तिब्बत की स्वायत्तता के लिए खड़ा अमेरिका…

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स्वतंत्र प्रभात :-
हाल में विदेश नीति में एक बदलाव संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की तरफ से किया गया है जिसमें “तिब्बत पॉलिसी एंड सपोर्ट एक्ट 2020” पर अमेरिका ने हस्ताक्षर किए हैं। वैसे  यह एक्ट 2002 में लाए गए एक्ट का ही संवर्धित रूप है।
इसको लेकर काफी चर्चा हो रही है जिसमें सबसे अहम बात यह है चीन इसका मुखर विरोध कर रहा है। अब इसका थोड़ा इतिहास जानने की कोशिश करते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है जिससे चीन सबसे ज्यादा परेशान दिख रहा है?

सन् 1959 के दौर से

बात 1959 की है जब हिमालय का हिस्सा और दुनिया की छत कहलाने वाला तिब्बत चीनी सैनिको के आक्रोश से उबल रहा था, बौद्ध भिक्षुक और भिक्षुणी चीनी सैनिको की हस्त-कठपुतली बन चुके थे और चीनी आक्रांता बौद्धो पर जुल्म कर रही थी।
वैसे 1956 में जब चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई हिंदुस्तान आये थे तो उनके साथ दलाई लामा भी आये। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से तिब्बत की आजादी की बात छेड़ी। जवाहरलाल नेहरू सतर्क थे।वे चीन को रणनीतिक दोस्त की तरह देख रहे थे।उन्होंने दलाई लामा को समझाया कि वे संपूर्ण आजादी की मांग छोड़ें और स्वायत्तता की चाह रखें। खैर इस बात का मर्म कि तिब्बत , भारतीय उपनिवेश के पहले भारत का हिस्सा था, आज भी है। इसलिए बौद्ध धर्म के लोगो ने शरणस्थली भारत की राह देखी। और अपने 14 वें धर्म गुरू दलाई लामा के साथ चले आए।
हिन्दुस्तान का बेटा ,लामा अपनी मां के पास आ ही गया। पूूरा ऐशिया चीन की तरफ टकटकी लगाकर देख रहा था एक समय लगा कि दलाई लामा युद्ध मे मारे जा चुके हैं। लेकिन भारत मे दलाई लामा को शरण देने का समाचार सुनकर चीन आक्रोशित हो गया, नेहरू भी अमेरिका-पाकिस्तान , शीत युद्ध और पंचशील समझौते को लेकर असमंजस मे पड़ गए और छलवश 1962 में चीन ने भारत के ऊपर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध मे अनेक प्रश्न उपजे थे। चीन, तिब्बत पर अपनी दावेदारी पेश कर रहा था, जबकि तिब्बती बौद्ध अपनी स्वायत्तता और स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे  सन्
1950 में चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया था।

क्या था 2002 का “तिब्बत पॉलिसी एक्ट” ?

 
इस एक्ट के अनुसार अमेरिका तिब्बत की स्वायत्तता के लिए चीन के रवैये को अवैध मानता है। अमेरिका का कहना है कि चीन ,प्रसारवाद की नीति अपनाकर तिब्बती लोगो पर जुल्म कर रहा है और वहां के शासन को अपने ढंग से चलाना चाहता है, जो मानवाधिकार के भी विरूद्ध है। इसलिए अमेरिका  बौद्ध गुरु दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चुनने के लिए बौद्ध लोगो का समर्थन कर रहा था। जबकि साम्यवादी चीन, तिब्बत को अपना अंग मानकर उस पर जुल्म कसे जा रहा था।
हालांकि, चीन को अमेरिका के हस्तक्षेप से भारी आघात पहुंचा और चीन तब से भारत के साथ – साथ अमेरिका को भी अपनी चाइना पॉलिसी के खिलाफ मानता है।कई बार चीन, तिब्बत की ओर से अपने मनपसंद व्यक्ति को उत्तराधिकारी चुन चुका है, हालांकि भारत, अमेरिका और दलाई लामा के हस्तक्षेप के बाद चीन लगातार विफलता का सामना कर रहा है।
प्रत्यक्ष मिश्रा (लेखक और पत्रकार)