राजनीति
कोशिश से हरियाली तक जब गांव खुद अपने भविष्य की जड़ें सींचते हैं
अंजनगांव की यह पहल अकेली नहीं है। सोलापुर जिले के 43 गांवों और दो कस्बों में अब तक छह हजार से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं और उनकी देखभाल भी की जा रही
महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ गांवों में चल रही पर्यावरणीय पहलें आज उस भारत की तस्वीर दिखाती हैं, जहां समाधान किसी आदेश या योजना का इंतज़ार नहीं करते, बल्कि ज़मीन से उठते हैं। यह कहानी केवल पेड़ लगाने की नहीं है, बल्कि सोच बदलने, जिम्मेदारी लेने और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य गढ़ने की है। सोलापुर के पथरीले गांवों से लेकर धुले के जंगलों और बेंगलुरु के बाहरी इलाके के एक छोटे से गांव तक, लोगों ने साबित किया है कि अगर इरादा मजबूत हो तो हरियाली असंभव नहीं रहती।
महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के माडा तहसील के अंजनगांव खिलोबा में किसान प्रमोद इंगले जिस जमीन पर जंगल उगा रहे हैं, वह कभी झाड़ियों से आगे कुछ नहीं जानती थी। पथरीली जमीन, कम पानी और तेज गर्मी इन सबके बीच पेड़ लगाना एक सपना सा लगता था। लेकिन इंगले और उनके गांव के 25 साथी इस सपने को रोज़ अपने हाथों से सच कर रहे हैं। वे पौधों की जड़ों के पास गन्ने के सूखे अवशेष बिछाते हैं ताकि नमी बनी रहे और पानी की बर्बादी न हो। यह केवल तकनीक नहीं, बल्कि स्थानीय समझ और अनुभव का नतीजा है। इन सौ पेड़ों को बचाने की जिम्मेदारी पूरे गांव ने साझा की है, क्योंकि उन्हें पता है कि पेड़ लगाना आसान है, उन्हें जिंदा रखना असली चुनौती है।
अंजनगांव की यह पहल अकेली नहीं है। सोलापुर जिले के 43 गांवों और दो कस्बों में अब तक छह हजार से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं और उनकी देखभाल भी की जा रही है। इन गांवों में पर्यावरण पाठशालाएं लगती हैं, जहां डॉक्यूमेंट्री दिखाई जाती हैं और धरती के बढ़ते तापमान के खतरों को सरल भाषा में समझाया जाता है। पूर्व आईआरएस अधिकारी विपुल वाघमारे के नेतृत्व में चल रहे इस अभियान का नारा है-“लेट्स प्लांट ए ट्री इन द माइंड।” यानी पहले सोच में बदलाव, फिर जमीन पर काम। गांवों में दस लोगों की टीम जाकर पर्यावरण परिवर्तन, जल संकट और पौधरोपण की जरूरत पर बात करती है। इसके बाद ग्रामीण खुद समूह बनाकर सौ पेड़ लगाने और उन्हें बचाने का लक्ष्य तय करते हैं। यह प्रक्रिया लोगों को सिर्फ सहभागी नहीं, बल्कि मालिक बनाती है।
इन गांवों में पेड़ों की देखभाल के लिए हर दस दिन में चंदा इकट्ठा किया जाता है। टैंकर से पानी लाया जाता है, खर्च सब मिलकर उठाते हैं। प्रमोद इंगले कहते हैं कि वे केवल आज के लिए नहीं, अपने बच्चों के कल के लिए यह सब कर रहे हैं। उनके शब्दों में, अगर पेड़ रहेंगे तभी बच्चे सुरक्षित रह सकेंगे। यह सोच पर्यावरण को किसी दूर की समस्या से निकालकर रोज़मर्रा की जिम्मेदारी बना देती है।
