जब घर ही कब्र बन गया और रिश्ते खामोश गवाह

अपनों के बीच भी अजनबी बनकर दम तोड़ती एक जिंदगी, इंसानियत की दरारें: एक मृत्यु जो पूरे समाज पर सवाल छोड़ गई

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मध्यप्रदेश के इंदौर शहर के नगीन नगर (चंदन नगर थाना क्षेत्रकी तंग गलियों में जब लंबे समय से जमी खामोशी अचानक दरक गईतो उसके भीतर छिपा भयावह सच पूरे इलाके को भीतर तक हिला गया। एक बंद और उपेक्षित मकान से निकली सड़न और रहस्य ने वहां मौजूद हर व्यक्ति को सन्न कर दिया। इसी मकान के भीतर 65 वर्षीय वृद्ध का निर्जीव शरीर कुछ दिनों (लगभग दो दिन) से पड़ा हुआ थाऔर समय के साथ वह उपेक्षा की भयावह तस्वीर बन चुका था। यह घटना केवल मृत्यु की सूचना नहीं थीबल्कि टूटते रिश्तोंबिखरते परिवार और संवेदनहीन होते समाज का दर्दनाक दर्पण थी। बंद दीवारों के भीतर दबी यह चुप्पी अब एक कठोर प्रश्न बनकर खड़ी है—क्या इस आधुनिक युग में इंसान अपने ही घर के भीतर इतना अकेला और असहाय हो सकता है?

सन्नाटे में दबी हुई सच्चाई जब अचानक सांस लेने लगती हैतो उसका पहला स्पर्श ही पूरे वातावरण को हिला देता है। कॉलोनी के बच्चे गली में क्रिकेट खेल रहे थेतभी गेंद अचानक उसी बंद पड़े पुराने मकान के भीतर जा गिरी। गेंद लेने गए बच्चों ने जैसे ही अंदर झांकातेज दुर्गंध और सड़न की भयावह स्थिति ने उन्हें भयभीत कर दिया। भीतर का दृश्य अत्यंत भयावह था—चूहों द्वारा क्षत-विक्षत शव और मौत का गहरा सन्नाटा। यह सच शायद और भी दिनों तक छिपा रहतायदि वह गेंद उस बंद मकान में न जातीजिसने एक अनदेखी और उपेक्षित त्रासदी को उजागर कर दिया।

सूचना मिलते ही चंदन नगर थाना पुलिस तत्काल घटनास्थल पर पहुंचीजहां भीतर का दृश्य अत्यंत भयावह और दिल दहला देने वाला था—कमरे में फैली सड़ांधजड़ हो चुकी खामोशी और लंबे समय से उपेक्षित वातावरण यह स्पष्ट संकेत दे रहे थे कि मृत्यु कई दिन पहले हो चुकी थी और किसी ने उसकी सुध नहीं ली थीशव काफी विकृत अवस्था में थाजिससे यह घटना केवल एक पुलिस जांच का विषय न रहकर समाज की संवेदनहीनता और टूटते पारिवारिक संबंधों का कठोर दर्पण बन गईऔर सबसे बड़ा प्रश्न यही रह गया कि तीन पुत्रों के होते हुए भी यह व्यक्ति अपने अंतिम समय में इस तरह पूर्णतः अकेला क्यों रह गया।

जीवन की कठिन धूप में तपकर यह वृद्ध व्यक्ति वर्षों तक मेहनत-मजदूरी करता रहा और अपने परिवार की ज़िम्मेदारियों को कंधों पर ढोता हुआ बच्चों के भविष्य को संवारने में पूरी उम्र खपा दीअभावों और आर्थिक संघर्षों के बीच भी उसने कभी घर की डोर को टूटने नहीं दिया और हर परिस्थिति में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता रहा। समय के साथ शराब की लत ने उसके जीवन को अवश्य प्रभावित कियालेकिन पिता के हृदय में बसे स्नेह और अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद कभी कम नहीं हुईजबकि विडंबना यह रही कि वही बच्चे धीरे-धीरे उससे दूर होते चले गएत्यागउपेक्षा और टूटते रिश्तों के बीच यह पवित्र सा बंधन अंततः बिखरकर एक दर्दनाक मौन में बदल गया।

