पर्यावरण संकट

हर मिनट उजड़ते ग्यारह फुटबॉल मैदान जितने जंगल—मानव विकास या विनाश ?

जल, जंगल और जमीन—प्रकृति के ये तीनों आधार स्तंभ समस्त जीव-जगत के जीवन की धुरी हैं। किंतु विडंबना यह है कि आधुनिक और शिक्षित मानव ने अपने तथाकथित विकास की अंधी दौड़ में इन्हीं आधारों का निर्मम दोहन किया...
स्वतंत्र विचार  संपादकीय 

लू की हवा का प्रकोप, कैसे सांस लेंगे हम

बेरहम तथा अप्राकृतिक प्रकृति के दोहन का परिणाम अब अपने चरम परिणामों के साथ हमारे सामने खड़ा है। आने वाले महीनों में मौसम वैज्ञानिकों ने जिस तीव्र गर्मी की आशंका जताई है, वह केवल मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि दशकों से...
टेक्नोलॉजी  स्वतंत्र विचार  लाइफस्टाइल  संपादकीय 

गर्मी की मार, गिरता जनस्वास्थ्य: आखिर कब जागेगी नीति-व्यवस्था?

तपता हुआ आसमान अब सिर्फ मौसम का मिज़ाज नहीं, बल्कि एक सुलगता संकट है जो हमारी सांसों, श्रम और अस्तित्व को चुपचाप निगल रहा है। आसमान की तीखी तपिश एक अदृश्य आपदा बन चुकी है, जिसने भारत...
स्वतंत्र विचार  संपादकीय 

तपता मार्च, सूखता पानी: क्या हम असली समस्या से भाग रहे हैं?

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”   सुबह की हवा में अब वसंत की ठंडक नहीं, गर्मी की तीखी आहट है, और यही हाल कई शहरों में फैल चुका है। मार्च 2026 में दिल्ली में पारा  35.7°C तक पहुंचा – पहले...
स्वतंत्र विचार  संपादकीय