विदेशी मुद्रा की तलाश में ‘हराम’ से समझौता, पाकिस्तान की मजबूरी, नीतियों की विफलता और डगमगाती अर्थव्यवस्था
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इस्लामिक मूल्यों, सख्त धार्मिक कानूनों और सामाजिक पाबंदियों के लिए पहचाने जाने वाले देशों में जब शराब को लेकर फैसले बदलने लगें, तो यह केवल नीति परिवर्तन नहीं बल्कि गहरे आर्थिक संकट का संकेत होता है। हाल के दिनों में सऊदी अरब द्वारा गैर-मुस्लिमों को सीमित दायरे में शराब सेवन की छूट और अब पाकिस्तान द्वारा अपनी ऐतिहासिक मुरी ब्रेवरी को शराब निर्यात की अनुमति देना इसी कड़ी का हिस्सा है। यह फैसला जितना ऐतिहासिक है, उतना ही पाकिस्तान की मजबूरी और उसकी आर्थिक बदहाली का आईना भी है।
पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार ने करीब पचास वर्षों बाद मुरी ब्रेवरी पर लगे निर्यात प्रतिबंध को हटाकर उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने उत्पाद बेचने की इजाजत दे दी है। 1860 में ब्रिटिश शासन के दौरान स्थापित मुरी ब्रेवरी पाकिस्तान की सबसे पुरानी शराब निर्माता कंपनी है। एक मुस्लिम बहुल देश में, जहां शराब को हराम माना गया है और उसके सेवन व बिक्री पर कानूनी और सामाजिक पाबंदियां हैं, वहां इस कंपनी का दशकों तक टिके रहना अपने आप में एक असाधारण उदाहरण रहा है। अब इसे निर्यात लाइसेंस मिलना बताता है कि पाकिस्तान किस हद तक आर्थिक दबाव में है।
मुरी ब्रेवरी के प्रमुख इस्फनग भंडारा का कहना है कि उनके दादा और पिता दोनों ने शराब निर्यात की अनुमति पाने के प्रयास किए थे, लेकिन तब की सरकारें धार्मिक और राजनीतिक दबाव के कारण पीछे हट गईं। आज वही सरकार, वही राज्य तंत्र, विदेशी मुद्रा की सख्त जरूरत के चलते उसी ‘हराम’ माने जाने वाले उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने की राह खोल रहा है। यह विरोधाभास नहीं बल्कि पाकिस्तान की बदहाल अर्थव्यवस्था की मजबूरी है।
पाकिस्तान इस समय गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार दबाव में है। आयात बढ़ते जा रहे हैं, जबकि निर्यात की क्षमता सीमित होती जा रही है। आईएमएफ से कर्ज, चीन से उधार और खाड़ी देशों से अस्थायी राहत के सहारे किसी तरह अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में सरकार को हर उस रास्ते पर विचार करना पड़ रहा है, जिससे डॉलर आ सके। शराब निर्यात का फैसला इसी सोच का परिणाम है।
यह केवल शराब तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की नीतिगत विफलताओं की कहानी भी कहता है। वर्षों तक देश को धार्मिक राज्य’ के रूप में पेश किया गया। नीतियां आस्था के नाम पर तय होती रहीं, लेकिन आर्थिक सुधार, औद्योगिक विकास, शिक्षा और मानव संसाधन पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना जरूरी था। नतीजा यह हुआ कि आज पाकिस्तान के पास निर्यात के लिए गिने-चुने उत्पाद ही बचे हैं। टेक्सटाइल उद्योग संकट में है। कृषि उत्पादन महंगाई और जलवायु प्रभाव से जूझ रहा है। आईटी और सेवा क्षेत्र वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ चुका है। ऐसे में सरकार को उन विकल्पों की ओर लौटना पड़ रहा है, जिन्हें कभी उसने खुद खारिज कर दिया था।
आम पाकिस्तानी नागरिक के लिए हालात बेहद कठिन हो चुके हैं। महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। आटा 120 रुपये किलो तक पहुंच चुका है, जो गरीब और मध्यम वर्ग के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है। सब्जियां, दालें, तेल और ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। बिजली और गैस के बिल आम लोगों की आय से कहीं ज्यादा हो गए हैं। बेरोजगारी बढ़ रही है और रोजगार के अवसर सिकुड़ते जा रहे हैं। ऐसे में सरकार द्वारा शराब निर्यात से विदेशी मुद्रा लाने की बात जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी लगती है।
