मतदाता सूची पर बड़ा फैसला: गुजरात हाईकोर्ट ने कहा— राज्य निर्वाचन आयोग नाम जोड़ने-हटाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं रखता

आयोग केवल विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची को ही अपनाने (प्रतिरूपित करने) का काम करता है

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ब्यूरो प्रयागराज- गुजरात हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि राज्य निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं है। आयोग केवल विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची को ही अपनाने (प्रतिरूपित करने) का काम करता है।

हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक महिला ने अहमदाबाद नगर निगम चुनाव में भाग लेने के लिए अपनी नामावली में नाम शामिल करने की मांग की थी। बता दें, महिला का नाम पहले प्रारंभिक सूची में शामिल नहीं किया गया, जबकि बाद में उसका आवेदन स्वीकार कर लिया गया।

जस्टिस एन.एस. संजय गौड़ा और जस्टिस जे.एल. ओदेदरा की खंडपीठ ने कहा, “राज्य निर्वाचन आयोग का यह तर्क कि याचिकाकर्ता का नाम प्रारंभिक सूची प्रकाशित होने के बाद जोड़ा गया, इसलिए उसे शामिल नहीं किया जा सकता यह तर्क असंगत और निरर्थक है। आयोग का कार्य केवल विधानसभा की मतदाता सूची को अपनाना है, न कि उसमें स्वतंत्र रूप से बदलाव करना।”

मामले के अनुसार महिला का नाम पहले संबंधित विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में नहीं था, जो नगर निगम की मतदाता सूची का आधार होती है। उसने 23 मार्च, 2026 को अपना नाम जोड़ने के लिए आवेदन किया, जिसे 1 अप्रैल, 2026 को स्वीकार कर लिया गया।

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अदालत ने कहा कि कानूनी रूप से इसका अर्थ यह है कि महिला का नाम विधानसभा की मतदाता सूची में मान्य माना जाएगा। चूंकि नगर निगम की सूची उसी पर आधारित होती है, इसलिए उसे मतदान और चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार मिल जाता है।

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हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि महिला का आवेदन नामांकन की अंतिम तिथि से पहले स्वीकार कर लिया गया, इसलिए उसे चुनाव में भाग लेने से वंचित नहीं किया जा सकता।

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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ने अपना पक्ष मजबूत तरीके से साबित किया है और उसका नाम साबरमती वार्ड संख्या 4 की मतदाता सूची में शामिल किया जाना चाहिए। इसके साथ ही उसे चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार भी मिलेगा।

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