य भरोसे या दिशा-दशा-ग्रह-नक्षत्र आदि के भरोसे। बल्कि जो अच्छा खेलता है जीत हमेशा उसी की होती है। यही उस ऑस्ट्रेलिया के साथ भी हुआ जिसने छठी बार वर्ल्ड कप जीत कर कीर्तिमान बनाया। 
 
                                  सवाल यह है कि क्या किसी भी देश की टीम के प्रशंसकों को अपने खिलाड़ियों से केवल जीत की ही उम्मीद करनी चाहिये ? भविष्य वक्ताओं को क्या अधिकार है कि वे निरर्थक व अतार्किक भविष्यवाणियां कर लोगों में वह उम्मीद जगायें जो पूरी ही नहीं होनी? देश के एक पेशेवर प्रसिद्ध हिंदी अख़बार ने तो प्रथम पृष्ठ पर यह शीर्षक ही छाप मारा कि- 'आनुसूओं में डूबा देश ' । यह आख़िर कौन सी खेल पत्रकारिता का शीर्षक है ? बात केवल यहीं नहीं रुकी बल्कि एक स्वयंभू 'राष्ट्रवादी गिरोह ' ने तो ऑस्ट्रेलिया की जीत के बाद उसके खिलाड़ियों के कई चित्र फ़ोटोशॉप कर उनका चरित्र हनन करना तक शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने यह भी कहा व लिखा कि वी वी आई पी लोगों के मैच में पहुँचने की वजह से मैच हार गया। कुछ ने स्टेडियम की व्यवस्था व सुरक्षा पर सवाल उठाया। और इन फ़ुज़ूल की बातों में इसी विश्व कप सिरीज़ में भारत की वह उपलब्धियां दबी रह गयीं जिसकी चर्चा भी बेहद ज़रूरी थी। जैसे कि इसी विश्व कप में लगातार 10 मैच जीतकर फ़ाइनल तक का सफ़र तय करने वाली भारतीय क्रिकेट टीम ने न केवल भारतवासियों बल्कि पूरे विश्व के खेल-प्रेमियों का दिल जीत लिया। भारतीय टीम द्वारा 10 लगातार जीतें हासिल की गयीं जो भारत का किसी भी एक आईसीसी वर्ल्ड कप में सबसे ज़्यादा लगातार जीत का नया रिकार्ड है। न्यूज़ीलैंड के साथ हुये सेमीफ़ाइनल मैच में मोहम्मद समी ने तूफ़ानी गेंदबाज़ी कर दुनिया में तहलका मचा दिया। विश्व कप 2023 में भारतीय टीम को जीत के मार्ग में मिलने वाले भारी अंतर ने भी क्रिकेट जगत में भारत की धाक जमाई। निःसंदेह ऑस्ट्रेलिया की टीम विश्व चैम्पियन ज़रूर बनी परन्तु इसमें भी कोई संदेह नहीं कि भारत ने भी स्वयं को इस विश्व कप की दूसरी सबसे मज़बूत टीम के रूप में स्थापित किया। 
 
                                परन्तु इसमें भला क्या संदेह हो सकता है कि जो ऑस्ट्रेलिया पहले भी पांच बार विश्व चैम्पियन रह चुकी हो छठी बार भी उसी की जीतने की संभावना भी प्रबल थी न की 2 बार की विजेता भारत की? परन्तु कभी कभी बेवजह की राष्ट्रभक्ति,बेवजह के राष्ट्रवाद से परिपूर्ण उन्माद,भविष्यवाणियों का आसरा,अत्यधिक आत्मविश्वास,स्वयं को उम्मीद से अधिक आंकना,और ऐसी भावना का एक वर्ग विशेष में सामूहिक रूप से न केवल जागृत बल्कि हावी हो जाना ही अन्ततोगत्वा उस समय कष्टदायक साबित होता है जब हमारी वही हवाई उम्मीदें भी हवा हवाई साबित हो जाती हैं। और ऐसे में इस वर्ग को मुंह छिपाने और शर्मिंदगी के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता। मुझे नहीं पता कि जिन भविष्यवक्ताओं ने भारत की विश्व कप  में जीत की गारंटी की भविष्यवाणी की थी
 
वे अब क्या सफ़ाई देंगे। परन्तु हमारा भारतीय समाज इतना भोला है कि ऐसे पाखंडी भविष्यवक्ताओं के जाल में आगे भी बार बार फंसता रहेगा ।  यदि भारत यह मैच जीत जाता तो पाखंडी भविष्यवक्ताओं के साथ साथ अनेक नेताओं की भी पौ बारह होती। तमाम मौक़ा परास्त लोग इसका राजनैतिक लाभ उठाते। 2024 के चुनाव तक इसे भुनाया जाता। इसमें धर्म और राष्ट्रवाद का तड़का लगाया जाता। परन्तु ऐसे 'विचारवान ' लोगों को निराशा हाथ लगी। पूरे देश को भारत की पराजय का अफ़सोस ज़रूर है परन्तु प्रत्येक देश के प्रत्येक खिलाड़ी व खेल प्रेमी को खेलने या मैच देखने से पहले यह बात अपने मस्तिष्क में बिठा लेनी चाहिए कि खेल में सिर्फ़ जीत ही नहीं होती, हार का भी सामना करना पड़ता है। और हार को भी खेल भावना के अनुरूप ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार करना चाहिये।  
 

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