नस्लीय भेदभाव, वर्ग संघर्ष का ही परिणाम है …

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स्वतंत्र प्रभात :-

भारत और आस्ट्रेलिया टेस्ट मैच के तीसरे और चौथे दिन मोहम्मद सिराज पर हुई, नस्लीय टिप्पणी नस्लवाद की गहरी जड़ो को दिखाती है।आज फिर साबित हो गया, नस्लवाद वैश्विक स्तर पर किस कदर छाया है।

मैच के दौरान कुछ आस्ट्रेलियाई दर्शको ने भारतीय गेंदबाज मोहम्मद सिराज पर नस्लीय टिप्पणी की, जिसका भारतीय टीम ने प्रतिरोध किया। हालांकि इससे पहले तेेेज गेंदबाज जसप्रीत बुुुमराह को भी नस्लीय टिप्पणी का शिकार होना पड़ा। खैर औपचारिकता निभाते हुए आस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड ने भी सख्त कार्रवाई की बात कही है। मुझे याद है पिछले साल जब अमेरिका में पुलिस हिरासत में एक अफ्रीकी-अमेरिकी व्यक्ति की मौत के बाद अमेरिका में बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बीच, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर ने कुछ ऐसा करने का फैसला किया था, जिसे कई सालों तक टाला गया था:

मामला यह था जार्ज फ्लायड की अमेरिकी पुलिस द्वारा बर्बर हत्या के बाद पूरे अमेरिका महाद्वीप के 100 शहरो से भी अधिक मे हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए, नतीजतन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हिंसा कर रहे विद्रोहियो को सख्त लहजे मे कहा – “कि आप अमेरिका मे चर्च नही जला सकते ”

ट्विटर का आरोप था कि – डोनाल्ड ट्रम्प के ट्वीट गलत जानकारी और इसकी नीतियों के खिलाफ थे।
इसने ट्रम्प को एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से सख्त नियंत्रण के सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को चेतावनी देने के लिए प्रेरित किया था।
उस समय डोनाल्ड ट्रम्प के ट्वीट ने जमकर हंगामा किया था। ट्रंप पहले भी कई बार अपने इस रवैये के चलते दुनिया मे अलोचना का शिकार बन चुके थे। और जैसा कि अपेक्षित था, इसकी भरपाई आने वाले अमेरिकी चुनाव के दौरान चुकानी पड़ी।

आज वैचारिक रंगभेद ने सभी वर्गो को प्रभावित किया है । उस समय जार्ज फ्लायड की मृत्यु के बाद क्रिकेट के दिग्गज क्रिस गेल और डेरेन सेमी ने भी आरोप लगाया था। वही मोहम्मद सिराज के लिए पूर्व दिग्गज क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने भी इसकी तीखी आलोचना की है। इस तरह की न जाने कितनी घटनाएं घटती हैं जहां कोई वैमनस्य ही नही।

आज मार्टिन लूथर किंग को कौन नही जानता ?मार्टिन को अमेरिकी सिविल राइट्स मूवमेंट का नायक कहा जाता है। लेकिन, 4 अप्रैल 1968 को केवल 39 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई। उनकी हत्या अमेरिका मे हो रहे एक संगोष्ठी के दौरान हुई, जिसमे उन्होंने अफ्रीकी मूल के काले निवासियो के लिए आवाज उठाई लेकिन इससे अमेरिकी वासी कुंठित हुए और भरी सभा मे जूनियर मार्टिन लूथर किंग 20वी सदी के सबसे बड़े समाज सुधारक की हत्या कर दी ।

सवाल उठता है कि अब भी ऐसे वर्ग, तबके समाज मे मौजूद हैं जो रूढ़िवादी नीतियो से उत्कंठित हुए हैं।
बावजूद इसके कुछ शख्सियत परवान भी चढी हैं।  बराक ओबामा इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। जिनके ट्विटर पर भी सर्वाधिक 128 मिलियन फोलोवर हैं।
नेल्सन मंडेला भी इन उदाहरणों में अग्रणी हैं।जिन्होंने अफ्रीकी वासियो को ब्रिटिश हुकूमत से आजादी दिलाने के लिए अपनी जिन्दगी न्योछावर कर दी थी ।
नेल्सन मंडेला को लगभग 27 साल “मांडले जेल” मे रहना पड़ा । उन्ही के नाम पर इस जेल का नाम मांडले जेल पड़ा और उनका सफर राष्ट्रपति पद के साथ समाप्त हुआ ।

दक्षिण अफ्रीकी-अमेरिकी महिला ,जोजिबिनी तुजीं  वर्ष  2019 की मिस यूनिवर्स चुनी गई। शायद समाज मे सुंदरता के प्रति मापदंड एवं नजरिया एक बार फिर से ध्वस्त हो गए थे। जोजिबिनी तुजीं को जब उस वर्ष का मिस यूनिवर्स चुना गया एवं उनसे इंटरव्यू में पूछा गया था कि वह क्या कहना चाहेंगी??

तब उन्होंने कहा-

“कि मैं ऐसे समाज से ताल्लुक रखती हूं जहां आज भी सुंदरता के मापदंड रंग, रूप ,वंश ,जाति आदि पर आधारित है। लेकिन अश्वेत महिला को मिस यूनिवर्स चुनकर एक बार फिर साफ हो गया कि सुंदरता के प्रति उसके और समाज के मापदंड तथाकथित बिल्कुल अलग है। 18 वीं सदी के महान दार्शनिक हूमे ने सच ही कहा है-

“कि सुंदरता अपने आप में कुछ भी नहीं है यह तो देखने वाले की नजर पर आधारित है कि वह किस नजरिए और दिमाग से उसे देख रहा है।”

भारत में नस्लवाद की यदा-कदा ही कोई घटना देखने को मिलती हो, लेकिन जातिवाद, लैंगिक असमानता और धार्मिक उन्माद की जड़े यहां भी कम नही है।

ग्राम पंचायत से लेकर संसदीय चुनाव तक कोई भी पार्टी धार्मिक संगठन का ठेंगा लगाने से चूकती नही है।भले ही चाहे वो उत्तर प्रदेश ही क्यो ना हो? सरकार  वाहनों पर जातिसूचक शब्दकोश को मिटाने की चाहे जितनी कोशिश कर लेे आखिर वोट का जखीरा धर्म के आधार पर ही तय होता है न केवल उत्तर प्रदेश , बल्कि अन्य राज्यो का भी यही हाल है। अब पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव चरम पर होंगे तब किस तरह की धार्मिक घुट्टी पिलाई जाएगी, यह देखना होगा।

खैर यह बात सिद्ध हो  गई है कि हम ऐसे समाज का अंग हैं जिसकी मात्र कल्पना से मन अतृप्त हो जाए। भले ही हम उपनिवेशवाद से मुक्त हो गए हों, लेकिन 21वीं सदीं में भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वर्ग संघर्ष और नस्लवाद  आज भी समाज का सबसे बहिष्कृत रूप है।

– प्रत्यक्ष मिश्रा  (लेखक स्वतंत्र प्रभात में सह-संपादक हैं)

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