टुकड़े - टुकड़े हुई विपक्षी एकता.....

टुकड़े - टुकड़े हुई विपक्षी एकता.....

स्वतंत्र प्रभात 

जितेन्द्र सिंह पत्रकार          
24 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को रोकने और सरकार बनाने का दम भरने वाली विपक्षी एकता टुकड़े टुकड़े हो गई है। अब केवल कांग्रेस क्षेत्रीय दलों से क्षेत्रीय आधार पर गठबंधन करने की कोशिश कर रही है। यहां उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी भी एनडीए से मिल गये हैं। इधर भारतीय जनता पार्टी ने चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देने की घोषणा की है तो जयंत को एक टापिक मिल गया कि अब मैं उनकी बात को मना कैसे कर सकता हूं क्योंकि उन्होंने जयंत के दादा चौधरी साहब को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा कर दी है। खैर यह तो राजनैतिक शब्द हैं। क्यों कि जयंत की बातचीत काफी समय पहले से भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से चल रही थी लेकिन बात नतीजे तक नहीं पहुंच पा रही थी। और फिर कोई भी नेता विपक्ष की राजनीति नहीं करना चाहता है वो भी तब जब उसकी पार्टी एक छोटे दल के रुप में पहचानी जाती हो। भारतीय जनता पार्टी जयंत चौधरी को 3 से 4 सीट दे सकती है इसके अलावा एक सीट राज्य सभा में मिलने के संकेत हैं। कम से कम एक मंत्री पद भी जयंत चौधरी की पार्टी को मिलना तय है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल में भी आरएलडी को मंत्री पद मिलने की संभावना है। अब यह सब समाजवादी पार्टी नहीं दे सकती थी। तो जयंत चौधरी मौके की तलाश में थे कि कुछ ऐसा हो जो उनके कहने के लिए हो जाए कि यह उनकी मजबूरी थी।
 
कुल मिलाकर विपक्ष की राहें अलग अलग हो चुकी हैं। इंडिया नामक गठबंधन का अब कोई अस्तित्व बचा नहीं है जो भी गठबंधन होने हैं वह क्षेत्रीय आधार पर ही होने हैं। एक अखबार में कल कांग्रेस की ही महिला नेता का एक बयान पढ़ने को मिला तो थोड़ा आश्चर्य हुआ और कुछ हद तक सही भी लगा। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी की लगातार हार के बाद कांग्रेस को बहुत कुछ सोचने की आवश्यकता है। मतलब चुनाव से पहले ही कांग्रेस नेता हार मानने लगे हैं। गठबंधन में जब आप बहुत ज्यादा मजबूत न हो तो उसका नेतृत्व नहीं कर सकते भले ही आपके सांसदों विधायकों की संख्या अन्य सहयोगी दलों से अधिक हों। इसका उदाहरण आप बिहार की राजनीति से ले सकते हैं जेडीयू से हर बार भारतीय जनता पार्टी और आरजेडी के विधायक ज्यादा होते हैं लेकिन मुख्यमंत्री हमेशा नितीश कुमार ही बनते हैं। उसका कारण यह है कि वर्तमान समय में बिहार में भारतीय जनता पार्टी और आरजेडी इतनी सशक्त नहीं है कि वह किसी तरह से सरकार बनाने का दम भर सके नतीजा यह होता है कि नितीश कुमार को मुख्यमंत्री पद देकर वह कम से कम सरकार में शामिल हो सकते हैं। और बिहार की राजनीति में लगभग दो दशक से यही हो रहा है। यह वहां की मजबूरी है। जनादेश खंडित मिल रहा है।
 
एक पार्टी सरकार बना नहीं सकती तो भारतीय जनता पार्टी और आरजेडी को नितीश कुमार की तरफ रुख करना पड़ता है। कमोवेश यही स्थिति केन्द्र में भी है क्योंकि जितना भी विपक्ष है वह खंडित है और उसमें भी विपक्ष की कमान कांग्रेस पार्टी अपने हाथ में रखना चाहती है जो कि विपक्ष के अन्य सहयोगी दलों को स्वीकार नहीं होती है। कांग्रेस पार्टी को देश में यदि सत्ता परिवर्तन चाहिए तो बहुत कुछ सोचने की आवश्यकता होगी। नहीं तो वह सत्ता का रास्ता तय नहीं कर सकते। देश की राजनीति बदल चुकी है, पुरानी राजनीति के सहारे अब नहीं चला जा सकता।
 
