हर मिनट उजड़ते ग्यारह फुटबॉल मैदान जितने जंगल—मानव विकास या विनाश ?

यही आज की कठोर सच्चाई है, जिसे अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

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जलजंगल और जमीन—प्रकृति के ये तीनों आधार स्तंभ समस्त जीव-जगत के जीवन की धुरी हैं। किंतु विडंबना यह है कि आधुनिक और शिक्षित मानव ने अपने तथाकथित विकास की अंधी दौड़ में इन्हीं आधारों का निर्मम दोहन किया है। जंगलों की बलि देकर खड़ी की जा रही विकास यात्रा आज भी अनवरत जारी हैऔर इसके दुष्परिणाम अब स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं। वनों के अंधाधुंध विनाश ने न केवल भारतबल्कि पूरी दुनिया को भीषण तापमान वृद्धि के संकट में धकेल दिया है। एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि हर मिनट लगभग ग्यारह फुटबॉल मैदान के बराबर जंगल नष्ट किए जा रहे हैं। यह आंकड़ा भले ही अविश्वसनीय लगेलेकिन यही आज की कठोर सच्चाई हैजिसे अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मेरीलैंड विश्वविद्यालय की ‘ग्लोबल लैंड एनालिसिस एंड डिस्कवरी लैब’ की रिपोर्ट के अनुसारप्रतिवर्ष लगभग 43 हजार वर्ग किलोमीटर जंगल समाप्त हो जाते हैं—जो कि डेनमार्क जैसे देश के बराबर क्षेत्रफल है। यह आंकड़ा न केवल चिंताजनक हैबल्कि पूरी मानवता के लिए चेतावनी भी है। सन् 2021 में आयोजित जलवायु शिखर सम्मेलन में 100 से अधिक देशों ने वनों की कटाई पर रोक लगाने का संकल्प लिया था। दुर्भाग्यवशइस संकल्प को गिने-चुने देशों ने ही गंभीरता से निभाया। परिणामस्वरूपप्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है।आज बढ़ता तापमानअसमय बाढ़भूस्खलनऔर पेयजल संकट ये सभी प्रकृति के असंतुलन के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। हिमालयी क्षेत्रों मेंजहाँ कभी पंखे की आवश्यकता नहीं पड़ती थीआज वहाँ एयर कंडीशनर की मांग बढ़ रही है। यह परिवर्तन केवल जीवनशैली का नहींबल्कि जलवायु संकट का स्पष्ट संकेत है।

भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए वनों का संरक्षण एक बड़ी चुनौती बन चुका है। हर वर्ष बढ़ती गर्मी और प्राकृतिक आपदाएँ इस संकट को और गहरा कर रही हैं। ऐसे में आवश्यक है कि केंद्र और राज्य सरकारें कठोर कानून बनाएं और हर नागरिक की जिम्मेदारी तय करें। यदि वनों का विनाश इसी गति से जारी रहातो आने वाले दो दशकों में मानव अस्तित्व पर गंभीर संकट मंडरा सकता है। अतः समय की मांग है कि हम सभी वृक्षारोपण को जन-आंदोलन बनाएं और ईमानदारी से जंगलों के पुनर्निर्माण में योगदान दें। प्रकृति का संरक्षण ही मानवता का संरक्षण है।

अरविंद रावल

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