संविधान और अधिकार

असहमति पर ‘दिमागी नक्सल’ का ठप्पा

भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में राजनीतिक भाषा केवल शब्दों का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समाज के सार्वजनिक वातावरण को प्रभावित करती है। सत्ता में बैठे लोगों द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द प्रशासनिक संस्थाओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज और आम...
संपादकीय  स्वतंत्र विचार