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ए आई के दुरुपयोग का शिकार होते दुनियाभर के मासूम बच्चे
मानव जीवन को सरल और सुविधाजनक बनाने के लिए विकसित की गई वैज्ञानिक तकनीक जहाँ एक ओर वरदान सिद्ध हुई है, वहीं इसके दुरुपयोग ने अनेक नई चुनौतियां भी पैदा कर दी हैं। संचार क्षेत्र में आई मोबाइल क्रांति इसका ताजा उदाहरण है। स्मार्टफोन ने दुनिया की दूरियाँ समाप्त कर लोगों को एक-दूसरे से जोड़ा, लेकिन यही तकनीक अब पारिवारिक और सामाजिक दूरियाँ बढ़ाने के साथ-साथ नई पीढ़ी के लिए गंभीर खतरे भी पैदा कर रही है । इसी खतरे का एक नया रूप आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक का दुरुपयोग है। यूनिसेफ और इंटरपोल द्वारा तैयार एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, केवल एक वर्ष में दुनियाभर के बारह लाख से अधिक बच्चे डीपफेक तकनीक के शिकार हुए हैं। एशिया और अफ्रीका के ग्यारह देशों पर किए गए अध्ययन में सामने आया कि ए आई के गलत इस्तेमाल से विशेष रूप से लड़कियों की तस्वीरों को अश्लील रूप में परिवर्तित किया जा रहा है।
एआई तकनीक निस्संदेह कंप्यूटर विज्ञान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो मशीनों को सीखने, निर्णय लेने और जटिल समस्याओं को हल करने की क्षमता प्रदान करती है तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और शोध के क्षेत्र में अनेक सकारात्मक संभावनाएँ खोलती है। किंतु इसका अनियंत्रित और अनैतिक उपयोग दुनिया के मासूम बच्चों के भविष्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है । अतः संयुक्त राष्ट्र, वैश्विक संगठनों तथा सभी देशों की सरकारों को मिलकर ए आई के दुरुपयोग को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कठोर कानून बनाने और उनके प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा विज्ञान की यही तकनीक, जो मानवता के लिए वरदान बन सकती है, मासूम बच्चों की खुशियों और सुरक्षित भविष्य को निगलने वाली अभिशाप सिद्ध हो सकती है।
अरविंद रावल

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