माता के तप, त्याग और साधना की अद्भुत कथा

माता ब्रह्मचारिणी साधना और तप की अधिष्ठात्री देवी हैं, वे हमें यह सिखाती हैं कि जीवन में कोई भी लक्ष्य बिना कठिन परिश्रम और धैर्य के प्राप्त नहीं होता

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नवरात्रि का दूसरा दिन देवी दुर्गा के द्वितीय स्वरूप माता ब्रह्मचारिणी को समर्पित, उन्हें कोटि-कोटि प्रणाम। यह स्वरूप तपस्या, संयम, त्याग और अदम्य साधना का प्रतीक माना जाता है। ‘ब्रह्मचारिणी’ शब्द दो भागों से मिलकर बना है ब्रह्म’ अर्थात् तप या परम सत्य, और ‘चारिणी’ अर्थात् आचरण करने वाली। अर्थात् जो ब्रह्म (तप) का आचरण करती हैं, वही ब्रह्मचारिणी हैं। यह रूप हमें जीवन में धैर्य, आत्मसंयम और लक्ष्य के प्रति अटूट निष्ठा का संदेश देता है।

माता ब्रह्मचारिणी का स्वरूप और प्रतीकात्मकता माता ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत साधारण, सौम्य और तपस्विनी है। वे नंगे पैर चलने वाली, हाथ में जपमाला और कमंडल धारण किए हुए दिखाई देती हैं। उनका यह स्वरूप बाहरी आडंबर से दूर रहकर आत्मिक शक्ति की ओर संकेत करता है। जपमाला साधना और ध्यान का प्रतीक है, जबकि कमंडल तप और त्याग का प्रतिनिधित्व करता है। उनके मुख पर दिव्य तेज और शांति का भाव होता है, जो साधना के उच्चतम स्तर को दर्शाता है। माता ब्रह्मचारिणी की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, पूर्व जन्म में माता ब्रह्मचारिणी का जन्म राजा हिमालय के घर पुत्री के रूप में हुआ था, जिनका नाम पार्वती था। बचपन से ही उनका मन भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए समर्पित था। देवर्षि नारद ने उन्हें शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या का मार्ग बताया।इसके बाद माता पार्वती ने घोर तपस्या आरंभ की। उन्होंने हजारों वर्षों तक कठिन व्रत और संयम का पालन किया।

प्रारंभ में उन्होंने फल-फूल खाकर जीवन व्यतीत किया, फिर केवल पत्तों पर रहने लगीं। अंततः उन्होंने अन्न और जल का भी त्याग कर दिया। उनकी इस कठोर तपस्या के कारण उन्हें ‘अपर्णा’ नाम से भी पुकारा गया, जिसका अर्थ  वह जिसने पत्तों तक का त्याग कर दिया। उनकी तपस्या इतनी प्रबल थी कि देवता, ऋषि और स्वयं ब्रह्मा भी प्रभावित हुए। अंततः भगवान शिव उनकी इस कठोर साधना से प्रसन्न हुए और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। यही तपस्विनी पार्वती नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी के रूप में पूजी जाती हैं।

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माता ब्रह्मचारिणी साधना और तप की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे हमें यह सिखाती हैं कि जीवन में कोई भी लक्ष्य बिना कठिन परिश्रम और धैर्य के प्राप्त नहीं होता। उनका स्वरूप आत्म-नियंत्रण, त्याग और संकल्प की शक्ति का प्रतीक है। उनकी आराधना से भक्तों को मानसिक शांति, आत्मबल और दृढ़ता प्राप्त होती है। यह माना जाता है कि जो साधक सच्चे मन से माता ब्रह्मचारिणी की पूजा करता है, उसे अपने जीवन के संघर्षों में सफलता मिलती है और उसके मार्ग की सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा विशेष विधि से की जाती है।

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भक्त प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और माता की प्रतिमा या चित्र के सामने दीप, धूप और फूल अर्पित करते हैं। उन्हें शक्कर, मिश्री और पंचामृत का भोग लगाया जाता है, जो दीर्घायु और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। माता ब्रह्मचारिणी का स्वरूप हमें यह सिखाता है कि कठिनाइयों से घबराकर पीछे हटना नहीं चाहिए। निरंतर प्रयास, संयम और विश्वास के साथ हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।

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आज के भौतिकवादी युग में, जहां लोग त्वरित सफलता की चाह रखते हैं, माता ब्रह्मचारिणी हमें धैर्य और साधना का महत्व समझाती हैं।निष्कर्षतः, माता ब्रह्मचारिणी केवल एक देवी स्वरूप नहीं, बल्कि जीवन की उस साधना का प्रतीक हैं, जो हमें आत्मबल, शांति और सफलता की ओर ले जाती है। उनकी कथा हमें यह प्रेरणा देती है कि यदि संकल्प अडिग हो, तो असंभव भी संभव हो जाता है।

संजीव ठाकुर

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