पर्यावरण संकट
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हर मिनट उजड़ते ग्यारह फुटबॉल मैदान जितने जंगल—मानव विकास या विनाश ?
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By Swatantra Prabhat UP
जल, जंगल और जमीन—प्रकृति के ये तीनों आधार स्तंभ समस्त जीव-जगत के जीवन की धुरी हैं। किंतु विडंबना यह है कि आधुनिक और शिक्षित मानव ने अपने तथाकथित विकास की अंधी दौड़ में इन्हीं आधारों का निर्मम दोहन किया...
लू की हवा का प्रकोप, कैसे सांस लेंगे हम
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By Swatantra Prabhat UP
बेरहम तथा अप्राकृतिक प्रकृति के दोहन का परिणाम अब अपने चरम परिणामों के साथ हमारे सामने खड़ा है। आने वाले महीनों में मौसम वैज्ञानिकों ने जिस तीव्र गर्मी की आशंका जताई है, वह केवल मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि दशकों से...
गर्मी की मार, गिरता जनस्वास्थ्य: आखिर कब जागेगी नीति-व्यवस्था?
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By Swatantra Prabhat UP
तपता हुआ आसमान अब सिर्फ मौसम का मिज़ाज नहीं, बल्कि एक सुलगता संकट है जो हमारी सांसों, श्रम और अस्तित्व को चुपचाप निगल रहा है। आसमान की तीखी तपिश एक अदृश्य आपदा बन चुकी है, जिसने भारत...
तपता मार्च, सूखता पानी: क्या हम असली समस्या से भाग रहे हैं?
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By Swatantra Prabhat UP
प्रो. आरके जैन “अरिजीत” सुबह की हवा में अब वसंत की ठंडक नहीं, गर्मी की तीखी आहट है, और यही हाल कई शहरों में फैल चुका है। मार्च 2026 में दिल्ली में पारा 35.7°C तक पहुंचा – पहले...

