बेहतर हो आत्मचिंतन करें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद 

सदाचार और धर्म का आधार मर्यादा है

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मनोज कुमार अग्रवाल 
 
सदाचार और धर्म का आधार मर्यादा है। आचरण व्यवहार और नैतिकता की निर्धारित सीमाएं मनुष्य को अनुशासित सभ्य और सुसंस्कृत बनाती है मर्यादा व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में संतुलन रखतीं है। धर्म की मर्यादा का पालन करना एक धर्मगुरु का पहला कर्तव्य है और यह दायित्व उस समय और अधिक बढ़ जाता है जब कोई व्यक्ति किसी धार्मिक पीठ या मठ की मुख्य पद पर विराजमान हो उसका मन वाणी और कर्म से धार्मिक मर्यादा के अनुकूल व्यवहार नितान्त आवश्यक ही नहीं समाज के लिए भी प्रेरक है धर्म के दस लक्षण धृति (धैर्य), क्षमा, दम (मन का संयम), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इन्द्रियनिग्रह, धी (बुद्धि), विद्या, सत्य और अक्रोध (गुस्सा न करना) धर्म के आधार हैं लेकिन जब कोई धर्मगुरु इन लक्षणों के विपरीत व्यवहार कर सिर्फ आत्मशलाघा आत्म अहंकार आत्म प्रवंचना अथवा वेनिटी वैन के वैभव से ग्रस्त हो जाए तो असहज स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है।
 
इस बार माघ मेला प्रयागराज में यही देखने को मिला पालकी से उतर कर सिर्फ पचास कदम पैदल चलने के सादर आग्रह को भी एक विशेष पीठ पर येन-केन प्रकरेण विराजित धर्मगुरु ने अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान से जोड़ लिया और पवित्र स्नान का बहिष्कार कर दस दिन तक एक राजनीतिक नेता की तरह प्रयागराज माघ मेला की पावनभूमि पर धरना दिया और फिर भाव नही मिलने पर तमाम आलोचना और अपशब्दों का प्रयोग कर बिना स्नान किए वापस लौट गए। क्या एक सनातनी धर्मगुरु से ऐसे आचरण की अपेक्षा की जा सकती है? क्या ऐसा दम्भ और अहंकार उनके मान सम्मान और गौरव के अनुकूल है? 
 
आपको बता दें कि प्रयागराज माघ मेले में पालकी पर मौनी अमावस्या स्नान से रोके जाने के विवाद के बाद अब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने लौटने का फैसला किया है. उन्होंने कहा कि प्रशासन ने उनसे माफी नहीं मांगी. इसे लेकर वह काफी दुखी हैं।  प्रयागराज में माघ मेले के दौरान हुए स्नान विवाद के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने संगम नगरी से वापस लौटने का फैसला कर लिया है.अविमुक्तेश्वरानंद को मौनी अमावस्या के पावन स्नान से मेला पुलिस ने रोक दिया था. पुलिस पर आरोप लगे कि उनके शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट की गई. इस घटना के विरोध में शंकराचार्य बीते 10 दिनों से धरने पर बैठे थे.स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि वे अन्याय को अस्वीकार करते हैं और न्याय का इंतजार करेंगे. आज स्वर बोझिल हैं और शब्द साथ नहीं दे रहे हैं।
 
भारी मन लेकर प्रयाग से लौटना पड़ रहा है. प्रयाग में जो घटित हुआ उसने झकझोर दिया है. मन अत्यंत व्यथित है, बिना स्नान किए यहां से विदा ले रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि न्याय की प्रतीक्षा कभी समाप्त नहीं होती, लेकिन आत्मसम्मान से समझौता स्वीकार नहीं है.स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया कि आज सुबह प्रशासन की ओर से एक प्रस्ताव भेजा गया था. प्रस्ताव में कहा गया था कि जब भी वे स्नान के लिए जाना चाहें, उन्हें ससम्मान पालकी के साथ स्नान के लिए ले जाया जाएगा. यह भी जिक्र था कि उस दिन मौजूद अधिकारी खुद स्वागत के लिए उपस्थित रहेंगे और पुष्प वर्षा की जाएगी. हालांकि, उन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
 
जिस माघ स्नान से देश और दुनिया में सनातन सांस्कृतिक और अध्यात्मिक संस्कृति का संदेश जाना चाहिए था उस सब को एक पालकी में सवार होकर स्नान की जिद कर रहे धर्मगुरु और प्रशासन के बीच पैदा विवाद ने ग्रहण बनकर डस लिया।  सदियों से चले आ रहे प्रयागराज माघ स्नान की सनातनी महिमा को दरकिनार कर एक धर्मगुरु की अहमन्यता ने बखेड़ा खड़ा कर दिया है इस तरह एक माह चलने वाले जिस सनातनी महापर्व से देश के कोने-कोने तक और समूचे विश्व में अध्यात्मिक चेतना का संदेश दिया जाना चाहिए था वह सिर्फ एक विवादित ढंग से शंकराचार्य पद पर विराजमान धर्मगुरु की अहमन्यता भरी जिद से पैदा विवाद के चलते तमाम मीडिया को खुद पर केंद्रित कर संस्कृति और धर्म को ठेस पहुंचाने के धतकरम में फंस गया है। 
 
