मोबाइल, नेटवर्क और सपने: लेकिन महिलाएं अब भी बाहर क्यों?

डिजिटल बराबरी का अधूरा सपना और भारतीय महिलाएं, इंटरनेट के दौर में स्त्री का संघर्ष: सुविधा से सम्मान तक

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कृति आरके जैन

हर सुबह घर में रोशनी से पहले जिम्मेदारियां जाग जाती हैंऔर उसी के साथ एक महिला भी। मोबाइल की चमक दीवारों तक पहुंचती हैलेकिन उसकी हथेली तक नहीं। वह चूल्हे की आग में अपनी थकान घोलती हैबच्चों के सपनों को आकार देती हैपानी की कतार में खड़ी होकर दिन की नींव रखती है। उसी घर में रखा फोन किसी और की उंगलियों में पूरी दुनिया समेटे रहता हैजबकि वह अपने ही घर में डिजिटल अंधेरे में जीती रहती है। चमकते नारों और विज्ञापनों के पीछे एक दबा हुआ दर्द छिपा हैजहां करोड़ों महिलाएं तकनीक के दरवाजे पर खड़ी होकर भी भीतर नहीं जा पातीं। उनके पास घर हैरिश्ते हैंजिम्मेदारियां हैंलेकिन अपने भविष्य को गढ़ने का डिजिटल अधिकार नहीं है। यह कहानी सुविधा की नहींछीनी गई पहचान की पीड़ा है।

भारत गर्व के साथ खुद को तकनीकी शक्ति कहता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसऑनलाइन बैंकिंगडिजिटल भुगतान और वर्चुअल शिक्षा आधुनिकता के प्रतीक बन चुके हैं। शहरों की ऊंची इमारतों से लेकर गांव की कच्ची गलियों तक इंटरनेट की लहर दौड़ रही है। लेकिन इस विकास के रंगमंच पर महिलाओं की भूमिका अक्सर दर्शक की बनी रहती है। ग्रामीण और मध्यमवर्गीय घरों में स्मार्टफोन आज भी पुरुषों की निजी जागीर समझा जाता है। महिलाएं अनुमति की दहलीज लांघकर ही उसे छू पाती हैं। सरकारी योजनाओंनौकरी के पोर्टलों और बैंकिंग ऐप्स तक उनकी पहुंच अधूरी रहती है। यह अधूरापन उन्हें हर दिन प्रगति की दौड़ में और पीछे धकेल देता है।

इस डिजिटल दूरी की जड़ें नेटवर्क की कमजोरी में नहींबल्कि सदियों पुरानी मानसिकता में गहराई तक धंसी हुई हैं। आज भी कई घरों में फोन महिलाओं की स्वतंत्रता पर पहरा माना जाता है। उनकी आज़ादी को संदेह और नियंत्रण की जंजीरों में जकड़ दिया जाता है। डिजिटल शिक्षा के अभाव में वे खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। उन्हें हर क्लिक से डर लगता हैहर लिंक में खतरा नजर आता है। साइबर अपराधडीपफेक और ऑनलाइन अपमान का भय उनके मन में स्थायी साया बनकर बैठ जाता है। यह डर धीरे धीरे उनकी जिज्ञासाआत्मसम्मान और आगे बढ़ने की इच्छा को खामोशी से निगल जाता है।

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घर की चारदीवारी के भीतर महिलाओं पर टिका अदृश्य बोझ इस असमानता को और मजबूत करता है। बिना किसी वेतनसम्मान या अवकाश के वे दिनभर चूल्हेबच्चोंबुजुर्गों और जरूरतों के बीच खुद को खपा देती हैं। उनका हर दिन दूसरों के लिए शुरू होता है और दूसरों पर ही खत्म हो जाता है। सीखनेसमझने और आगे बढ़ने के लिए उनके पास न समय बचता हैन ऊर्जा। गांवों में पानी और ईंधन की तलाश लड़कियों की पढ़ाई और डिजिटल दुनिया दोनों छीन लेती है। तकनीक उनके लिए एक दूर चमकता सपना बन जाती हैजिसे वे सिर्फ दूसरों की उंगलियों में साकार होते देखती हैं।

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इस डिजिटल खाई का सबसे गहरा घाव महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता पर पड़ता है। आज रोज़गार और कमाई के नए रास्ते इंटरनेट की गलियों से होकर गुजरते हैं। ऑनलाइन व्यापारफ्रीलांसिंगडिजिटल सेवाएं और गिग वर्क उन्हें आत्मनिर्भर बना सकते थे। लेकिन साधनों की कमी उनके सपनों पर ताला लगा देती है। किसान महिलाएं आधुनिक तकनीक से वंचित रहकर कम उपज और कम आय तक सीमित रह जाती हैं। मध्यमवर्गीय महिलाएं घर बैठे काम करने के अवसर खो देती हैं। उनकी मेहनतप्रतिभा और हुनर बाजार की रोशनी तक पहुंच ही नहीं पाते।

