सभ्यता की यात्रा: पाषाण युग से पाषाणहृदय तक

Swatantra Prabhat Desk Picture
Published On

मनुष्य की असभ्यता से सभ्यता की ओर की यात्रा एक अनंत कथा है, जो न कभी पूर्ण होती है, न कभी अपने अंतिम पड़ाव पर ठहरती है। यह एक ऐसी गाथा है, जो समय के साथ अपने रंग बदलती है, कभी उजाले की ओर बढ़ती है तो कभी अंधेरे की गहराइयों में खो जाती है। हम उस देश के वासी हैं, जहां सभ्यता ने सबसे पहले अपनी नींव रखी, जहां मानव ने जंगलीपन को त्याग कर संस्कारों का आलिंगन किया।

यह वही धरती है, जहां मंत्रों की गूंज ने पहली बार प्रकृति को सानंद से भर दिया, जहां नदियों के किनारे ज्ञान के दीप जले और जहां प्रेम, त्याग और धर्म की ऐसी कथाएं रची गईं, जो आज भी हमारे हृदय को स्पंदित करती हैं। परंतु आज उसी पवित्र भूमि पर मानव पुनः असभ्यता के उस गर्त की ओर बढ़ रहा है, जहां न संस्कारों का मूल्य है, न प्रेम की गरिमा और न ही जीवन की पवित्रता का सम्मान।

 मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री की कहानी याद कीजिए। वह राजकुमारी, जिसके सामने सारा वैभव और राजसी ठाठ-बाट बिछा था, उसने अपने जीवन का सबसे बड़ा निर्णय तब लिया, जब उसकी नजर एक साधारण-से दिखने वाले लकड़हारे पर पड़ी और उसने मन ही मन उसका वरण कर लिया। जब अश्वपति ने अपनी पुत्री के इस चयन पर ज्योतिषी से परामर्श लिया, तो ज्योतिषी ने अपनी गणना से एक कठोर सत्य उद्घाटित किया। उसने कहा, "यह युवक कोई साधारण मनुष्य नहीं अपितु एक राजकुमार है, जिसके पिता अश्वपति ने अपना राज्य खो दिया था और जो अब जंगल में निर्वासित जीवन जी रहे हैं।

परंतु उसकी आयु अब अधिक नहीं बची। ठीक एक वर्ष बाद वह मृत्यु के आगोश में चला जाएगा।यह सुनकर अश्वपति का हृदय कांप उठा। उसने अपनी पुत्री को समझाने का हर संभव प्रयास किया, उसे इस विवाह से रोकने की चेष्टा की, परंतु सावित्री का उत्तर अडिग था। उसने कहा, "पिताजी, मैंने मन ही मन उनका वरण कर लिया है। मैं उस धरती की बेटी हूं, जहां स्त्री एक बार विश्वास करती है, एक बार प्रेम करती है और एक बार अपने जीवन का संकल्प लेती है। यदि उनके प्राणों का समय एक वर्ष है, तो वह अब मेरा भाग्य है। मैं इसे स्वीकार करती हूं।"

डिजिटल भुगतान में ठहराव का नया अध्याय सुरक्षा की दिशा में एक घंटा—विश्वास, संयम और सतर्कता का समय Read More डिजिटल भुगतान में ठहराव का नया अध्याय सुरक्षा की दिशा में एक घंटा—विश्वास, संयम और सतर्कता का समय

सावित्री का यह संकल्प केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहा। उसने अपने तप, अपनी बुद्धिमता और अपने अटूट प्रेम से यमराज तक को झुका दिया। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु का समय आया, सावित्री उनके पीछे-पीछे यम के लोक तक पहुंच गई। उसने न केवल अपने पति के प्राणों को वापस लिया, बल्कि इस धरती पर प्रेम और समर्पण की एक ऐसी मिसाल कायम की, जो युगों-युगों तक गूंजती रहेगी। यह थी उस सभ्यता की शक्ति, जो इस देश की आत्मा में बसी थी। यह थी वह संस्कृति, जिसने नारी को केवल एक देह नहीं, बल्कि एक शक्ति, एक संकल्प और एक सृजन का प्रतीक माना।

शांति वार्ता तार-तार, राष्ट्र प्रमुखों की जिद्द और आसन्न परमाणु युद्ध Read More शांति वार्ता तार-तार, राष्ट्र प्रमुखों की जिद्द और आसन्न परमाणु युद्ध

परंतु आज वही धरती, वही संस्कारों की भूमि एक ऐसी घटना की साक्षी बन रही है, जो मानवता को शर्मसार कर देती है। मेरठ की एक घटना ने न केवल इस देश के लोगों को झकझोर दिया, बल्कि यह प्रश्न उठा दिया कि क्या हम वास्तव में सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं, या फिर असभ्यता के उस अंधेरे कुएं में गिरते जा रहे हैं, जहां से निकलने का कोई मार्ग शेष नहीं? यह कहानी है सौरभ और मुस्कान की, एक प्रेम विवाह की, जो कभी स्नेह और विश्वास से शुरू हुआ था, परंतु अंत में रक्त, विश्वासघात और क्रूरता की परछाई में डूब गया।