यह एक बड़ा प्रोपेगेंडा मालूम पड़ता है जिसकी डोर विरोधी दलों के नीति निर्धारकों के हाथों में है और हमारे कथित धर्मगुरु उनकी उंगलियों के ईशारे पर एक महान संस्कृति के गौरव पूर्ण सांस्कृतिक अध्यात्मिक पर्व में विध्न पहुंचाने की कुचेष्ठा में फंसकर अपने अहम की तुष्टी कर रहे थे । दरअसल जो राजनीतिक दल बहुसंख्यक हिन्दू समाज के मतदाताओं को अपने अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति के चलते गंवा चुके हैं वह अब जाति और दूसरे षडयंत्र कर बहुसंख्यक समुदाय में विघटन पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं यह सब उस उपक्रम का हिस्सा माना जा रहा है। इस के पीछे योगी आदित्यनाथ की छवि बिगाड़ने की साजिश बतायी जा रही है। 
 
सवाल उठता है कि इन धर्मगुरु के लिए पालकी की सवारी अधिक महत्वपूर्ण है या माघ स्नान क्योकि इन्होंने सिर्फ अपनी पालकी से उतर कर पचास कदम पैदल चलना स्वीकार नहीं किया लेकिन माघ स्नान की परवी के स्नान को त्याग दिया स्पष्ट है कि इनके लिए सनातनी मान्यताओं से अधिक अपनी मिथ्या अहंकार और प्रतिष्ठा का प्रदर्शन अधिक प्रिय है। दरअसल यह वह व्यक्ति है जो पिछले एक लंबे समय से सनातन धर्मगुरु का चोला पहन कर सनातन को ही घोर अपमान और क्षति पहुचाने में व्यस्त हैं।
 
इन दिनों अविमुक्तेश्वरानंद खुलेआम योगी आदित्यनाथ के लिए हुमायूं की औलाद औरंगजेब जैसे संबोधन बोल रहे हैं, योगी को संत मानने से इंकार कर रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी के खिलाफ इतना एजेंडा सपा, कांग्रेस, बसपा और पूरा इंडी गठबंधन नहीं चला सका है, जितना एजेंडा ये तथाकथित शंकराचार्य चला रहे हैं। 
 
माघमेला में सभी अखाड़ों, हजारों संतों ने स्नान किया लेकिन कहीं कोई बवाल नहीं हुआ। करोड़ों श्रद्धालुओं ने स्नान किया लेकिन कहीं कोई बवाल नहीं हुआ जैसे ही अविमुक्तेश्वरानंद पहुंचे तो बवाल हो गया। उनके नैरेटिव और ईगो के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ की जान के साथ नहीं खेला जा सकता है? अब आपको उस सनातन संस्कृति और सभ्यता का हवाला देते हैं जिसके पावन पुनीत ग्रंथ रामचरितमानस में लिखा है संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥  हे रघुवीर! हे भव-भय (जन्म-मरण के भय) का नाश करने वाले मेरे नाथ! अब कृपा कर संतों के लक्षण कहिए!... श्री रामजी ने कहा- बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना॥ दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ॥॥
 
भावार्थ - संत वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान (परमात्मा के तत्व का ज्ञान) और वेद-पुराण का यथार्थ ज्ञान रहता है। वे दम्भ, अभिमान और मद कभी नहीं करते और भूलकर भी कुमार्ग पर पैर नहीं रखते हैं।  वे संत (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर- इन) छह विकारों (दोषों) को जीते हुए, पापरहित, कामनारहित, निश्चल (स्थिरबुद्धि), अकिंचन (सर्वत्यागी), बाहर-भीतर से पवित्र, सुख के धाम, असीम ज्ञानवान्‌, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान, योगी हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का अहम प्रशासन की व्यवस्था को स्वीकार करने में आड़े आ रहा था या वह जानबूझकर टकराव की स्थिति पैदा करना चाहते थे। 
 
यहां सवाल यही है कि शंकराचार्य राजनीतिक पूर्वाग्रह दुराग्रह से बाहर निकल रामचरितमानस की पंक्तियों पर चिंतन करें- संत ह्रदय नवनीत समाना और संत ह्रदय जस निर्मल बारि को चरितार्थ करें ।वह आत्मचिंतन करें या धर्म का चोला उतार कर सीधे राजनीति में पदार्पण करें। 

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