क्या सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद ही विद्या के मंदिरों में शिक्षकों की कमी दूर होगी ?

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हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत की दो सदस्यीय पीठ माननीय न्यायमूर्ति जे.बी. पार्दीवाला एवं महादेवन ने देशभर के शासकीय एवं निजी कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पदों को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए राज्य सरकारों को चार माह के भीतर भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं ।

शिक्षा के क्षेत्र में छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश निस्संदेह छात्र हित में उठाया गया एक स्वागतयोग्य कदम हैजिसकी देशभर के विद्यार्थी सराहना कर रहे हैं । यह सर्वविदित है कि शिक्षा और स्वास्थ्यदेश के नागरिकों के मूलभूत अधिकारों में शामिल हैं ।

साथ ही यह भी सत्य है कि सामाजिक क्षेत्र की सेवाएँ होने के कारण केंद्र और राज्य सरकारों को इन दोनों क्षेत्रों पर अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा प्रतिवर्ष खर्च करना पड़ता हैजबकि प्रत्यक्ष आर्थिक आय बहुत कम या नगण्य होती है । इसके बावजूद यदि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में लगातार कमी दिखाई दे रही हैतो यह सरकारों और समाजदोनों के लिए गंभीर चिंतन का विषय होना चाहिए ।

शिक्षकों की कमी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की फटकार ने एक बार फिर देश की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया है । आज समस्या केवल कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं हैबल्कि सरकारी स्कूलों की हालत और भी चिंताजनक है ।

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शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 में निर्धारित छात्र-शिक्षक अनुपात आज भी अधिकांश स्कूलों में पूरा नहीं हो पा रहा है । देशभर में अनेक स्कूल शिक्षकविहीन या एकल शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैंवहीं कई विद्यालय अतिथि शिक्षकों (गेस्ट फैकल्टी) के सहारे चल रहे हैं ।

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उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है । यदि गेस्ट फैकल्टी की व्यवस्था न होतीतो हालात और भी दयनीय होते । यही स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं में भी देखने को मिलती हैजहाँ चिकित्सकों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के अनेक पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं । अब प्रश्न यही है क्या सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद ही शिक्षकों की कमी दूर होगीया फिर सरकारें आर्थिक तंगी का हवाला देकर समय मांगती रहेंगी ?

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राज्य सरकारें शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में भर्तियाँ तो करती हैंकिंतु ये भर्तियाँ आवश्यकता के अनुपात में अपर्याप्त रहती हैं । इसके पीछे प्रमुख कारण आर्थिक सीमाएँ हैं । वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकारों के बजट का बड़ा हिस्सा मुफ्त योजनाओं पर खर्च हो रहा हैजिनका लाभ कई बार आर्थिक रूप से सक्षम लोग भी उठा रहे हैं ।

यदि मुफ्त योजनाओं का लाभ वास्तव में केवल आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक सीमित किया जाए और महँगाई के अनुरूप सीधी आर्थिक सहायता दी जाएतो जरूरतमंदों की वास्तविक सहायता संभव हो सकती है। इसके साथ ही वृद्धावस्था पेंशन योजनाओं की राशि में भी महँगाई के अनुरूप वृद्धि आवश्यक है और इसका लाभ 60 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके सभी महिला-पुरुषों को मिलना चाहिए ।

आधुनिक समय में एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण कई बुजुर्ग अपने ही बच्चों द्वारा उपेक्षित होकर असहाय स्थिति में जीवन जीने को मजबूर हैं । ऐसे में सरकार की योजनाएँ ही उनके लिए अंतिम सहारा बनती हैं।

यदि सभी राजनीतिक दल और सरकारें आर्थिक मापदंड तय कर मुफ्त योजनाओं का सही लक्षित वितरण करेंतो राज्य सरकारों के पास इतना संसाधन अवश्य बचेगा कि वे रिक्त पदों की पूर्ति कर सकें और युवाओं को रोजगार दे सकें ।

पदों की पूर्ति करना राज्य सरकारों का दायित्व है । जब सरकारें शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं में ही वित्तीय संकट का हवाला देकर असमर्थता जताती हैंतब सर्वोच्च अदालत का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है । एक प्रसिद्ध कहावत है यदि किसी राज्य का विकास कुछ वर्षों के लिए करना होतो अच्छी  सड़कें बनाइए यदि पचास-सौ वर्षों के लिए राज्य का विकास करना होतो वहा अच्छे  बाँध और जलस्रोत बनाइए  और यदि हजारों वर्षों तक राज्य का विकास चाहते होंतो अपनी  शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाइए ।

भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था इतनी समृद्ध और वैभवशाली थी कि तक्षशिलानालंदाकाशी और उज्जैन जैसे ज्ञान के केंद्रों ने विश्व को दिशा दी । शून्यदशमलवशल्य चिकित्सा और जीवन-दर्शन जैसे ज्ञान का उल्लेख हमारे वेदों और ग्रंथों में हजारों वर्ष पहले ही मिल जाता है ।

आज आवश्यकता है कि केंद्र और राज्य सरकारें अपनी गैर-जरूरी योजनाओं की समीक्षा कर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश बढ़ाएँपर्याप्त शिक्षकों और संसाधनों की व्यवस्था करें और विद्या के मंदिरों को पुनः ज्ञान का केंद्र बनाएं। तभी भारत एक बार फिर विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर हो सकेगा।

अरविंद रावल

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