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कविता/कहानी  साहित्य/ज्योतिष 

संजीव -नी।

संजीव -नी। चलो थोडा मुस्कुराते है।।चलो थोडा मुस्कुराते है,इस दवा को आजमाते है.कठिनाई में खिलखिलाते है,मुसीबत में भी मुस्कुराते हैं।जिसकी आदत है मुस्कुराना,वो ही ज़माने को हँसातें है।निराशा,विषाद में क्या रखा है मित्रो,उदासी को...
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संजीव-नी। हमें फकीरी का भी बोझा ढोने दो।।

संजीव-नी। हमें फकीरी का भी बोझा ढोने दो।। संजीव-नी।    हमें फकीरी का भी बोझा ढोने दो।।    अपने खून को कई रगों में बहनें दो, कई जिस्मो में उसे जिन्दा रहने दो।    खुदा-खुदा करके जीती है दुनिया , मासूमियत को जिंदगी में सांस लेने दो।    रक्त,देह,नेत्र दान तो महान...
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संजीव-नी। कोई कविता नहीं लिखता

संजीव-नी। कोई कविता नहीं लिखता संजीव-नी।कोई कविता नहीं लिखता सड़क के लिए?सड़क बेचारीकभी सुनसान, कभी बियाबानकभी पथरीले, कभी कटीले,भीड़ के हादसे को सहते,मशीनी हाथियों का सैलाबदर्द सहती, गुमसुमचलती जाती है,दर्द की अभिव्यक्तिकिससे कहें, किसकी सुने,...
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पुस्तक समीक्षा......"संघर्ष का सुख।"

पुस्तक समीक्षा......                    बड़ा और  भला होने में बड़ा फर्क है ।बड़ा तो चतुराई से तिकड़म से बना जा सकता हैं । लोग बने भी हैं , बन भी रहे हैं ।पर भला बनना  तपस्या है , जो सबके बूते का...
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मुझे सिर्फ एक घर नहीं, एक छत भी  चाहिए

मुझे सिर्फ एक घर नहीं, एक छत भी  चाहिए मुझे सिर्फ एक घर नहीं, एक छत भी  चाहिए, जहां बैठकर मैं शहर की खूबसूरती को निहार सकूं l मुझे सिर्फ एक घर नहीं, एक खिड़की भी चाहिए, जहां बैठकर मैं बाहर के नजारे झांक सकूं l मुझे सिर्फ एक...
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क्यूँ ?

क्यूँ ? क्यू तुम मेरे व्यक्तित्व पर अपना व्यक्तित्व थोपते हो ? क्यू मेरे इंन्द धनुषी स्वपनो को अपनी इच्छाओं के काले बादल से ढकते हो क्यूं मेरे हिरन रूपी मन के पैरों में अपने आदेशों की बेडियाँ जकड़ते हो?   क्यूँ क्यू...
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हास्य व्यंग कवि ने कविता के माध्यम से किया किसान सम्मेलन की शुरुआत

हास्य व्यंग कवि ने कविता के माध्यम से किया किसान सम्मेलन की शुरुआत उत्तर प्रदेश किसान सभा के जिला सम्मेलन के अवसर पर एक कवि सम्मेलन ग्राम डेेढुवा में हुआ. जिसमें हास्य-व्यंग्य के कवि जितेंद्र श्रीवास्तव "जित्तू भैयाने अपना काव्य पाठ करते हुए पढ़ा..
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सिमरन ठक्कर नहीं रही - जानते है कैसे बचाये लटक के मरने वालो को  डॉ सुमित्रा अग्रवाल जी से 

सिमरन ठक्कर नहीं रही - जानते है कैसे बचाये लटक के मरने वालो को  डॉ सुमित्रा अग्रवाल जी से     सब जानते है की मृत्यु अटल सत्य है और एक दिन सब को जाना है फिर भी भौतिक उपलब्धियों के पीछे हम भागते रहते है और एक दिन समय का पहिया रुक जाता है और देह को त्याग आत्मा वैकुण्ठ...
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