महाराष्ट्र के ही धुले जिले के पिंपलनेर, साक्री तहसील का डवण्यापाडा जंगल एक और उदाहरण है, जहां समुदाय ने जंगल को अपना माना। 1100 हेक्टेयर में फैले इस जंगल की सुरक्षा के लिए गांव वालों ने गार्ड नियुक्त किए हैं और खुद भी बारी-बारी से रखवाली करते हैं। सात बस्तियों के हर घर से सालाना 300 रुपये लेकर गार्ड की सैलरी दी जाती है। इससे अवैध कटाई रुकी है और अतिक्रमण पर भी रोक लगी है। गांव वालों ने कड़े नियम बनाए हैं।जंगल में कुल्हाड़ी ले जाना मना है, हरे पेड़ काटने पर भारी जुर्माना है और हर घटना का पंचनामा कर वन विभाग को सौंपा जाता है। यह अनुशासन डर से नहीं, साझा जिम्मेदारी से पैदा हुआ है।
इन पहलों के बीच एक और महत्वपूर्ण कहानी कर्नाटक के बेंगलुरु के बाहरी इलाके के बिलपुरा पंचायत की है, जहां पर्यावरण संरक्षण घर की चौखट से शुरू होता है। यह गांव दिखाता है कि कचरा समस्या नहीं, संसाधन बन सकता है। कभी जहां खुले मैदानों में कचरे के ढेर, बदबू और धुआं आम था, आज वहां 90 प्रतिशत कचरा घरों में ही अलग किया जाता है। गीले कचरे से खाद बनती है और उसी खाद से गांव में फलदार पेड़ों का एक छोटा सा वन तैयार हो रहा है।
बिलपुरा की इस सफलता के केंद्र में घरों में बनने वाली खाद है, खासकर महिलाओं की भूमिका। गांव की महिलाएं रसोई से निकलने वाले गीले कचरे को अलग रखती हैं, उसे खाद में बदलने की प्रक्रिया अपनाती हैं और फिर उसी खाद का इस्तेमाल अपने आंगन, खेत और सामुदायिक जमीन पर करती हैं। यह काम किसी बड़े बजट या भारी मशीनरी से नहीं हुआ, बल्कि पंचायत, गांव वालों और पास की अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के छात्रों और शिक्षकों के सहयोग से संभव हुआ। उन्होंने ग्रामीणों को समझाया कि कचरा हम बनाते हैं, तो उसे संभालना भी हमारी जिम्मेदारी है।
घरों में खाद बनाना केवल पर्यावरण के लिए नहीं, सामाजिक बदलाव के लिए भी अहम साबित हुआ है। जब महिलाएं कचरे को अलग करती हैं, खाद बनाती हैं और पेड़ उगते देखती हैं, तो उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है। रसोई का कचरा, जिसे पहले बेकार समझा जाता था, अब गांव की हरियाली की नींव बन गया है। इससे मिट्टी की सेहत सुधरी है, रासायनिक खाद पर निर्भरता कम हुई है और गांव का खर्च भी घटा है। सबसे बड़ी बात यह कि बच्चों ने अपनी आंखों के सामने कचरे से जंगल बनते देखा है, जो उन्हें जीवन भर याद रहेगा।
इन सभी कहानियों को जोड़ने वाली एक डोर है स्थानीय पहल और सामूहिक जिम्मेदारी। कहीं पेड़ बचाने के लिए चंदा है, कहीं जंगल बचाने के लिए नियम, तो कहीं घर-घर में खाद बनाने की आदत। ये पहलें बताती हैं कि पर्यावरण संरक्षण कोई एक बड़ा कदम नहीं, बल्कि छोटे-छोटे सतत प्रयासों का नतीजा है। जब गांव यह समझ लेते हैं कि तापमान बढ़ने, पानी घटने और जंगल कटने का असर सबसे पहले उन्हीं पर पड़ेगा, तब समाधान भी वहीं से निकलते हैं।
आज जब शहर कचरा प्रबंधन, हरियाली और जल संकट से जूझ रहे हैं, तब ये गांव एक रास्ता दिखाते हैं। घरों में खाद बनाना, पेड़ों को बचाने के लिए सामूहिक खर्च उठाना और जंगल की रखवाली खुद करना ये सब ऐसे कदम हैं, जिन्हें कहीं भी अपनाया जा सकता है। जरूरत केवल सोच बदलने की है। इन गांवों ने साबित किया है कि अगर हम अपने आसपास से शुरुआत करें, तो धरती को बचाने की कोशिश रंग ला सकती है। यह कोशिश ही भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी है।
कांतिलाल मांडोत

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