पीएच-डी शोधार्थी ने बनाया गोंड़ी फांट

पीएच-डी शोधार्थी ने बनाया गोंड़ी फांट

भारत विभिन्न परंपराओं, बोलियों और भाषाओं का देश रहा है।

लेकिन समय के साथ कई बोलियां और भाषाएं विलुप्त होने की कगार पर खड़ी है। जरूरत इस बात की है कि इन भाषाओं को बचाने के लिए कदम उठाएं जाएं।

इन भाषाओं को बचाने का एक तरीका यह हो सकता है कि इनको कम्प्यूटर पर लिखने योग्य बनाया जाए। अर्थात इनको डिजिटल किया जाए। इस क्षेत्र में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के जनसंचार के पीएच-डी शोधार्थी सन्नी कुमार गोंड़ ने मसाराम गोंड़ी लिपि का फांट का बना कर हाशिए पर जाती हुई

गोंड़ी भाषा को डिजिटल क्रांति से जोड़कर एक ऐतिहासिक कार्य किया है। गोंड़ी एस. (Gondi S) नामक इस फांट के माध्यम से कम्प्यूटर पर गोंड़ी लिपि आसानी से टाइप की जा सकती है। 
इस गोंड़ी लिपि का लोकार्पण हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार डॉ. रामदरश मिश्र ने आज अपने निवास स्थान पर किया। इस अवसर पर मिश्र जी की चर्चित कविता “आकाश से बहती है नदी” को सन्नी ने गोंड़ी लिपि में टाइप कर हिंदी साहित्य को गोंड़ी लिपि में उपलब्ध कराने का आगाज किया।  


गौरतलब है कि गोंड़ी लिपी पहले से ही मौजूद थी। इस फांट की खासियत यह है कि इसको टाइप करने वाला की-बोर्ड का लेआउट काफी हद तक इनस्क्रिप्ट से मिलता-जुलता हैं। अगर किसी व्यक्ति को इनस्क्रिप्ट टाइपिंग आती है

तो वह इसको भी आसनी से टाइप कर सकता है।
फांट की जानकारी देते हुए सन्नी ने बताया कि गोंड़ी बोलने वाले लोग तो मिल जाएंगे लेकिन दुखद स्थिति यह है कि लिखने और पढ़ने वाले अब काफी सीमित संख्या में बचे हैं।

इसलिए अपनी भाषाई विरासत के संरक्षण और विकास के लिए जरूरत इस बात की है कि इस भाषा और इस लिपि को लोकप्रिय बनाया जाए। 

 

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