छह साल तक फैसला न सुनाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, इलाहाबाद हाइकोर्ट से तीन मामले अपने पास मंगाए

याचिका में अनुच्छेद 14 और 21 के तहत त्वरित न्याय के अधिकार के उल्लंघन का मुद्दा उठाया गया

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सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाइकोर्ट द्वारा छह साल तक फैसला सुरक्षित रखने के बावजूद निर्णय न सुनाए जाने पर कड़ा रुख अपनाते हुए तीन आपराधिक पुनर्विचार याचिकाएं अपने पास स्थानांतरित कर ली हैं। इन मामलों के लंबित रहने के कारण वर्ष 1994 के एक हत्या मामले की सुनवाई वर्षों से ठप पड़ी हुई।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 139ए का प्रयोग करते हुए कहा कि सामान्यतः अदालतें अनुच्छेद 32 की याचिका में इस तरह की असाधारण शक्ति का उपयोग नहीं करतीं लेकिन इस मामले में न्याय में हो रही असाधारण देरी से पीड़ित पक्ष के त्वरित न्याय के अधिकार पर सीधा असर पड़ रहा है।

पीठ ने कहा कि संबंधित तीनों आपराधिक पुनर्विचार याचिकाओं पर इलाहाबाद हाइकोर्ट में 5 फरवरी 2020 को सुनवाई पूरी हो चुकी थी और उसी दिन फैसला सुरक्षित रख लिया गया। इसके बाद अब तक कोई निर्णय नहीं दिया गया और मामले बार-बार सूचीबद्ध होकर टलते रहे। हाल ही में 4 फरवरी 2026 को भी मामले सूची में आए, लेकिन फिर स्थगित कर दिए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इन याचिकाओं पर लगी रोक के कारण ट्रायल कोर्ट में चल रहा मुकदमा आगे नहीं बढ़ सका, जिसके चलते 30 मई 1994 की घटना से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही दशकों से रुकी हुई।

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पीठ ने कहा, “इन मामलों का लंबित रहना केवल पक्षकारों का निजी विवाद नहीं रह गया। यह इस बात से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है कि मुकदमों में लंबी देरी न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कैसे प्रभावित करती है और इससे अपूरणीय क्षति हो सकती है।”

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इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 139ए के तहत इलाहाबाद हाइकोर्ट में लंबित तीनों पुनर्विचार याचिकाओं को अपने पास मंगाने का आदेश दिया और उन्हें वर्तमान रिट याचिका के साथ जोड़कर सुनवाई करने का निर्णय लिया। अदालत ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि तीन सप्ताह के भीतर सभी अभिलेख सुप्रीम कोर्ट भेजे जाएं।

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यह याचिका मृतक के कानूनी उत्तराधिकारी द्वारा अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई। याचिका में अनुच्छेद 14 और 21 के तहत त्वरित न्याय के अधिकार के उल्लंघन का मुद्दा उठाया गया।

मामले की शुरुआत वर्ष 1995 में दर्ज FIR से हुई, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 147, 148, 149, 302 और 307 के तहत नौ लोगों को आरोपी बनाया गया।

एक अन्य आरोपी के खिलाफ मामला वर्ष 2004 में दर्ज हुआ, क्योंकि वह पहले फरार था। वर्ष 2008 में उत्तर प्रदेश सरकार ने आरोपी छोटेय सिंह के खिलाफ मुकदमा वापस लेने का प्रस्ताव दिया और 2012 में CrPC की धारा 321 के तहत आवेदन दाखिल किया। बाद में सरकार ने सभी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की मांग भी की।

19 मई 2012 को ट्रायल कोर्ट ने छोटेय सिंह के खिलाफ अभियोजन वापसी की अनुमति दी, लेकिन अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की मांग खारिज की।

इसी आदेश को चुनौती देते हुए आरोपियों ने हाइकोर्ट में आपराधिक पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल कीं, जबकि पीड़ित पक्ष ने छोटेय सिंह के खिलाफ मुकदमा वापस लेने के फैसले को चुनौती दी। इन याचिकाओं की सुनवाई इलाहाबाद हाइकोर्ट में पूरी होने के बाद 5 फरवरी 2020 को फैसला सुरक्षित रख लिया गया। उसी दौरान मुकदमे की सुनवाई पर रोक भी लगा दी गई, जो आज तक जारी रही।

इस मामले से जुड़े एक अन्य पहलू पर सुप्रीम कोर्ट ने 15 जुलाई, 2024 को भी हस्तक्षेप किया। उस समय अदालत ने हाइकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामले का पुनर्मूल्यांकन करने का निर्देश दिया था और मुकदमे में हो रही देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने अब कहा कि जब तक लंबित पुनरीक्षण याचिकाओं पर निर्णय नहीं होता, तब तक 2024 के आदेश का प्रभावी पालन संभव नहीं है। इसलिए न्याय प्रक्रिया को प्रभावी बनाने और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए इन मामलों को अपने पास स्थानांतरित करना आवश्यक हो गया।

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