सरकार की नीतियों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि तात्कालिक राहत के लिए दीर्घकालिक मूल्यों और सिद्धांतों से समझौता किया जा रहा है। एक ओर धार्मिक भावनाओं की बात की जाती है, दूसरी ओर उन्हीं भावनाओं के विपरीत फैसले लिए जा रहे हैं। इससे न केवल सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं, बल्कि समाज में भी भ्रम और असंतोष बढ़ता है। सवाल यह है कि अगर शराब निर्यात से ही अर्थव्यवस्था को बचाना था, तो फिर दशकों तक इसे ‘हराम’ कहकर प्रतिबंधित क्यों रखा गया।
चीन के साथ पाकिस्तान की गहरी मित्रता भी उसकी आर्थिक मजबूरी को और जटिल बना रही है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा बड़े सपनों के साथ शुरू किया गया था, लेकिन समय के साथ यह परियोजना पाकिस्तान के लिए कर्ज का बोझ बनती जा रही है। चीनी कंपनियों को विशेष रियायतें दी गईं। स्थानीय उद्योगों को अपेक्षित लाभ नहीं मिला। यहां तक कि 2017 में पाकिस्तान ने एक चीनी कंपनी को शराब उत्पादन की अनुमति दी थी, जो मुख्य रूप से चीन के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में काम कर रहे कर्मचारियों के लिए थी। यह निर्णय भी घरेलू उद्योगों और स्थानीय नियमों के साथ भेदभाव का उदाहरण बना।
चीन के साथ असंतुलित आर्थिक संबंधों का असर यह हुआ कि पाकिस्तान की नीति-निर्माण प्रक्रिया में आत्मनिर्भरता की जगह निर्भरता बढ़ती गई। सस्ते कर्ज और निवेश के बदले दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक दबाव स्वीकार किए गए। आज हालत यह है कि पाकिस्तान अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए न तो पूरी तरह पश्चिम पर भरोसा कर सकता है, न ही चीन के सहारे स्थायी समाधान निकाल पा रहा है। शराब निर्यात की अनुमति इसी असमंजस की उपज है।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरण देखें तो कई देश आर्थिक संकट में अपने परंपरागत नियमों में ढील देते रहे हैं। सऊदी अरब का उदाहरण सामने है, जहां हाल ही में गैर-मुस्लिमों को सीमित दायरे में शराब पीने की छूट दी गई। इसका मकसद पर्यटन, निवेश और वैश्विक छवि को मजबूत करना बताया गया। हालांकि सऊदी अरब ने यह कदम एक व्यापक आर्थिक सुधार और विविधीकरण की नीति के तहत उठाया। पाकिस्तान का मामला इससे अलग है। यहां कोई दीर्घकालिक विजन नहीं, बल्कि तत्काल विदेशी मुद्रा जुटाने की हड़बड़ी दिखाई देती है।
मुरी ब्रेवरी को निर्यात लाइसेंस मिलना निश्चित रूप से उसके लिए एक कारोबारी उपलब्धि है, लेकिन यह पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए स्थायी समाधान नहीं हो सकता। शराब निर्यात से कुछ विदेशी मुद्रा जरूर आएगी, लेकिन इससे न तो महंगाई कम होगी, न बेरोजगारी घटेगी और न ही खाद्यान्न संकट का समाधान निकलेगा। यह केवल एक अस्थायी सहारा है, जो गहरी बीमारी पर लगाया गया मरहम भर है।
पाकिस्तान की मौजूदा आर्थिक हालत यह बताती है कि देश को मूलभूत सुधारों की जरूरत है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग और शासन प्रणाली में सुधार के बिना कोई भी तात्कालिक फैसला देश को संकट से बाहर नहीं निकाल सकता। विदेशी मुद्रा के लिए हराम’ और हलालके बीच झूलती नीतियां न तो जनता का भरोसा जीत सकती हैं और न ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थायी सम्मान दिला सकती हैं।
इसलिए शराब निर्यात का फैसला पाकिस्तान की मजबूरी का प्रतीक है। यह बताता है कि जब नीतियां दूरदर्शिता से नहीं बनतीं और अर्थव्यवस्था को राजनीतिक और वैचारिक प्रयोगशाला बना दिया जाता है, तो एक दिन वही राज्य अपने ही घोषित सिद्धांतों से समझौता करने को मजबूर हो जाता है। आज पाकिस्तान इसी मोड़ पर खड़ा है, जहां विदेशी मुद्रा की तलाश में उसे अपने अतीत, अपनी नीतियों और अपने दावों पर नए सिरे से सवाल करना पड़ रहा है।
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