राजनीति
यूरोपीय यूनियन एकीकृत अर्थव्यवस्था के लिए भारत स्वाभाविक विकल्प
भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच प्रस्तावित तथा प्रगति पर चल रहा व्यापक व्यापारिक समझौता
भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच प्रस्तावित तथा प्रगति पर चल रहा व्यापक व्यापारिक समझौता केवल द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और अमेरिका की पारंपरिक आर्थिक व रणनीतिक प्रधानता को चुनौती देने वाले एक नए युग का संकेत भी है। शीत युद्ध के बाद लंबे समय तक अमेरिका ने वैश्विक व्यापार, निवेश, तकनीक और वित्तीय नियमों को अपने हितों के अनुसार परिभाषित किया, किंतु इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में परिस्थितियाँ तेजी से परिवर्तित हो रही हैं। चीन के उदय, रूस-पश्चिम टकराव, यूक्रेन युद्ध, आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन, संरक्षणवाद की वापसी और वैश्विक दक्षिण की बढ़ती मुखरता ने अमेरिका की एकछत्र भूमिका को सीमित किया है।
वर्तमान में अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के बीच व्यापारिक संबंध सुदृढ़ हैं, किंतु ट्रंप काल से लेकर बाइडेन प्रशासन तक संरक्षणवादी प्रवृत्तियाँ, कार्बन टैक्स, सब्सिडी आधारित औद्योगिक नीतियाँ और तकनीकी नियंत्रणों ने पारस्परिक अविश्वास को जन्म दिया है। ऐसे में यूरोप वैकल्पिक साझेदारों की तलाश में है और भारत उसके लिए एक स्वाभाविक विकल्प बनकर उभरता है। भारत के साथ व्यापारिक समझौता यूरोप को न केवल सस्ते श्रम और बड़े बाजार तक पहुँच देता है बल्कि चीन पर उसकी निर्भरता को भी कम करता है, जो अमेरिका की रणनीति से मेल तो खाता है, किंतु यदि यह प्रक्रिया अमेरिका को दरकिनार कर आगे बढ़ती है तो वाशिंगटन के लिए चिंता का विषय बन जाती है।
भारत–यूरोपीय यूनियन समझौते से फार्मास्यूटिकल्स, आईटी सेवाएँ, हरित ऊर्जा, ऑटोमोबाइल, सेमीकंडक्टर, डिजिटल व्यापार और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ेगा, जिससे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अमेरिका की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत घट सकती है। विशेष रूप से डिजिटल व्यापार और डेटा गवर्नेंस के क्षेत्र में यूरोपीय यूनियन के सख्त नियम और भारत की संप्रभु डेटा नीति मिलकर अमेरिकी टेक कंपनियों के वर्चस्व को चुनौती दे सकती हैं, जो लंबे समय से वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था पर हावी रही हैं।
इसके अतिरिक्त, यदि यूरोपीय निवेश भारत की विनिर्माण क्षमता को सुदृढ़ करता है तो अमेरिका की ‘री-शोरिंग’ और ‘फ्रेंड-शोरिंग’ रणनीतियों को अप्रत्यक्ष झटका लग सकता है, क्योंकि वैश्विक पूंजी एक वैकल्पिक आकर्षक गंतव्य की ओर प्रवाहित होगी। भू-राजनीतिक दृष्टि से भी यह समझौता अमेरिका को पुनर्विचार के लिए विवश करता है, क्योंकि भारत अब केवल क्वाड या इंडो-पैसिफिक रणनीति का एक स्तंभ भर नहीं रह जाता, बल्कि वह स्वतंत्र आर्थिक ध्रुव के रूप में अपनी पहचान मजबूत करता है।
भारत की यह स्वायत्तता अमेरिका के लिए द्वैध भाव उत्पन्न करती है।एक तरफ वह भारत को चीन के प्रतिरोध में आवश्यक साझेदार मानता है, दूसरी ओर वह भारत के अत्यधिक आत्मनिर्भर और बहुआयामी होते जाने से अपने प्रभाव क्षेत्र के सीमित होने की आशंका से भी काफी भयभीत है। यूरोपीय यूनियन के साथ भारत का गहरा आर्थिक संबंध यह संकेत देता है कि भारत किसी एक शक्ति गुट में बंधने के बजाय बहुपक्षीय संतुलन की नीति पर चल रहा है, जो अमेरिकी विदेश नीति की पारंपरिक अपेक्षाओं से भिन्न है।
इसके साथ ही, डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर भी दीर्घकालिक दबाव बन सकता है, यदि भारत और यूरोप व्यापार में वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों, स्थानीय मुद्राओं या डिजिटल करेंसी जैसे विकल्पों पर विचार करते हैं। यद्यपि यह प्रक्रिया धीमी होगी, किंतु इसके संकेत मात्र से ही अमेरिका की वित्तीय प्रधानता को लेकर विमर्श तेज होता है। अमेरिका के लिए यह समझौता एक चेतावनी भी है कि यदि वह अपने सहयोगियों के साथ व्यापारिक संबंधों में अधिक लचीलापन, पारदर्शिता और साझेदारी का भाव नहीं अपनाता, तो वे नए विकल्प खोजने को विवश होंगे।
यह अतिशयोक्ति होगा कि भारत यूरोपीय यूनियन व्यापारिक समझौता अमेरिका को पूर्णतः हाशिये पर धकेल देगा, क्योंकि अमेरिका अब भी तकनीक, रक्षा, वित्त और नवाचार में अग्रणी है, किंतु इतना स्पष्ट है कि उसकी निर्विवाद केंद्रीयता अब पहले जैसी नहीं रही। अंततः यह समझौता उस बदलती वैश्विक वास्तविकता का प्रतीक है जहाँ शक्तियाँ टकराव से अधिक संतुलन, निर्भरता से अधिक विविधता और अधीनता से अधिक स्वायत्तता की ओर अग्रसर हैं। इस प्रक्रिया में अमेरिका को स्वयं को अनुकूलित करना होगा, न कि केवल नियंत्रक की भूमिका में बने रहने का आग्रह करना होगा।इस समझौते से यह भी आशंका बनती है कि भारत के साथ अमेरिका का व्यापारिक संबंध नए दृष्टिकोण से नए समीकरणों में पदार्पित हो सकता है।
संजीव ठाकुर

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