भारतीय लोकतंत्र: प्रतिस्पर्धा में शुचिता और विरोध में मर्यादा
प्रो. (डॉ.) मनमोहन प्रकाश
भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक सुंदरता उसकी वैचारिक विविधता, सहिष्णुता और संवाद की प्राचीन एवं स्वस्थ परंपरा में निहित है। मतभेद, विचारों का संघर्ष और नीतियों पर सार्थक बहस किसी भी जीवंत लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वाभाविक पहचान होते हैं। किंतु जब यही मतभेद व्यक्तिगत कटुता में परिवर्तित हो जाते हैं और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा मर्यादा की सीमाएँ लाँघने लगती है, तब लोकतंत्र की मूल आत्मा को कहीं न कहीं क्षति पहुँचती है। जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि वे राजनीति के सर्वोच्च सिद्धांत ‘प्रतिस्पर्धा में शुचिता और विरोध में मर्यादा’ का सदैव पालन करें।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अपरिहार्य है, क्योंकि यही सत्ता को उत्तरदायी बनाती है और जनहित के प्रश्नों को विमर्श के केंद्र में लाती है। किंतु वर्तमान समय में यह चिंता का विषय है कि अनेक अवसरों पर यह प्रतिस्पर्धा ‘लोक-सेवा’ की भावना से भटककर ‘व्यक्तिगत विजय’ और ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ का रूप लेती प्रतीत होती है। जब चुनाव विकास, नीति और दूरदृष्टि के मूल्यांकन के स्थान पर केवल विरोधी को नीचा दिखाने तथा किसी भी प्रकार से पराजित करने का माध्यम बन जाते हैं, तब लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गरिमा प्रभावित होती है। चुनावी विमर्श में तथ्यपरक संवाद के स्थान पर आरोप-प्रत्यारोप, आधे-अधूरे सत्य और डिजिटल मंचों पर अमर्यादित भाषा का बढ़ता प्रयोग किसी स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता।
यह तथ्य भी सही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है; उसे लोकतंत्र की ‘अंतरात्मा’ माना गया है। सत्ता के निर्णयों की समीक्षा करना और जनहित के मुद्दों को मुखरता से उठाना विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है। किंतु जब यह विरोध नीति-केंद्रित न रहकर व्यक्ति-केंद्रित हो जाता है, तब उसकी रचनात्मक उपयोगिता समाप्त होने लगती है। दुर्भाग्यवश, आज कई अवसरों पर तर्क और तथ्यों के स्थान पर कटु भाषा, अप्रिय दृश्य और भावनात्मक उत्तेजना देखने को मिलती है। संसद और विधानसभाएँ संवाद के सर्वोच्च मंच हैं; वहाँ निरंतर व्यवधान और संवादहीनता न केवल विधायी कार्यों को बाधित करती है, बल्कि लोकतंत्र की श्रेष्ठ परंपराओं को भी कमजोर करती है।
सत्ता पक्ष पर भी लोकतांत्रिक आचरण का आदर्श प्रस्तुत करने की विशेष जिम्मेदारी होती है। सत्ता का स्वरूप स्वभावतः विनम्र, सहिष्णु और समावेशी होना चाहिए। आलोचना को शत्रुता के रूप में देखना या असहमति के स्वर को दबाने का प्रयास करना लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रतिकूल है। यदि सत्ता पक्ष विपक्ष को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आवश्यक पूरक माने, तो संवाद की संस्कृति सुदृढ़ होती है और देश के लिए निर्मित नीतियाँ अधिक संतुलित एवं सर्वमान्य बनती हैं। इसी प्रकार, विपक्ष के लिए भी यह आवश्यक है कि वह केवल विरोध के लिए विरोध करने के स्थान पर विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाए और जनहित के सकारात्मक प्रयासों का निष्पक्ष समर्थन करे।
इस समग्र प्रक्रिया में लोकतंत्र की अंतिम और सबसे बड़ी शक्ति जनता के विवेक में निहित है। मतदाताओं की समझ ही लोकतांत्रिक व्यवस्था का वास्तविक आधार होती है। यदि उत्तेजक भाषणों और मर्यादा-विहीन आचरण को सामाजिक मौन या परोक्ष स्वीकृति मिलती है, तो उसका दुष्परिणाम अंततः राष्ट्र को ही भुगतना पड़ता है। राजनीतिज्ञ प्रायः उसी मार्ग का अनुसरण करते हैं, जिसे जनता का समर्थन प्राप्त होता है; अतः नागरिकों का यह प्राथमिक दायित्व है कि वे मर्यादित, तथ्यपरक और रचनात्मक राजनीति को प्रोत्साहित करें।
अंततः, राजनीति का चरित्र उसकी मर्यादा से ही निर्धारित होता है। यदि प्रतिस्पर्धा से शुचिता लुप्त हो जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र की ओर अग्रसर हो सकता है। भारत की महानता का मूल्यांकन केवल आर्थिक आँकड़ों से नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक गरिमा, संवाद की संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों के श्रेष्ठ आचरण से भी किया जाएगा।

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