अल्पसंख्यक कौन है? उनकी दशा और दिशा

अल्पसंख्यक कौन है? उनकी दशा और दिशा

अल्पसंख्यक कौन है? उनकी दशा और दिशा


सर्वप्रथम सवाल यह है कि हमारे देश में अल्पसंख्यक कौन है? अभी तक हमारे देश में जिन लोगों की संख्या धर्म की दृष्टि से कम है, उन्हें ही अल्पसंख्यक माना जाता है। 

भारत के संविधान में अल्पसंख्यक शब्द का उल्लेख तो है लेकिन परिभाषा नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 29 में कहा गया है कि भारत के किसी भाग के निवासी, नागरिकों के किसी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार होगा। 1946 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग द्वारा अल्पसंख्यक वर्गों के अधिकारों के संरक्षण पर एक विशेष उप-समिति का गठन किया था। इस उप समिति ने कहा था "अल्पसंख्यक" वह है जो अपनी उन स्थिर जातीय, धार्मिक तथा भाषायी परंपराओं या विशिष्टताओं को बनाए रखना चाहते हैं, जो शेष जनसंख्या की जातीय, धार्मिक तथा भाषायी परंपराओं से पूर्णत: भिन्न हैं।"

हमारे देश में जिन समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है ये हैं - मुस्लिम, पारसी, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन। इनमें से मुस्लिम, पारसी, ईसाई, सिख और बौद्ध को 1993 में केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर अल्पसंख्यक घोषित किया था और जैनियों को 2014 में एक अलग अधिसूचना जारी कर के किया था। 

हमारे देश में अल्पसंख्यक समुदाय की जनसंख्या में मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 14.2 प्रतिशत, ईसाइयों की जनसंख्या 2.3 प्रतिशत, सिखों की जनसंख्या 1.7 प्रतिशत, बौद्धों की जनसंख्या 0.7 प्रतिशत, जैनियों की जनसंख्या 0.4 प्रतिशत, पारसियों    की जनसंख्या 0.06 प्रतिशत है।

1978 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक प्रस्ताव के माध्यम से अल्पसंख्यकों के कल्याण लिए एक आयोग की बात कही थी। उस प्रस्ताव में कहा गया था कि "संविधान में दिए गए संरक्षण और कई कानूनों के होने के बावजूद, देश के अल्पसंख्यकों में एक असुरक्षा और भेदभाव की भावना है।" इसी भावना को मिटाने के लिए अल्पसंख्यक आयोग का गठन हुआ। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 आया जिसके प्रावधानों के तहत ही 1993 की अधिसूचना आई। इस आयोग का मुख्य उद्देश्य है अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों का संरक्षण करना, उनके हालात का समय-समय पर जायजा लेना, उनके विकास के लिए सरकार को सुझाव देना, उनकी शिकायतें सुनना और उनका निवारण करना। इस व्यवस्था में हर राज्य में एक राज्य अल्पसंख्यक आयोग बनाने का भी प्रावधान रखा गया था लेकिन आज भी देश के कम से कम 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अल्पसंख्यक आयोग नहीं बना है। आज जरूरत है सभी राज्यों में अल्पसंख्यकों के लिए आयोगों की स्थापना की जाए ताकि उनके दशा और दिशा पर आयोग विचार कर सके और अल्पसंख्यकों की शिकायतों का निवारण कर सके और उसका कल्याण कर सकें।

संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता के जो भी प्रावधान हैं वे सभी अल्पसंख्यकों के लिए भी हैं। इसके अलावा अल्पसंख्यकों को अपने हिसाब से शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना करने का और उन्हें चलाने का अधिकार है। इस तरह के संस्थानों को सरकारी मदद में भेदभाव से संरक्षण भी मिलता है। जहां तक सुविधाओं की बात है तो समय-समय पर सरकारें अल्पसंख्यकों के लिए कई तरह की योजनाएं बनाती रहती हैं। 2005 में केंद्र सरकार ने भारत में मुस्लिम समुदाय के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक हालत जानने के लिए जस्टिस सच्चर कमेटी बनाई थी। इस कमेटी ने कम से कम 75 अलग-अलग सुझाव दिए और बाद में इनमें से कुछ को ही लागू किया गया। बाकी सुझावों को लागू करने की जरूरत है।

अल्पसंख्यकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट में आजकल एक अजीब से मामले पर बहस चल रही है। मामला यह है कि क्या भारत के कुछ राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक माना जाए या नहीं? इस मामले में पूर्व में भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने एक याचिका दायर की थी। इस याचिका में मुख्य दलील यह थी कि जम्मू और कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों समेत कुल 8 राज्यों में हिन्दू समुदाय के लोगों की जनसंख्या कम है, जिसकी वजह से उन्हें उन राज्यों में अल्पसंख्यकों का दर्जा और सुविधाएं मिलनी चाहिए।

इस मामले पर फैसला देते हुए  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धर्म की कोई सीमा नहीं होती और उसे अखिल भारतीय स्तर पर देखा जाना चाहिए, ना की राज्य के आधार पर। अंततः अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि इस देश में भाषाएं जरूर एक राज्य या एक से अधिक राज्यों तक सीमित हैं, लेकिन धर्मों की राज्य के आधार पर सीमाएं नहीं होती। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालत ने किसी को अल्पसंख्यक घोषित नहीं किया है और यह सरकार का काम है।

आज भी अल्पसंख्यकों की मुख्य समस्या अशिक्षा तथा आर्थिक पिछड़ापन है। अनिवार्य शिक्षा का नियम कठोरता से लागू किया जाना चाहिए। बिना शिक्षा के विकास की कल्पना नहीं किया जा सकता और सामाजिक समानता का स्तर प्राप्त नहीं किया जा सकता है। आज असमानता ही देश की बड़ी समस्या बनती जा रही है। हम सभी को मिलकर इसे अब खत्म करना होगा। असमानता का सबसे बुरा प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है। सामाजिक असमानता, आर्थिक असमानता, शैक्षिक असमानता, क्षेत्रीय असमानता और औद्योगिक असमानता विकास में जहां बाधा बनी है वहीं महिलाओं की उपेक्षा हुई है। महिलाओं की उपेक्षा का मतलब है आधी जनसंख्या की उपेक्षा करना क्योंकि जनसंख्या में लगभग आधा हिस्सा महिलाओं का है।

कृष्ण कुमार (भूगोल ऑनर्स)

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