थाली से लेकर शरीर तक फैलता धीमा जहर,सूरत का खुलासा एक चेतावनी

देशभर में मिलावट की भयावह सच्चाई

Swatantra Prabhat UP Picture
Published On

सूरत के सचिन जीआईडीसी में नकली घी फैक्ट्री का भंडाफोड़ केवल एक स्थानीय अपराध नहीं, बल्कि पूरे देश में फैले मिलावट के संगठित नेटवर्क की गंभीर तस्वीर पेश करता है। 1 किलो शुद्ध घी से 15 किलो नकली घी तैयार करने की तकनीक न सिर्फ कानून का मजाक उड़ाती है, बल्कि आम जनता की सेहत के साथ खुला खिलवाड़ भी है। ‘विदुर’ जैसे नामों के पीछे छिपा यह जहर देश के कई राज्यों तक पहुंच रहा था, जिससे यह साफ हो जाता है कि मिलावट का कारोबार अब छोटे स्तर की धोखाधड़ी नहीं, बल्कि एक बड़ा और संगठित उद्योग बन चुका है।

भारत में खाद्य मिलावट की समस्या नई नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी गंभीरता और विस्तार दोनों तेजी से बढ़े हैं। विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, देश में जांच किए गए खाद्य पदार्थों के नमूनों में से एक बड़ा हिस्सा किसी न किसी रूप में मिलावटी पाया जाता है। कई राज्यों में यह आंकड़ा 20 से 30 प्रतिशत तक पहुंच जाता है, जो बेहद चिंताजनक है। दूध, घी, तेल, मसाले, मिठाइयां, यहां तक कि फल और सब्जियां भी इस जाल से अछूती नहीं हैं। मिलावट अब केवल गुणवत्ता की कमी नहीं रही, बल्कि यह सीधे-सीधे स्वास्थ्य के लिए खतरा बन चुकी है।

मुनाफे की अंधी दौड़ में मिलावटखोरों ने इंसानियत को ताक पर रख दिया है। सूरत के इस मामले में जिस तरह केमिकल, पामोलीन ऑयल और सिंथेटिक फ्लेवर का इस्तेमाल कर नकली घी तैयार किया जा रहा था, वह दिखाता है कि अपराधी कितनी वैज्ञानिक और योजनाबद्ध तरीके से इस काम को अंजाम दे रहे हैं। डॉक्टरों की तरह सिरिंज का इस्तेमाल कर केमिकल की सटीक मात्रा मिलाना इस बात का प्रमाण है कि यह काम केवल अवैध ही नहीं, बल्कि बेहद खतरनाक भी है। ऐसे उत्पाद दिखने और महकने में भले ही असली जैसे लगें, लेकिन इनके सेवन से शरीर के अंदर धीरे-धीरे जहर फैलता है।
मिलावटी खाद्य पदार्थों का सबसे बड़ा खतरा यह है कि इनके दुष्प्रभाव तुरंत दिखाई नहीं देते।

यह धीरे-धीरे शरीर को कमजोर करते हैं और गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं। हृदय रोग, किडनी फेल होना, लिवर डैमेज, कैंसर जैसी घातक बीमारियां लंबे समय तक मिलावटी भोजन के सेवन से जुड़ी हुई हैं। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका असर और भी अधिक खतरनाक होता है, क्योंकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। यही कारण है कि मिलावट केवल एक आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सीधा हमला है।

आज स्थिति यह हो गई है कि आम उपभोक्ता के लिए असली और नकली के बीच अंतर करना बेहद मुश्किल हो गया है। आकर्षक पैकेजिंग, ब्रांडेड लेबल और सस्ते दामों के लालच में लोग अनजाने में ही मिलावटी उत्पाद खरीद लेते हैं। सूरत के मामले में भी ‘विदुर’ ब्रांड के नाम पर नकली घी को असली बताकर बेचा जा रहा था, जिससे उपभोक्ता आसानी से धोखा खा जाते थे। यह प्रवृत्ति केवल एक शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के हर कोने में इस तरह के मामले सामने आते रहते हैं।

मिलावट का यह जाल केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे कस्बों और गांवों तक भी फैल चुका है। थोक व्यापारियों और सप्लाई चेन के जरिए यह नकली सामान दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचाया जाता है। कई बार स्थानीय दुकानदार भी अनजाने में ऐसे उत्पाद बेचते हैं, जिससे यह समस्या और भी जटिल हो जाती है। इसके पीछे एक पूरा नेटवर्क काम करता है, जिसमें निर्माता, सप्लायर और वितरक सभी शामिल होते हैं।

इस समस्या की जड़ में कमजोर निगरानी व्यवस्था और कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन न होना भी शामिल है। हालांकि देश में खाद्य सुरक्षा के लिए कानून मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन सख्ती से नहीं हो पाता। जांच की प्रक्रिया धीमी होती है और दोषियों को सजा मिलने में लंबा समय लग जाता है, जिससे उनके हौसले बुलंद रहते हैं। कई मामलों में जुर्माना भी इतना कम होता है कि वह उनके मुनाफे के सामने नगण्य साबित होता है।

ऐसे में जरूरी है कि मिलावटखोरों के खिलाफ कठोर और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। कानूनों को और सख्त बनाया जाए, ताकि दोषियों को कड़ी सजा मिले और दूसरों के लिए यह एक उदाहरण बन सके। साथ ही, खाद्य पदार्थों की नियमित और व्यापक जांच होनी चाहिए, जिससे बाजार में बिकने वाले उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके। तकनीक का उपयोग कर ट्रैकिंग और मॉनिटरिंग सिस्टम को मजबूत बनाना भी समय की जरूरत है।

सरकार के साथ-साथ उपभोक्ताओं की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। लोगों को जागरूक होना होगा और सस्ते के लालच से बचना होगा। विश्वसनीय ब्रांड और प्रमाणित उत्पादों को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। साथ ही, यदि किसी उत्पाद की गुणवत्ता पर संदेह हो तो उसकी शिकायत संबंधित विभाग में करनी चाहिए। जागरूक उपभोक्ता ही इस समस्या से लड़ने में सबसे बड़ा हथियार बन सकता है।

सूरत का यह कांड एक चेतावनी है कि अगर समय रहते इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं। यह केवल एक शहर या एक राज्य की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश की चुनौती है। मिलावट का यह जहर हमारी थाली में घुलकर हमारी सेहत को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है। अब समय आ गया है कि इस समस्या को गंभीरता से लिया जाए और मिलकर इसके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और स्वस्थ जीवन मिल सके।

कांतिलाल मांडोत

About The Author

Post Comments

Comments

संबंधित खबरें