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होली एआई रे…
रंगों से ज़्यादा फ़िल्टर का त्योहार
जानिए कैसे डिजिटल युग में रंगों से ज़्यादा फ़िल्टर और डेटा का त्योहार बन गई है
होली एआई रे…
रंगों से ज़्यादा फ़िल्टर का त्योहार
होली आई रे… नहीं साहब, इस बार होली एआई रे!
अब न पिचकारी असली रही, न रंग असली—सब कुछ “अपडेटेड वर्ज़न” में आ गया है। मोहल्ले की गली में अबीर-गुलाल कम और मोबाइल के कैमरे ज़्यादा उड़ते दिखाई देते हैं। पहले लोग होली पर गले मिलते थे, अब “फेस रिकॉग्निशन” से पहचानते हैं—“अरे तुम ही हो न? वही जो पिछले साल मेरे ऊपर पक्का रंग डालकर भाग गए थे?” अब बदला भी डिजिटल हो गया है। एआई बता देता है कि किसने किस पर कितना रंग लगाया और किसने फोटो में कितनी मुस्कान एडिट की।कहते हैं होली बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। भक्त प्रह्लाद की भक्ति और होलिका के दहन की कथा हम बचपन से सुनते आए हैं। पर आजकल लगता है कि असली होलिका तो हमारी प्राइवेसी है, जो हर साल सोशल मीडिया की अग्नि में स्वाहा हो जाती है।अब देखिए, पहले मथुरा-वृंदावन की होली की चर्चा होती थी, लोग मथुरा और वृंदावन जाने का सपना देखते थे। अब सपना यह होता है कि “रील” वायरल हो जाए। रंग से ज्यादा फिक्र इस बात की होती है कि वीडियो पर कितने व्यूज़ आए। कोई गुलाल लगाने से पहले पूछता है—“भाई, कैमरा ऑन है न?”एआई का कमाल देखिए—अब होली की शुभकामनाएँ भी इंसान नहीं, “चैटबॉट” लिखते हैं। एक क्लिक में सौ लोगों को एक जैसा संदेश—“रंगों का त्योहार आपके जीवन में खुशियों की बहार लाए।” बहार तो ठीक है, पर मौलिकता का क्या?मोहल्ले के शर्मा जी ने इस बार “स्मार्ट पिचकारी” खरीदी है। कहते हैं इसमें सेंसर लगा है—जो सामने वाले के कपड़ों की कीमत पहचानकर उसी हिसाब से रंग की मात्रा तय करता है। महंगे कपड़े पर हल्का गुलाल, सस्ते पर पूरा टैंक खाली! तकनीक का न्याय भी बड़ा विचित्र है।बच्चे अब कीचड़ में नहीं कूदते, वे “वर्चुअल होली गेम” खेलते हैं। स्क्रीन पर रंग उड़ाते हैं और असली कपड़े साफ रखते हैं। मां-बाप भी खुश—न कपड़े धुलेंगे, न गली में शिकायत आएगी।
और नेताओं की होली? वह भी एआई-प्रूफ हो गई है। भाषण पहले से ही “डेटा एनालिसिस” से तैयार—किस मोहल्ले में कितनी मिठास घोलनी है, किस वर्ग पर कितना रंग डालना है, सब एल्गोरिद्म तय करता है।पर इस व्यंग्य के बीच एक सच भी छिपा है—तकनीक ने सुविधाएँ दी हैं, पर त्योहार की आत्मा अभी भी दिलों में बसती है। होली का असली रंग तब चढ़ता है जब रूठे मन मान जाते हैं, जब बिना फिल्टर की हँसी गूंजती है, जब रिश्तों की पिचकारी सच्चे स्नेह से भीगती है।तो आइए, इस बार “होली एआई रे…” कहते हुए भी इंसानियत का रंग फीका न पड़ने दें। तकनीक का आनंद लें, पर रिश्तों को ऑफलाइन ही रखें। क्योंकि असली होली वही है, जो दिल से खेली जाए—बिना डेटा पैक और बिना एडिट के।

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