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जमीनी सच्चाइयों की कहानियां इस पीड़ा को और तीखा बना देती हैं। कोई महिला महीनों की मेहनत से बनाई गई हस्तकला को ऑनलाइन मंच नहीं दे पाती। कोई छात्रा कमजोर नेटवर्क के कारण अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ देती है। कोई बीमार महिला डॉक्टर से संपर्क न कर पाने के कारण चुपचाप दर्द सहती रहती है। कई महिलाएं सोशल मीडिया पर अपमानधमकी और ट्रोलिंग के डर से अपनी आवाज दबा लेती हैं। वे धीरे धीरे पीछे हट जाती हैंजैसे खामोशी ही उनकी नियति बन गई हो।

सरकार और संस्थाओं ने बदलाव की कोशिशें जरूर की हैंलेकिन वे अब भी अधूरी और कमजोर हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू होते हैंपर महिलाओं तक सही ढंग से नहीं पहुंच पाते। नेटवर्क गांवों की सीमाओं पर आकर दम तोड़ देता है। डेटा गरीब महिलाओं के लिए आज भी भारी बोझ बना हुआ है। साइबर सुरक्षा कानून और सहायता तंत्र कमजोर हैं। नीतियां कागजों पर आकर्षक दिखती हैंलेकिन जमीन पर उनका असर फीका पड़ जाता है। जब तक योजनाएं महिलाओं की वास्तविक जिंदगी और जरूरतों से नहीं जुड़ेंगीतब तक डिजिटल बराबरी का सपना अधूरा ही रहेगा।

यह डिजिटल असमानता केवल वर्तमान की समस्या नहीं हैबल्कि आने वाली पीढ़ियों की किस्मत भी तय कर रही है। जब एक मां तकनीक की दुनिया से बाहर रह जाती हैतो उसकी बेटी भी आत्मविश्वास और अवसरों से वंचित हो जाती है। शिक्षास्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में यह दूरी पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती चली जाती है। समाज में जब आत्मनिर्भर और सशक्त महिलाओं की संख्या घटती हैतो विकास की रफ्तार खुद ही थमने लगती है। तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की कमजोर मौजूदगी देश की रचनात्मकता और नवाचार शक्ति को खोखला कर देती है। यह पराजय सिर्फ महिलाओं की नहींबल्कि पूरे राष्ट्र की सामूहिक हार बन जाती है।

अब आधे-अधूरे प्रयासों का समय बीत चुका हैयह निर्णायक बदलाव का क्षण है। महिलाओं के लिए हर गांव और हर मोहल्ले में डिजिटल प्रशिक्षण केंद्र बनने चाहिए। हर लड़की और हर महिला को सस्तासुरक्षित और निजी स्मार्टफोन मिलना चाहिए। परिवारों में यह चेतना जागृत करनी होगी कि मोबाइल आज विलासिता नहींबल्कि शिक्षारोजगार और सम्मान का साधन है। साइबर सुरक्षा और डिजिटल अधिकारों की शिक्षा अनिवार्य बनानी होगी। गांवों में मजबूत नेटवर्कसामुदायिक इंटरनेट केंद्र और तकनीकी सहायता केंद्र स्थापित करने होंगे। साथ ही महिलाओं को डिजिटल उद्यमिता के लिए वित्तमार्गदर्शन और बाजार से जोड़ना होगा।

कल्पना नहींअब एक नए भारत की जरूरत है — ऐसा भारत जहां किसी महिला की सुबह चूल्हे की आग से नहींबल्कि उसके अपने मोबाइल की रोशनी से शुरू हो। जहां वह डर और अनुमति के बिना बैंकिंग करेपढ़ाई करेकारोबार बढ़ाए और दुनिया से बराबरी के साथ संवाद करे। जहां तकनीक उसकी सीमाएं तय न करेबल्कि उसके सपनों को दिशा और गति दे। जहां डिजिटल समानता सिर्फ सरकारी दस्तावेजों की भाषा न होकर हर घर की सच्चाई बने। यह सवाल सुविधा का नहींबल्कि सम्मानअधिकार और आत्मसम्मान का है। जिस दिन हर महिला डिजिटल रूप से सशक्त होगीउसी दिन भारत सच मायनों में विकसित कहलाएगा। अब वक्त आ गया है कि फोन केवल घर में मौजूद न रहेबल्कि हर महिला के हाथ में उसकी ताकत बनकर पहुंचे।

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