#सूडान,एक बच्ची को खाने के लिए बैठा गिद्ध क्या सच में ये तस्वीर केविन कार्टर ने ली थी?

#सूडान,एक बच्ची को खाने के लिए बैठा गिद्ध क्या सच में ये तस्वीर केविन कार्टर ने ली थी?

एक फोटो पत्रकार के लिए सबसा बड़ा दिन तब होता है, जब उसके द्वारा खींची हुई फोटो समाज को सही मायने में आइना दिखाएं और उसकी फोटो द्वारा सामने आई उस समस्या को संबंधित प्राधिकारी गंभीरता से लें.

केविन कार्टर, एक ऐसे ही फोटो जर्नलिस्ट थे, जिन्होंने फोटो पत्रकारिता का सबसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड पुलित्जर अवॉर्ड पाने के बाद

सुर्ख़ियो में उस वक्त आएं, जब इसके महज दो महीने बाद ही उन्होंने आत्महत्या कर ली. महज़ 33 साल की उम्र में कार्टर ने कार्बन मानो ऑक्साइड जहर से अपने जीवन को खत्म कर दिया.

ऐसे में जानना दिलचस्प हो जाता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा कि उन्होंने मृत्यु को गले लगा लिया-

 रंगभेद के खिलाफ थे -

केविन कार्टर का जन्म 1960 में साउथ अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में हुआ. वे एक रोमन कैथोलिक परिवार से आते थें. उनकी माँ का नाम रोमा था और पिता का जिम्मी. उनका बचपन जोहानिसबर्ग के पार्कमोरे में बीता.

बताते चलें कि कार्टर और उनका परिवार अंग्रेज़ आप्रवासी थे और वह जिस दौर में थे, उस समय दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद बहुत था. यही कारण रहा कि छोटी सी उम्र में भी कार्टर इस रंगभेद की घटनाओं को देखकर, और इस सोच से हमेशा आक्रोशित होते थे.

वह अक्सर रंगभेद के खिलाफ कुछ करने के लिए अपने पिता से कहते थे

इन्हीं सवालों के साथ बड़े हुए कार्टर, साउथ अफ्रीकी डिफेंस फ़ोर्स में शामिल हुए.

यहाँ इन्होंने पाया कि रंगभेद कितनी बुरी तरह व्याप्त है. दरअसल हुआ यूँ कि एक बार, उन्होंने अश्वेत व्यक्ति का साथ दिया,जिस से नाराज होकर उनके साथ ही सैनिकों ने उनकी पिटाई की थी।  कार-रेसिंग का बहुत शौक था, स्कूली पढ़ाई के बाद कार्टर ने फार्मेसी की पढ़ाई में दाख़िला लिया, लेकिन उन्हें यह कुछ ख़ास पसंद नहीं आई और उन्होंने इसे बीच में ही छोड़ दिया. 1980, बिना किसी को बताए वह घर से निकल गए और एक डिस्क-जॉकी (डीजे) के रूप में, अपना नाम केविन से बदल कर ‘डेविड’ रखकर भी काम किया था.

पत्रकार कैसे बनें-

कार्टर ने एक बार 23 साल की उम्र में नींद की गोलियां, पेनकिलर और चूहे मारने की दवाई खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी. ऐसा उन्होंने अपनी नौकरी खोने की वजह से किया था, लेकिन किस्मत अच्छी थी कि वह बच गए.

इसके बाद कार्टर को एक कैमरा सप्लाई की दुकान पर नौकरी मिली, और यहाँ से उन्हें मिला पत्रकारिता की तरफ जाने का मिला अवसर. इस सफ़र में सबसे पहले उन्हें ‘जोहानिसबर्ग सन्डे एक्सप्रेस’ में साप्ताहिक स्पोर्ट्स फोटोग्राफर के तौर पर काम करने का मौका मिला.

कार्टर को एक शुरुआत मिल चुकी थी. इसी बीच 1984 में, जोहानिसबर्ग की अश्वेत बस्तियों में दंगे फैले हुए थे. इस दौरान कार्टर ने वहां जाकर, बिना किसी डर के रंगभेद की बर्बरता को अपनी तस्वीरों में कैद कर दुनिया के सामने रखना चाहा.

उन्होंने एक टीम के तौर पर भी काम किया, जो जोहानिसबर्ग में होने वाली हिंसा की तस्वीरें लिया करता था. उनकी इस टीम का नाम था ‘ द बैंग बैंग क्लब’. इस काम को वह अपनी जान खतरे में डाल कर किया करते थे. इस दौरान वह कई बार मरने से भी बचे थे.