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तीन पुत्रों के होते हुए भी यह वृद्ध व्यक्ति अपने अंतिम समय में गहरी एकाकी स्थिति में थावर्षों से चले आ रहे पारिवारिक मतभेदों ने रिश्तों की नींव कमजोर कर दी थीजिसके कारण न कोई मुलाकात बचीन कोई हालचाल लेने वाला और न ही कोई जिम्मेदारी निभाने वाला शेष रहा। जिस पिता ने जीवन भर अपनी संतान के भविष्य को संवारने में अपना सब कुछ लगा दियावही अंततः उपेक्षा का शिकार बन गयाकभी स्नेह और अपनत्व से भरे रक्त संबंध धीरे-धीरे दूरीनाराज़गी और स्वार्थ में बदल गए। यह स्थिति बताती है कि समय के साथ कई रिश्ते भावनाओं से टूटकर केवल औपचारिक औपचारिकता भर रह जाते हैं।

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मृत्यु की सूचना मिलने के बाद जब रिश्तेदारों और पुत्रों को खबर दी गईतो उनका व्यवहार और भी अधिक पीड़ादायक और निराशाजनक थाएक-एक कर सभी ने आने से स्पष्ट इनकार कर दियामानो अंतिम संस्कार कोई पारिवारिक दायित्व नहीं बल्कि एक अनचाहा बोझ हो। एक ओर वृद्ध पिता का निर्जीव शरीर पड़ा थातो दूसरी ओर पुत्रों की संवेदनहीनता और दूरी साफ झलक रही थी। आश्चर्यजनक रूप से संपत्ति को लेकर सक्रियता तो दिखाई दीलेकिन भावनाओंकर्तव्य और मानवीय संवेदना का पूर्ण अभाव उजागर हो गया। यह पूरा दृश्य रिश्तों के पतन और सामाजिक मूल्यों के क्षरण की सबसे कठोर और असहज तस्वीर प्रस्तुत करता है।

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नगीन नगरइंदौर की यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहींबल्कि पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी हैआज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में मोबाइलकाम और व्यक्तिगत स्वार्थ ने पारिवारिक रिश्तों की गर्माहट को लगातार कमजोर कर दिया है। बुजुर्ग घरों में अकेलेपन का जीवन जीने को मजबूर हैंजिनकी देखभाल और हालचाल लेने वाला कोई नहीं बचा। यह घटना उस गहराते सामाजिक संकट को उजागर करती हैजहां इंसान मौजूद होते हुए भी इंसानियत धीरे-धीरे खोती जा रही है। यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गयातो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति और भी भयावह रूप ले सकती है।

यह घटना एक गहरी सामाजिक पीड़ा और विचारणीय सच्चाई को उजागर करती हैजिसे नज़रअंदाज़ करना अब संभव नहीं है। जीवन की वास्तविक संपत्ति न तो धन है और न ही भौतिक सुख-सुविधाएंबल्कि रिश्तों की गरमाहटसम्मान और अपनापन ही उसका असली आधार हैं। यदि हम आज अपने बुजुर्गों की उपेक्षा करते हैंतो यही उपेक्षा कल हमारे अपने जीवन में भी लौट सकती है। यह प्रसंग स्पष्ट चेतावनी देता है कि रिश्तों को समय रहते समझनासंवारना और निभाना ही सबसे बड़ी मानवीय जिम्मेदारी है। अन्यथा अंत में केवल पछतावे का अंधकार शेष रह जाएगा और समाज धीरे-धीरे उस संवेदनहीन दिशा में बढ़ता जाएगाजहां इंसान होते हुए भी इंसानियत का अर्थ खोने लगता है।

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

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