जरा याद करो कुर्बानी’ की जीवंत प्रस्तुति से भाव विह्वल हुए दर्शक

जरा याद करो कुर्बानी’ की जीवंत प्रस्तुति से भाव विह्वल हुए दर्शक

संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से स्वाधीनता संग्राम पर दी गई प्रस्तुति ब्लाक के गोपालीपुर में आयोजित हुआ लोकनाट्य कार्यक्रम प्रतापपुर (प्रयागराज)।संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से धनूपुर ब्लाक के गोपालीपुर में ‘एक शाम, लोकनाट्य कला नौटंकी के नाम’ अंतर्गत ‘जरा याद करो कुर्बानी’ शीर्षक कार्यक्रम में स्वाधीनता संग्राम में आजादी के

संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से स्वाधीनता संग्राम पर दी गई प्रस्तुति

ब्लाक के गोपालीपुर में आयोजित हुआ लोकनाट्य कार्यक्रम

‌‌प्रतापपुर (प्रयागराज)।‌संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से धनूपुर ब्लाक के गोपालीपुर में ‘एक शाम, लोकनाट्य कला नौटंकी के नाम’ अंतर्गत ‘जरा याद करो कुर्बानी’ शीर्षक कार्यक्रम में स्वाधीनता संग्राम में आजादी के दीवानों पर प्रस्तुति दी गई। आयोजन के मुख्य अतिथि लोक साहित्यकार, नाट्यविद राजकुमार श्रीवास्तव रहे।‌  श्री श्रीवास्तव व भारतीय लोककला महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष कमलेश चंद्र यदाव व रागी राग लोककला संरक्षण समिति के अध्यक्ष लाल बहादुर रागी ने संयुक्त रूप से कहा कि यह प्रस्तुतियां हमारे अतीत की गौरवगाथा से नई सदी को अवगत करा रही हैं। हमें इस सुनहरी विरासत को कायम रखना होगा।

‌  कार्यक्रम प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से स्वाधीनता तक के संग्राम पर आधारित था। 15 अगस्त 1781 की सुबह ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स की सवारी कोलकाता से बनारस आ पहुंची थी रेजिडेंट मार्कहम को बनारस के महाराजा चेतसिंह गिरफ्तारी सुनिश्चित करने का हुक्म हुआ। यहां की गाथा से लेकर  1857 के संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई द्वारा झांसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करने, एक स्वयंसेवक सेना के गठन तथा उन्हें  युद्ध का प्रशिक्षण देने, 1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना के झांसी की ओर बढ़ने व मार्च माह में शहर को घेरने तथा दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना के शहर पर कब्जा करने के बावजूद शौर्य पूर्वक कालपी पहुंच तात्या टोपे से मिलने, संयुक्त रूप से उनके व  रानी की संयुक्त सेनाओं द्वारा विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा करने के कलाकारों द्वारा सजीव चित्रण से उपस्थित लोग  रोमांचित हो उठे ।

जरा याद करो कुर्बानी’ की जीवंत प्रस्तुति से भाव विह्वल हुए दर्शक

18 जून, 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रितानी सेना से लड़ते-लड़ते महारानी वीरगति को प्राप्त होने के दृश्य से लोगों की आंखे नम हो गईं नाना साहब पेशवा, राव साहब, बहादुरशाह जफर आदि के  बाद करीब एक साल बाद तक  स्वाधीनता संग्राम के नायक तात्या टोपे ने कमान सम्हाले रखी। इसके बाद 1919 में हुए अमृतसर‌ के जलियांवाला बाग नरसंहार तथा महात्मा गांधी के 1921 में असहयोग आन्दोलन के फरमान के बाद पढ़ाई कर रहे तमाम अन्य छात्रों की भांति  चन्द्रशेखर आजाद के आन्दोलन में प्रतिभाग करने तथा पहली बार गिरफ़्तार होने पर उन्हें 15 बेतों की सजा और पीठ पर कोड़े बरसाए जाने का दृश्य मर्माहत कर देने वाला था। तत्पश्चात की क्रांति, शहीदों और महापुरुषों के आजादी के इतिहास पर विस्तृत लोकनाट्य से दर्शक भाव विह्वल हो गए।‌

इस अवसर पर लोकनाट्य निर्देशक रोशन लाल, रूपांतरण कर्ता अष्टभुजा मिश्र, सह निर्देशक-मुकुन्दलाल बैरागी, संगीत महेंद्र कुमार, नटी- प्रदीप कुमार के साथ राजा चेतसिंह- फूलचंद्र, मार्कहम- गौरव, मनोज कुमार, लक्ष्मीबाई- कमलेश कुमार, मंगल पांडे-केवला प्रसाद सरोज, तात्या टोपे- राम शिरोमणि व चंद्रशेखर आजाद की भूमिका में मोहम्मद नाजिम का किरदार खूब सराहा गया।

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