उन्हें अब रास्ता मिल चुका था, उनका बचपन से रंगभेद के खिलाफ रहना और कुछ न कर पाने की परेशानी का हल मिल चुका था.

अधमरी बच्ची और गिद्ध की तस्वीर का किस्सा

एक बच्ची के पिता केविन कार्टर, डेली मेल में काम करते थें. तभी उन्हें भुखमरी के शिकार सूडान में चल रहे विद्रोही आन्दोलन के बारे में पता चला. बस फिर क्या था, उन्होंने एक हफ्ते की छुट्टी ली और कुछ पैसे जुटाए और निकल गए सूडान की ओर.

जब कार्टर तस्वीरें ले रहे थे, तभी उन्हें झाड़ियों से कुछ हिलने की आवाज़ आई और जब वो वहां पहुंचे तो दंग रह गए, उन्होंने देखा की एक छोटी सी बच्ची, जो बिलकुल अधमरी हालत में है, जिसमें इतनी ताक़त भी नहीं कि वह चल सके. वह रेंग-रेंग कर फीडर सेन्टर तक जाने की कोशिश कर रही थी.

इस से भी ज्यादा झकझोर देने वाली बात ये थी कि उस बच्ची के पीछे एक गिद्ध लार टपकाए बैठा हुआ था. कार्टर ने इस दृश्य को कैमरे में कैद कर लिया. हालांकि, बाद में उन्होंने गिद्ध को भगा दिया था.

इस तस्वीर के बारे में कार्टर ने अपने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि इस तस्वीर को लेने के बाद वह काफी देर तक एक पेड़ के नीचे बैठकर रोए थे।

तस्वीर ने बनाया पुलित्ज़र विजेता, मगर...

26 मार्च, 1993 में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने अपने अखबार में पहली बार यह मार्मिक तस्वीर छापी.

यह तस्वीर छपने के तुरंत बाद यह अफ्रीकी पीड़ा  यह बाद में तक़रीबन हर अखबारों में छपी और इस फोटो ने ही पूरी दुनिया का ध्यान सूडान की इतनी दयनीय हालत की और खींचा.

बताया जाता है इस तस्वीर के बारे में हजारों लोगों ने टाइम्स को पत्र लिखा कि बच्ची के साथ क्या हुआ...क्या बच्ची फीडर सेंटर तक पहुँच पाई...

अप्रैल, 1994 को उन्हें इसी तस्वीर के लिए उन्हें पुलित्ज़र पुरस्कार मिला.

इतने बड़े पुरस्कार को जीतने के बाद कुछ दिनों तक वह बहुत खुश थे, क्योंकि उनके काम को इससे बड़ी मान्यता या सम्मान नहीं मिल सकता था. दूसरी तरफ इस तस्वीर के बाद लोगों ने नैतिकता की बात उठाई, जिसमें उनका कहना था कि कार्टर ने फोटो को खींचना ज्यादा जरूरी समझा बजाए उस बच्चे को बचाने के. इस बात से कार्टर काफी परेशान हुए, हालांकि उन्होंने फोटो लेने के बाद गिद्ध को भगा दिया था.

नशे के साथ मौत को दावत!

इस दौरान उन्हें नशे की भी लत लग गयी थी और उनके निजी जीवन में भी काफी परेशानियाँ चल रही थीं.

27 जुलाई, 1994, उनके जीवन का आखिरी दिन साबित हुआ, उन्होंने एक पेड़ के नीचे, जहाँ वो अक्सर बचपन में खेला करते थे, अपनी गाड़ी में कार्बन-मोनोऑक्साइड जहर से आत्महत्या कर ली.

कार्टर ने अपने आखिरी खत में लिखा था कि वो काफी परेशान हैं. उन्हें लाशें, भुखमरी, घायल बच्चे, दर्द की तस्वीरें रह-रह कर परेशान करतीं हैं. कहा जाता है कि बाद में उन पर ज़िंदगी का यह दर्द, ख़ुशियों पर इतना हावी हो गया है कि अब कोई ख़ुशी रही ही नहीं!

इन आखिरी शब्दों को कागज़ पर बयान करके कार्टर इस दुनिया से चले गए..

स्वतंत्र भारत की जांच पड़ताल में यह तस्वीर सच पाई गई। और इस तस्वीर के लिए पुलित्जर पुरस्कार केविन कार्टर को ही मिला था

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