देश में जनता कंगाल राजनीतिक पार्टियां मालामाल ?

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देश में जनता कंगाल राजनीतिक पार्टियां मालामाल ? पत्रकार व लेखक: प्रशांत तिवारी लोकपाल भ्रष्टाचार कालाधन जैसी बातों को आंदोलन का रूप देकर जिस बदलाव की आशा भारत की जनता दो हजार तेरह में की थी क्या वह भ्रष्टाचार लोकपाल और काला धन आम जनता को सकून दे पाई है यह बात खैर भारत की

देश में जनता कंगाल राजनीतिक पार्टियां मालामाल ?

पत्रकार व लेखक: प्रशांत तिवारी

लोकपाल भ्रष्टाचार कालाधन जैसी बातों को आंदोलन का रूप देकर जिस बदलाव की आशा भारत की जनता दो हजार तेरह में की थी क्या वह भ्रष्टाचार लोकपाल और काला धन आम जनता को सकून दे पाई है यह बात खैर भारत की जनता ही बता सकती है लेकिन हमारे कुछ जानने वाले लोगों ने बताया कि हमारी उम्मीदें और उसमें पंख लगने के सिवा हमें अब तक कुछ नहीं मिला है और तो और मार्केकेट में पैसों का आदान-प्रदान बंद होने और पाबंदियां लगने की वजह से हमारेे बिजनेस भी बर्बाद हो गए हैं महंगाई आसमान छू रही है

अन्ना के लोकपाल से जो उम्मीदें भारत की जनताा को दिखाई गई वह भी देश में पास नहीं हो सका काले धन के नाम पर घरों में मेहनत की कमाई से बेटी बहनों के पास भी मौजूूद रकम को अवैध घोषित कर दिया गया तो दूसरी तरफ देश में मौजूद पार्टियों की चांदी हो गई रही बात भ्रष्टाचार की तो जहां काम हमारे थाने से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों के ऑफिसों में दो सौ मेंं हुआ करते थे वहीं अब दो हजार का नोट देना पड़ता है कुल मिलाकर देखा जाए तो 2013 के सपनोंं को पंख विहीन बना दिया गया और विकास के नाम पर भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि आम जनता अपने को ठगा महसूस कर रही है आम जनता अब यह भी कहने से गुरेज नहीं कर रही है कि जिस तरह हमारे ऊपर टैक्स का बोझ डाल दिया गया है वैसे देश के सभी नेता अपनी पार्टियों के लिए नियम क्यों नहीं बनाते क्यों टैक्स के नाम पर आम जनता का शोषण किया जा रहा है

मतलब आम जनता कंगाल और राजनीतिक पार्टियां मालामाल! बात भी ठीक है सरकार बीते सालों में भ्रष्टाचार रोकने की गरज से आम लोगों के तमाम तरह के नकद लेन-देन पर पाबंदियां लगाती रही है, लेकिन ऐसा लगता है कि राजनीतिक पार्टियों के लिए इस मामले में कुछ दूसरे ही मानदंड बन गए हैं.राजनीतिक पार्टियों का घरौंदा भरते जा ना और बड़े ही आंकड़ा के साथ यह दावा करना स्वाभाविक ही है कि यह रकम उन्हें आम लोगों से मिली है जिन्होंने पसंदीदा पार्टी के लिए अपनी कड़ी मेहनत से कमाए रुपये चंदे में दिए हैं.कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियां भी अपने आमदनी-खर्च का ब्यौरा नियत तिथि के बाद आयकर विभाग में जमा करती हैं. दूसरी तरफ इन्हें अपने चंदा दाताओं का नाम गोपनीय रखने की भी छूट है. अब इन पार्टियों के साथ ही तमाम दूसरी पार्टियों को मिलने वाली यह रियायत बंद होनी चाहिए और नहीं तो यही मानदंड देश में आम जनता के लिए भी हो.

राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले हर तरह के चंदे दान का हिसाब रखा जाए और उसे सार्वजनिक किया जाए. यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि काले धन का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक पार्टियों को मिलता है या फिर चुनाव प्रचार में खर्च होता है.आम नागरिक और कंपनियां अगर आयकर विभाग को अधूरी या गलत जानकारी देती हैं तो उन्हें इसका नतीजा बड़े स्तर पर भुगतना होता है, तो अब समय आ गया है कि राजनीतिक पार्टियों के साथ भी यही बर्ताव हो.राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने के लिए अब इलेक्टोरल बॉन्ड की व्यवस्था तो बन गई है

लेकिन इसमें भी पारदर्शिता का अभाव है. इनके इस्तेमाल के बावजूद मतदाताओं से यह जानकारी छिपाई जा सकती है कि राजनीतिक पार्टियों को कौन-कौन चंदा देता है. यह जानकारी मिलना नागरिकों का अधिकार है ताकि वे इसके आधार पर मतदान के समय अपना सही उम्मीदवार और पार्टी चुन सकें.हालांकि अब यह नियम बन चुका है कि राजनीतिक पार्टियों को 2000 रुपये से ज्यादा का चंदा देने वाले हर व्यक्ति या स्रोत की पहचान उजागर करनी होगी. यह नियम वित्त वर्ष 17-18 से लागू है. माना जा रहा है कि इससे पार्टियों को अज्ञात स्रोतों से मिलने वाले चंदे पर लगाम लग सकेगी.

वहीं दूसरी तरफ इससे जुड़ी सबसे बड़ी चिंता की बात यह सामने आई है कि इन पार्टियों की आमदनी का एक अहम हिस्सा अज्ञात स्रोतों से आया है. अगर हम भाजपाा की बात कर ले तो भाजपा की राजनीतिक ताकत 2014 के बाद बढ़ती चली गई है उसकी आमदनी 2015-16 में 570 करोड़ रुपये के मुकाबले 2016-17 में 1,034 करोड़ रुपये हो गई. हालांकि इस दौरान और भी पार्टियों की आमदनी बढ़ी है, लेकिन भाजपा ने इन सबको काफी पीछे छोड़ दिया है.भाजपा को 2016-17 के दौरान कुल 997 करोड़ रुपये का चंदा मिला है और इसमें से 533 करोड़ रुपये उसे उन लोगों स्रोतों से मिले जिनका योगदान 20 हजार रुपये से ज्यादा का है. कांग्रेस को चंदा देने वाले ऐसे लोगों की सूची भी लंबी है. यह बड़ी दिलचस्प बात है कि बहुजन समाज पार्टी 2016-17 के दौरान कुल 75 करोड़ रुपये मिले और उसका दावा है कि उसे 20 हजार से ज्यादा की रकम का कोई चंदा ही नहीं मिला.अब यह किसी को नहीं पता कि भाजपा को बाकी के 464 करोड़ रुपये या बसपा को 75 करोड़ रुपये का चंदा आखिर कहां से मिला है.

लेकिन अगर पार्टियों द्वारा उसे मिले चंदे के ब्यौरे पर नजर डालें तो पता चलता है कि नकदी का लेन-देन तब भी अज्ञात स्रोतों से मिले चंदे का एक बड़ा हिस्सा है. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि जब आम जनता या कंपनियों के लिए हर ट्रांजैक्शन की जानकारी इनकम टैक्स भरते समय आइटीआर बैलेंस शीट और कंप्यूटेशन शीट के मार्फत बतानी पड़ती है तो इन पार्टियों से भी पूछना और आम जनता के बीच हर साल ब्यौरा उपस्थित भी होना चाहिए नहीं तोो जनता कंगाल पार्टियां मालामाल वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी

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