भारतीय जनता पार्टी केन्द्र और उत्तर प्रदेश में अपने घटक दलों का नेतृत्व इसलिए कर रही है क्योंकि वह दोनों जगह अकेले दम पर भी सरकार बनाने में सक्षम है। वहीं बिहार में भले ही वह जेडीयू से दुगनी सीट जीती हो लेकिन वह सरकार का नेतृत्व नहीं कर पा रही है नितीश कभी भारतीय जनता पार्टी के साथ तो कभी आरजेडी के साथ मिलकर आराम से सरकार बना लेते हैं और उसका नेतृत्व करते हैं। और यही सोच उस समय भी पैदा हुई थी जब इंडिया गठबंधन की नींव रखी गई थी। सभी का लक्ष्य था कि मिलकर एनडीए की सरकार को हटाना। लेकिन कांग्रेस ने नेतृत्व की कमान अपने हाथों से नहीं जाने दी और इंडिया गठबंधन एक एक करके टूटता चला गया। पहले ममता बनर्जी अलग हुईं उसके बाद नितीश ने तो पाला ही बदल लिया इधर जयंत चौधरी भी समाजवादी पार्टी से अलग होकर एनडीए में शामिल हो गए। अब बात आती है उस नेता की जिन्होंने कहा था कि राहुल गांधी की लगातार हार के बाद कांग्रेस को सोचना चाहिए। यह कथन बिल्कुल सत्य है। कांग्रेस को अपने अंदर और गठबंधन कैसे चलते हैं इन सभी पर बहुत कुछ सोचने की आवश्यकता है। जनता आज बहुत जागरूक है और आपको जनता की सोच के अनुसार ही चलना होगा।जो कि कोई विपक्षी दल नहीं सोच पा रहा है। आज देश की आधी आबादी के स्वर एक हैं और आधी आबादी कई टुकड़ों में बंटी हुई है।
 
 भारतीय जनता पार्टी ने जैसा जहां देखा वैसा वहां किया। लेकिन कांग्रेस का गुरुर ही कांग्रेस को उबरने नहीं दे रहा है। कांग्रेस धीरे धीरे सम्पूर्ण हिंदी भाषी बैल्ट खो चुकी है और अब वह केवल दक्षिण राज्यों के दम पर ही राजनीति में टिकी है। चौधरी चरण सिंह ने हमेशा कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के विरोध में राजनीति की थी लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने उनको भारत रत्न देकर अपने पाले में कर लिया। जब कि चौधरी साहब मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक गुरु थे। जयंत के एनडीए के साथ चले जाने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कम से कम दस से बारह सीटों पर असर पड़ेगा और यह बात भारतीय जनता पार्टी अच्छी तरह से जानती थी। और जयंत अचानक एनडीए में नहीं शामिल हुए हैं।
 
और ऐसा भी नहीं कि उनके दादा चौधरी साहब को भारत रत्न देने की घोषणा भारतीय जनता पार्टी ने कर दी है इसलिए वह एनडीए में शामिल हुए हैं। जयंत की बातचीत काफी समय से भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से चल रही थी। पिछले विधानसभा चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी ने काफी कोशिश की थी कि जयंत चौधरी एनडीए के साथ आ जाएं। लेकिन किसान आंदोलन के कारण जयंत चौधरी मजबूर थे। उस समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान एनडीए की सरकार के खिलाफ दिल्ली में धरना दे रहे थे। यहां पर जयंत का किसानों को साथ देना मजबूरी थीं। क्यों कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश गन्ना किसानों की बैल्ट है और जयंत उन्हीं की राजनीति करते हैं।
 
इस बार ऐसा प्रतीत हो रहा है कि विपक्ष ने चुनाव से पहले ही हार मान ली है। अयोध्या इवेंट्स ने तो विपक्ष के होश उड़ा ही दिए थे। रही बची कसर कांग्रेस पार्टी ने पूरी कर दी। विपक्ष इस बार जितना कमजोर दिखाई दे रहा है शायद ही कभी इतना कमजोर दिखाई दिया हो। ऐसा नहीं है कि देश में मुद्दों की कमी है। लेकिन विपक्ष मुद्दों से भटक कर आपसी टकराव में ही ठहर गया। भारतीय जनता पार्टी को यह आभास था कि वह चुनाव से पहले इस गठबंधन को तोड़ने में कामयाब हो जायेगी और हुआ भी वही आज कांग्रेस एक एक पार्टी से क्षेत्रों के हिसाब से गठबंधन करने को आतुर दिखाई दे रही है। लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व वह अपने ही हाथों में रखना चाहती है। और इसी लिए ममता बनर्जी और नीतीश कुमार ने अपने आप को अलग कर लिया। क्यों कि नितीश कुमार और ममता बनर्जी नहीं चाहतीं थीं कि किसी भी हालत में विपक्ष का नेतृत्व कांग्रेस पार्टी करे।
 
 

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