जलवायु परिवर्तन का गहराता संकट: युद्ध, समुद्री तापमान और ‘वेस्टर्न वेव्स’ का भारत पर प्रभाव

अप्रैल 2026 अप्रैल का महीना, जो कभी वसंत की सुखद अनुभूति का प्रतीक माना जाता था, आज 40–43°C की झुलसा देने वाली गर्मी का संकेतक बन गया है।

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लखनऊ | अप्रैल..., 2026 अप्रैल का महीना, जो कभी वसंत की सुखद अनुभूति का प्रतीक माना जाता था, आज 40–43°C की झुलसा देने वाली गर्मी का संकेतक बन गया है। उत्तर भारत, विशेषकर लखनऊ, दिल्ली, राजस्थान और मध्य गंगा के मैदानों में यह तापमान अब असामान्य नहीं रहा, बल्कि एक नई सामान्य स्थिति (New Normal) के रूप में उभर रहा है।

यह परिवर्तन केवल मौसमी नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैश्विक स्तर पर चल रही जटिल प्रक्रियाएँ—जैसे जलवायु परिवर्तन, समुद्री तापमान में वृद्धि, और अंतरराष्ट्रीय युद्ध—मुख्य भूमिका निभा रहे हैं।

भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार पिछले एक दशक में अप्रैल माह के अधिकतम तापमान में स्पष्ट वृद्धि देखी गई है - यह आकड़ा वर्ष के सापेक्ष अधिकतम तापमान (°C) का 2015-40.7, 2016-43.1, 2017-41.8, 2018-40.7, 2019-44.6, 2020-38.8, 2021-41.9, 2022~43.0, 2023-39.0, 2024-41.0, 2025-42.0, और 2026-43.0 से ऊपर (27 अप्रैल तक)।

[Chitra-Gragh] इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि तापमान में गिरावट केवल अस्थायी रही है (जैसे 2020 में), जबकि दीर्घकालिक प्रवृत्ति लगातार वृद्धि की [Chitra-Gragh] महामारी और तापमान: एक अस्थायी राहत 2020 में COVID-19 लॉकडाउन के दौरान तापमान 38.8°C तक गिर गया था।

इसका मुख्य कारण था—वाहनों की आवाजाही में कमी, औद्योगिक गतिविधियों का ठहराव और वायु प्रदूषण में गिरावट हालाँकि, यह गिरावट स्थायी नहीं रही। जैसे ही गतिविधियाँ पुनः शुरू हुईं, तापमान फिर से तेजी से बढ़ने लगा। युद्ध और जलवायु परिवर्तन का संबंध वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन और युद्ध के बीच एक खतरनाक संबंध उभरकर सामने आया है, जिनका मुख्य प्रभाव: सैन्य उपकरणों में भारी ईंधन खपत, बमबारी और आग से कार्बन उत्सर्जन और ऊर्जा बुनियादी ढांचे का विनाश ही कहा जा सकता है।

2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध और 2026 में मध्य-पूर्व के संघर्षों के दौरान तापमान का 43°C के आसपास पहुँचना इस संबंध को मजबूत करता है। युद्ध केवल मानव जीवन ही नहीं, बल्कि पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन को भी गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। ‘वेस्टर्न वेव्स’ (पश्चिमी विक्षोभ) का बदलता स्वरूप भारत में आने वाले पश्चिमी विक्षोभ अब अनियमित और अधिक तीव्र होते जा रहे हैं।

जिससे प्रमुख परिवर्तन जो महसूस किये गए, वह है -अचानक वर्षा और ओलावृष्टि, उसके तुरंत बाद भीषण हीटवेव और तापमान में तीव्र उतार-चढ़ाव (25°C से 43°C तक) होता रहा । इससे दुष्प्रभाव न ही रबी फसलों (विशेषकर गेहूं) पर संकट छाया बल्कि किसानों की आय पर असर हुआ और तरह–तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं में अप्रत्यासित वृद्धि हुई।

शहरी भारत और ‘हीट आइलैंड’ प्रभाव लखनऊ, दिल्ली और पटियाला जैसे शहरों में कंक्रीट संरचनाओं और हरियाली की कमी के कारण “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। जिसके परिणाम स्वरुप शहरों में ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म, रात का भी तापमान 30°C से ऊपर रहता है जिससे शरीर को भी आराम नहीं मिल पा रहा है और आम जनता बेहाल है।

भविष्य का संकट (2026–2030) यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में भारत को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि पिछले 15 दिनों से अधिक लंबी हीटवेव, सभी शहरों/देहातों में भी भरी जल संकट और भूजल स्तर में गिरावट पायी जा रही है। इसके साथ ही ऊर्जा  मांग में भी तीव्र वृद्धि हो रही है। उक्त कारणों से GDP में 4–6% तक संभावित कमी से भी नकारा नहीं जा सकता है।

यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि 2030 के बाद स्थिति और गंभीर हो सकती है, जब तापमान 48–50°C तक पहुँचने की संभावना बनी हुई है। समाधान: क्या किया जा सकता है? इस संकट से निपटने के लिए बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं:

1. पर्यावरणीय उपाय-अब हमें वृक्षारोपण और वन संरक्षण में अभियान स्वरुप सरकार के साथ कन्धा से कंधा मिलाकर काम करना होगा तथा जैव विविधता का संरक्षण के लिए प्रभावी कार्य की आवश्यकता है।

2. ऊर्जा परिवर्तन- यद्यपि भारतवर्ष में वर्तमान सरकार ने आम जनता से लेकर व्यवसायिक संस्थाओं तक तेजी से सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा रहा है , परन्तु इसे वर्ष 2047 तक आत्मनिर्भर भारत के साथ ही ऊर्जा हेतु आत्म निर्भर होना होगा | इसी के साथ – साथ जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना पड़ेगा।

3.जल प्रबंधन- अभी तक भारतवर्ष में सरकार प्रयासों के बावजूद भी आम जनता में वर्षा जल संचयन के बारें में नगण्य जानकारी हो पाई है और नहीं जल संरक्षण तकनीकों का उपयोग का उपयोग किया जा रहा है, केवल कागजी कार्यवाही तक सीमित रह गया है । इस क्षेत्र में अभियान चलाकार जागरूक करने और प्रभावी कार्य करने की आवश्यकता है।

4. शहरी योजना- भारत सरकार ने स्मार्टसिटी व ग्रीन सिटी मॉडल की योजनायें चलाई, इसका कोई प्रभावी असर अभी तक दिखाई न पड़ रहा है और नहीं कम कंक्रीट और अधिक हरियाली ही किसी शहरी अथवा कस्बो पर्याप्त असर छोड़ रहा है। इस पर अधिक प्रभावी कार्य करने की आवश्यकता है ।

5. सामाजिक भागीदारी- उपरोक्त से स्पष्ट है कि जो योजनाये प्रभावीरूप से संचालित  नहीं हो पा रही हैं, उनमें जन-जागरूकता अभियान चलाना तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए  जन आंदोलन चलाना अत्यंत आवश्यक है ।

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