कविता - रिश्वतखोरी-शर्मसार करते रिचार्ज

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रिश्वतखोरी-शर्मसार करते रिचार्ज...!
 
अंतिम सांस गिन रहीं हैं इंसानियत,
रिश्वतखोरों की पौ बारह वहशियत।
मौत मुनाफे की दुकानों पे नाच रहीं,
दुनिया भयानक उत्सव देखती रहीं।
 
यह बेंगलुरु की हृदयविदारक घटना,
इससे किसी का ध्यान नहीं हैं हटना।
समाज की आत्मा चस्पा स्याह धब्बा,
बेटी के शव पे हुए हैं सौदे हाय रब्बा।
 
एम्बुलेंस ड्राइवर ने मांगे पांच हजार,
पोस्टमार्टम के नाम लिए दस हजार।
रिपोर्ट के लिए पुलिस ने पांच हजार,
क्लर्क ने 'मृत्यु प्रमाण-पत्र' दो हजार।
 
निर्लज्ज सौदेबाजी की फुसफुसाहटें,
वहाँ गड्डियों में नापी जा रही आहटे।
क्या? लाश पर भी हैं डिलीवरी चार्ज,
इंसानियत को शर्मसार करते रिचार्ज।
(संदर्भ-पिता की गोद में 34 वर्षीय बेटी की लाश-संवेदनहीन सिस्टम।)
 
संजय एम तराणेकर

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