युद्ध के बारूद से बढ़ता पर्यावरण का तापमान

वैश्विक जल संकट की आशंका

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पश्चिम एशिया के आकाश में बारूद के बादल और जलते तेल-कुओं से उठता धुआँ केवल युद्ध का दृश्य नहीं रचता, बल्कि वह पृथ्वी के तापमान, वायुमंडलीय संतुलन और जल चक्र को भी गहराई से प्रभावित करता है। आज जब दुनिया पहले ही ग्लोबल वार्मिंग के संकट से जूझ रही है, तब युद्ध और सैन्य टकराव इस संकट को कई गुना बढ़ा रहे हैं। यह स्थिति केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि आने वाले समय में एक गंभीर जल संकट की चेतावनी भी है।

पश्चिम एशिया जहाँ मध्य पूर्व के देश जैसे इराक, ईरान, सऊदी अरब और इजराइल स्थित हैं पहले ही जल संसाधनों के मामले में संवेदनशील क्षेत्र रहा है। यहाँ की भौगोलिक बनावट शुष्क है, वर्षा सीमित है और भूजल पर निर्भरता अधिक है। ऐसे में जब युद्ध होते हैं, तो केवल मानव जीवन ही नहीं, बल्कि जल स्रोत भी प्रभावित होते हैं। बमबारी से नदियाँ और जलाशय प्रदूषित होते हैं, तेल के रिसाव से समुद्री जल दूषित होता है और धुएँ के कारण वायुमंडल में कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है।

यह बढ़ता हुआ कार्बन उत्सर्जन सीधे-सीधे पृथ्वी के तापमान को बढ़ाता है, जिससे जल चक्र असंतुलित हो जाता है। कहीं अत्यधिक वर्षा होती है तो कहीं सूखा पड़ता है। इस असंतुलन का सबसे बड़ा प्रभाव जल संसाधनों पर पड़ता है। (संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में भी यह चेतावनी दी गई है कि यदि युद्ध और पर्यावरणीय विनाश इसी तरह जारी रहे, तो आने वाले दशकों में जल संकट वैश्विक संघर्ष का प्रमुख कारण बन सकता है)

भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति और भी चिंताजनक है। भारत में पहले ही भूजल दोहन तेजी से हो रहा है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार देश के कई बड़े शहरों में भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा रहा है। यदि वैश्विक तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो भारत में मानसून का पैटर्न और अधिक अनिश्चित हो जाएगा।

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भारत का लगभग 60% कृषि कार्य वर्षा पर निर्भर है। यदि वर्षा समय पर नहीं होती या अत्यधिक होती है, तो फसलें नष्ट होती हैं और जल संकट गहराता है। इसके साथ ही, हिमालय के ग्लेशियर जो गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के स्रोत तेजी से पिघल रहे हैं। यह स्थिति हिमनद पिघलने का संकेत है, जो प्रारंभ में बाढ़ और बाद में स्थायी जल संकट का कारण बन सकता है। युद्ध का एक और अप्रत्यक्ष प्रभाव यह है कि इससे वैश्विक सहयोग कमजोर होता है।

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जब देश आपसी संघर्ष में उलझे रहते हैं, तब वे जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों पर मिलकर काम नहीं कर पाते। उदाहरण के लिए, पेरिस समझौते जैसे प्रयास तभी सफल हो सकते हैं जब विश्व के देश आपसी सहयोग और आपस में बातचीत बनाए रखें। लेकिन युद्ध की स्थिति में यह सहयोग आपसी सामंजस्य के अभाव के कारण पीछे छूट जाता है।

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भारत के संदर्भ में जल संकट केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं,बल्कि बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी है। ग्रामीण क्षेत्रों में जल की कमी से पलायन बढ़ सकता है, जिससे शहरी क्षेत्रों पर दबाव बढ़ेगा। इसके अलावा, जल संसाधनों को लेकर राज्यों के बीच विवाद भी बढ़ सकते हैं।

इस संकट से निपटने के लिए भारत को बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। सबसे पहले, जल संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी जैसे वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन और जल के पुनर्चक्रण की व्यवस्था। इसके साथ ही, किसानों को जल-संरक्षण आधारित खेती की ओर प्रोत्साहित करना होगा।साथ ही, भारत को वैश्विक स्तर पर भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज़ महत्वपूर्ण है। यदि भारत जैसे देश शांति और सहयोग की पहल करें, तो यह वैश्विक स्तर पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

यह भी समझना अत्यंत आवश्यक होगा कि युद्ध केवल सीमाओं को नहीं जलाता, बल्कि वह भविष्य की पीढ़ियों के लिए जल जैसे मूलभूत संसाधन को भी खतरे में डाल सकता है । पश्चिम एशिया के आकाश में उठते बारूद के बादल हमें यह चेतावनी दे रहे हैं कि यदि हमने समय रहते शांति और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम नहीं उठाए, तो आने वाला समय जल के लिए संघर्ष का समय हो सकता है। पूरा घटनाक्रम हमें केवल चिंता में नहीं डालता, बल्कि यह एक आह्वान भी है शांति का, सहयोग का और प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करने का। क्योंकि जल ही जीवन है, और यदि जल संकट गहराया, तो मानव सभ्यता की नींव ही डगमगा सकती है।

संजीव ठाकुर

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