मुफ्त राशन योजना के विस्तार के निहितार्थ

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       डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)

केन्द्र सरकार द्वारा प्रधानमन्त्री गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएमजीकेएवाई) को एक जनवरी 2024 से अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया है| सरकार के इस फैसले की जानकारी देने वाले केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मन्त्री अनुराग ठाकुर के अनुसार उपरोक्त योजना पर 11.80 लाख करोड़ रूपये व्यय होगा तथा 81.35 करोड़ देशवासी लाभान्वित होंगे| गौरतलब है कि इस योजना की शुरुआत वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के समय तब हुई थी जब लॉक डाउन के चलते लोगों के काम-धन्धे बन्द हो गये थे तथा रोज खाने कमाने वालों के सामने भूखों मरने की नौबत आ गयी थी| प्रारम्भ में यह योजना मात्र तीन महीने (अप्रैल मई और जून 2020) के लिए लागू हुई थी| तब देश की 80 करोड़ आबादी को इस योजना का पात्र बनाया गया था| जून के बाद इसे अगले तीन महीने के लिए बढ़ा दिया गया था| तदोपरान्त पुनः तीन-तीन महीने और फिर छै-छै महीने करके 2022 तक यह योजना निर्बाध रूप से चलती रही| एक जनवरी 2023 को इस योजना को नया रूप देते हुए एक वर्ष के लिए पुनः विस्तार दे दिया गया| इससे पहले कि दिसम्बर में इसकी अवधि समाप्त होती, एक जनवरी 2024 से अगले पांच वर्ष के लिए अग्रिम रूप से इसे बढ़ा दिया गया है|

प्रधानमन्त्री गरीब कल्याण अन्न योजना के पात्र व्यक्तियों की यदि बात करें तो अन्त्योदय अन्न योजना के अन्तर्गत कवर किये गये परिवार, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत कवर किये गये परिवार, प्रधानमन्त्री उज्ज्वला योजना के तहत निःशुल्क एलपीजी कनेक्शन प्राप्त करने वाले परिवार, घरेलू मजदूर, निर्माण कार्य मजदूर, आटो-रिक्शा चालक, शहरी बेरोजगार मजदूर तथा ऐसे परिवार जो गरीबी रेखा से नीचे आते हैं वे सभी इस योजना के पात्र हैं| कोई ऐसा परिवार जिसकी मुखिया विधवा हो या घर का सदस्य लाइलाज बीमारी से जूझ रहा हो, दिव्यांग व्यक्ति60 वर्ष से अधिक आयु का व्यक्ति, जिसके पास आय या सामाजिक समर्थन के लिए कोई स्रोत नहीं है| वे भी मुफ्त अन्न पाने के हकदार हैं|

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आज जब कोरोना संकट की भयावयता समाप्त हो चुकी है| जिन्दगी ने अपनी गति पकड़ ली है| तब फिर मुफ्त अन्न वितरण की अवधि को अगले पांच वर्ष के लिए बढ़ाना भला किस उद्देश्य की पूर्ति करता है? सरकारी आंकड़ों की यदि माने तो प्रधानमन्त्री गरीब कल्याण अन्न योजना के उपरोक्त पात्रों की संख्या 2020 में 80 करोड़ थी जो अब बढ़कर 81.35 करोड़ हो गयी है| जबकि सूचना एवं प्रसारण मन्त्री अनुराग ठाकुर यह भी बताते हैं कि बीते पांच वर्षों में 13.50 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आये हैं| अर्थात प्रतिवर्ष लगभग 2.70 करोड़ लोग गरीबी से मुक्त हो रहे हैं| इस हिसाब से 2020 से अब तक 8 करोड़ से भी अधिक लोग गरीबी रेखा से बाहर आये होंगे| वहीँ 2020 से 2023 के बीच प्रधानमन्त्री गरीब कल्याण अन्न योजना के पात्रों की संख्या 80 करोड़ से बढ़कर 81.35 करोड़ हो गयी है| तब फिर 8 करोड़ से अधिक वे कौन लोग हैं जो इन तीन वर्षों में गरीबी रेखा से बाहर आये हैं? यहाँ यह भी प्रश्न उठता है कि 2020 में प्रधानमन्त्री गरीब कल्याण अन्न योजना के पात्र बनाये गये 80 करोड़ लोगों के पास उसके पूर्व आय का क्या स्रोत था, जिससे उनकी उदर पूर्ति होती थी? यदि उनके पास कोई रोजगार था और वह कोरोना संकट के चलते बन्द हो गया था तब फिर उसे पुनः चालू करवाने के लिए क्या प्रयास किये गये? या फिर मात्र प्रधानमन्त्री गरीब कल्याण अन्न योजना की शुरुआत करके कर्तव्य की इतिश्री कर ली गयी| 2028 के बाद क्या फिर से इस योजना को बढ़ाया जायेगा या फिर इन पांच वर्षों में ऐसा कुछ किया जायेगा, जिससे ये गरीब लोग मुफ्तखोरी से मुक्त होकर स्वयं के पैरों पर खड़े हो जायेंगे?

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गरीबी जैसी समस्या का समाधान मुफ्त अन्न योजना से भला कैसे सम्भव है| उलटे लोगों में अकर्मण्यता तथा आलस्य की कुवृत्ति बढ़ेगी| मुफ्त राशन योजना की जमीनी हकीकत क्या है, इसका अन्दाजा गली-गली 18 से 20 रुपये प्रति किलो की दर से चावल खरीदने वालों को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है| यह वही चावल होता है जो प्रधानमन्त्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत लोगों को मिलता है| जिसे बेंचकर ये तथाकथित गरीब शराब और जुएँ पर ही अधिक उड़ाते हैं| देशी शराब के ठेकों पर जुटने वाली भीड़ में सर्वाधिक संख्या इन्हीं तथाकथित गरीबों की होती है| बेहतर होता कि गरीब कल्याण योजना के तहत रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाकर लोगों को अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक किया जाता|

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सस्ती दर पर राशन उपलब्ध करवाना भी एक विकल्प हो सकता है| परन्तु मुफ्तखोरी की लत किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती| सिवाय वोट बैंक मजबूत करने के| जनता को मुफ्त की रेवड़ियाँ बांटने की राजनीतिक दलों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा से लोकतन्त्र का चेहरा दिन प्रतिदिन विकृत होता जा रहा है| जो देश के भविष्य के लिए कतई अच्छा नहीं है| कितना अच्छा होता कि यह प्रतिस्पर्धा मंहगाई कम करने, रोजगार के अवसर बढ़ाने, भ्रष्टाचार को समाप्त करने, शिक्षा का स्तर ऊँचा उठाने, न्यायायिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने तथा देश की एकता-अखण्डता को मजबूत करने की होती| तब शायद यह समझा जा सकता था कि भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है| जिस देश की 81.35 करोड़ अर्थात लगभग दो-तिहाई आबादी मुफ्तखोरी की लत से ग्रसित हो उस देश के विकसित राष्ट्र बनने की कल्पना करना सिर्फ और सिर्फ एक भ्रम ही हो सकता है|

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