अरुणाचल पर भारत के सख़्त रुख से भड़का चीन, तकनीकी व निवेश सहयोग पर लगाने लगा ब्रेक

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नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच संबंध एक बार फिर तनावपूर्ण मोड़ पर पहुंच गए हैं। अरुणाचल प्रदेश की एक भारतीय महिला को शंघाई हवाई अड्डे पर “अवैध पासपोर्ट” के आरोप में रोकने की घटना के बाद भारत ने कड़ा विरोध दर्ज कराया, जिसके बाद बीजिंग के तेवर और भी सख्त दिखाई देने लगे हैं। इसका सीधा असर दोनों देशों के आर्थिक सहयोग, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स और तकनीकी सेक्टर पर देखने को मिल रहा है।

शंघाई एयरपोर्ट पर रोक ने बढ़ाया विवाद

अरुणाचल प्रदेश की नागरिक पेमा वांगजोम थोंगडोक को 18 घंटे तक शंघाई एयरपोर्ट पर रोकना चीन के पुराने दावे—अरुणाचल को “दक्षिण तिब्बत” बताने—की एक और झलक माना जा रहा है। भारत ने घटना को अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा नियमों और चीन के अपने नियमों का उल्लंघन बताया है।

विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है और चीन की किसी भी टिप्पणी से यह तथ्य बदलने वाला नहीं है। भारत की यह तीखी प्रतिक्रिया बीजिंग को साफ संदेश देती है कि नागरिकों की वैध पहचान पर सवाल किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।

इसके विपरीत, चीन ने न तो हिरासत मानने को तैयार हुआ और न ही अपने विवादित दावे से पीछे हटा। विशेषज्ञों का मानना है कि पासपोर्ट संबंधी इन निर्देशों का मकसद अपने भू-राजनीतिक दावों को व्यावहारिक स्तर पर लागू करना है।

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भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग की राह में चीन का अड़ंगा

तनाव केवल कूटनीतिक नहीं है; इसका असर आर्थिक सहयोग पर भी दिख रहा है। भारतीय कंपनियों की चीन से तकनीकी साझेदारी और निवेश के कई प्रस्ताव अटके पड़े हैं।

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निम्नलिखित प्रोजेक्ट महीनों से रुके हुए हैं—

FIR lodged against Agrifields DMCC boss for 700 crore fraud. Read More FIR lodged against Agrifields DMCC boss for 700 crore fraud.

  • PG Electroplast की तकनीकी साझेदारी

  • Hisense द्वारा भारतीय यूनिट में 26% हिस्सेदारी लेने की योजना

  • Bharti Group का Haier India में 49% अधिग्रहण

चीन इन प्रोजेक्ट्स पर कड़ा मूल्यांकन इसलिए कर रहा है क्योंकि 2020 की सीमा झड़पों के बाद भारत ने Press Note 3 लागू किया था, जिसके तहत पड़ोसी देशों के निवेश पर सरकारी मंजूरी अनिवार्य है। बीजिंग इसे राजनीतिक संदेश के रूप में देखता है और अब वही सख्ती भारत के लिए अपना रहा है।

परिणामस्वरूप भारतीय उद्योग दोहरी मुश्किल में है—
एक ओर भारतीय निर्माण (Manufacturing) और वैल्यू एडिशन बढ़ाने के लिए चीन की तकनीक और मशीनरी आवश्यक है, दूसरी ओर चीन की मंजूरियों में अनिश्चितता बढ़ गई है।


तनाव का बड़ा अर्थ—संबंधों में 'विश्वसनीयता' की कमी

ताज़ा घटनाक्रम यह स्पष्ट करता है कि भारत-चीन संबंधों में सुधार केवल बातचीत या आर्थिक प्रलोभनों से नहीं हो सकता। संप्रभुता, सुरक्षा, और राजनीतिक दावे हमेशा प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

विशेषज्ञों का मत है कि—

  • भारत को हर ऐसे मामले को ICAO, IATA और वैश्विक मंचों पर उठाना चाहिए।

  • चीन द्वारा तकनीकी सहयोग में देरी भारत के लिए अपना स्थानीय टेक इकोसिस्टम मजबूत करने का अवसर भी है।

  • PLI स्कीम और R&D निवेश को अब रणनीतिक प्राथमिकता देनी होगी।

  • कूटनीति जारी रहे, लेकिन स्पष्ट लाल रेखाओं के साथ।

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