धोखा और नाकामी का मसौदा रही इस्लामाबाद वार्ता  Read More धोखा और नाकामी का मसौदा रही इस्लामाबाद वार्ता 

सौरभ और मुस्कान का विवाह एक प्रेम विवाह था। सौरभ के परिवार ने इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं किया। उनके लिए यह विवाह एक विद्रोह था, एक ऐसा निर्णय जो उनकी परंपराओं और मान्यताओं के खिलाफ था। परंतु सौरभ और मुस्कान ने अपने प्रेम को चुना। उन्होंने शहर में एक किराए का कमरा लिया और अपने छोटे से संसार को बसाया। समय बीता, और इस प्रेम का एक फल भी उन्हें मिला—एक नन्ही बेटी, जो उनके जीवन में खुशियों का प्रकाश लेकर आई। सौरभ मर्चेंट नेवी में कार्यरत था। उसकी नौकरी उसे छह-छह महीने घर से दूर रखती थी। वह समुद्र की लहरों के बीच अपने परिवार के लिए मेहनत करता था, यह सोचकर कि उसकी अनुपस्थिति में उसका घर, उसकी पत्नी और उसकी बेटी सुरक्षित हैं।

परंतु सौरभ की अनुपस्थिति में मुस्कान का जीवन एक अलग राह पर चल पड़ा। उसकी मुलाकात साहिल से हुई, और धीरे-धीरे यह मुलाकात एक संबंध में बदल गई। यह संबंध केवल भावनाओं तक सीमित नहीं रहा। मुस्कान नशे की आदी हो गई, और उसका जीवन उस संयम और संस्कार से दूर होता चला गया, जिसकी नींव पर कभी उसका विवाह खड़ा हुआ था। साहिल के साथ उसकी निकटता बढ़ती गई और सौरभ की अनुपस्थिति अब उसके लिए एक अवसर बन गई। यह अवसर केवल विश्वासघात तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक ऐसी साजिश में बदल गया, जिसने मानवता के सारे बंधनों को तोड़ दिया।

एक दिन, जब सौरभ अपनी ड्यूटी से लौटा, तो उसका स्वागत न तो मुस्कान के प्रेम से हुआ, न ही उसकी बेटी की मुस्कान से। उसके घर में जो हुआ, वह किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था। मुस्कान और साहिल ने मिलकर सौरभ की हत्या कर दी। यह हत्या केवल एक क्षणिक क्रोध का परिणाम नहीं थी। यह एक सोची-समझी क्रूरता थी, जो अपने चरम पर पहुंची जब उन्होंने सौरभ के शरीर को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट दिया। इन टुकड़ों को एक ड्रम में बंद कर दिया गया, जैसे वह कोई निर्जन वस्तु हो, न कि वह पुरुष जिसने कभी मुस्कान को अपना जीवनसाथी चुना था। इसके बाद मुस्कान और साहिल ने मकान को ताला लगाया और हिमाचल की वादियों में घूमने निकल पड़े। पंद्रह दिनों तक वे वहां मौज-मस्ती करते रहे, मानो कुछ हुआ ही न हो, मानो सौरभ का अस्तित्व ही उनके जीवन से मिट गया हो।

जब यह घटना प्रकाश में आई, तो मेरठ ही नहीं, पूरे देश में हाहाकार मच गया। लोग यह समझ नहीं पा रहे थे कि जिस प्रेम ने कभी दो लोगों को जोड़ा, वह इतनी क्रूरता में कैसे बदल गया। सौरभ की बेटी, जो अभी जीवन के उस पड़ाव पर भी नहीं पहुंची थी जहां वह अपने पिता की अनुपस्थिति को समझ सके, अब अनाथ हो गई। मुस्कान, जो कभी उसकी मां थी, अब उसकी दुनिया की सबसे बड़ी शत्रु बन चुकी थी। यह घटना केवल एक अपराध की कहानी नहीं थी। यह उस सभ्यता के पतन की कहानी थी, जिसे हमने सहस्राब्दियों तक संजोया था।

सावित्री और मुस्कान—दो नारियां, दो युग, दो कहानियां। एक ओर सावित्री, जिसने अपने पति के प्राणों को यमराज से छीन लिया, और दूसरी ओर मुस्कान, जिसने अपने पति के प्राणों को छीनकर उन्हें एक ड्रम में कैद कर दिया। यह अंतर केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि उस संस्कृति और उन मूल्यों का है, जो कभी इस धरती की पहचान थे। क्या हम सचमुच सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं, या यह केवल एक भ्रम है, जो हमें उस असभ्यता की ओर ले जा रहा है, जहां प्रेम, विश्वास और मानवता का कोई स्थान नहीं? यह प्रश्न आज हम सबके सामने है, और इसका उत्तर शायद समय ही दे सकेगा। परंतु यह निश्चित है कि यदि हमने अपनी जड़ों को नहीं संभाला, तो यह धरती, जो कभी सभ्यता की जननी थी, एक दिन असभ्यता की कब्र बनकर रह जाएगी।

About The Author

Post Comments

Comments