मानसिक रोग: एक चिंता का विषय

मानसिक-रोग:-एक-चिंता-का-विषय

अलका वर्मा
दिल्ली यूनिवर्सिटी

मानसिक रोग एक ऐसा रोग है जिसके बारे में लोग बात करना पसंद नहीं करते। मानसिक रोग एक गंभीर समस्या बन गई है तभी भी लोगों में अभी इसे लेकर जागरूकता की कमी है।

आए दिन हमें यह सुनने को मिलता है कि किसी ने आत्महत्या कर ली और लोग इसे डिप्रेशन बोल कर छोड़ देते हैं। कोई इस मामले को गंभीरता से नहीं लेता और मानसिक स्वास्थ्य को जरूरी नहीं समझता। मानसिक रोग में इंसान अपने मनोदशा, याददाश्त, स्वभाव और भावों को अपने नियंत्रण में नहीं रख पाता। जिन लोगों में मानसिक रोग कि जागरूकता भी है

तो वह केवल इसे डिप्रेशन के नाम से जानते हैं। लोगों को यह समझना होगा कि डिप्रेशन केवल एक प्रकार का मानसिक रोग है, मानसिक रोग कई तरह के होते हैं, जैसे बुजुर्गों में होने वाला मानसिक रोग जिसमें उनकी याददाश्त कमजोर हो जाती है या फिर बच्चों में होने वाली ‘लेर्निंग डिसेबिलिटी’ जिसमें उन्हें पढ़ने- लिखने में परेशानी होती है।

2019 में ‘दा लैंसेट साइकेट्री’ में छपे एक शोध के मुताबिक भारत में लगभग 19 करोड़ लोग मानसिक रोग से ग्रस्त है। ‘डब्लू.ऐच.ओ’ के रिपोर्ट के मुताबिक हर 4 में से 1 इंसान को मानसिक या न्यूरोलॉजिकल रोग अपने जीवन में किसी न किसी  मोड़ पर होने  की संभावना होती है।

मानसिक रोग और लोगों की मानसिकता

मानसिक रोग के इतने व्यापक होने के बावजूद भी लोगों में इसकी जागरूकता की कमी है। जो लोग जानते भी हैं तो इसे बस डिप्रेशन के नाम से ही जानते है। लोगों को लगता है कि मानसिक रोग लाइलाज है और इसको काबू में नहीं किया जा सकता। पर ऐसा नहीं है, मानसिक रोग भी बाकी रोगों कि तरह ही है,

थोड़ी सी देखभाल से रोगी की हालत में सुधार लाया जा सकता है। मानसिक रोगी को ऐसे नजर से देखते है जैसे कि उनसे कोई गलती हो गई हो। उनसे भेद – भाव और पक्षपात किया जाता है। लोग मानसिक रोगी को निषेध और कलंक की नज़र से देखते हैं।

गाँवों में तो और बुरा हाल है, वहां कोई जानता ही नहीं की मानसिक रोग भी कुछ होता है वो  इस परेशानी को भूत – प्रेत और जादू- टोना का नाम दे देते हैं। उन्हें लगता हैं कि यह ऊपरी हवा है और वो चिकित्सा की जगह झाड़ –  फूंक के लिए ले जाते हैं, जिससे मरीज की हालत और खराब हो जाती है।

इस मानसिकता के कारण जिन लोगों को मानसिक रोग होता है वे समाज के डर से कि समाज क्या सोचेगा किसी को अपनी परेशानी के बारे में नहीं बताते। अगर रोगी चाहे भी इलाज करवाना तो उसके सगे – सम्बन्धी समाज के डर से, अपनी इज्जत बचाने के लिए या परिस्थिति की गंभीरता को ना समझते हुए रोगी को ही बहलाने लगते है कि कुछ नहीं हुआ और सब ठीक हो जाएगा।

लोगों को समझने की जरूरत है कि मानसिक रोग का भी इलाज है। वो लोग भी अपनी जीवनशैली आम इंसान की तरह व्यतीत कर सकते है बस उन्हें थोड़ी मदद,  देखभाल और शुरूआती सहारे की जरूरत है। लोगों को लगता है कि मानसिक रोगियो को बस अस्पताल मे जंजीरों से ही बांधकर रखने से इलाज होता है और ये दूसरों क लिए खतरा साबित हो सकते हैं। पर लोगों को समझने कि जरूरत हैं कि मानसिक रोगी खुद परेशानी से गुज़र रहे होते है वे क्या किसी को नुक़सान पहुंचाएंगे।

लोगों को जानने की जरूरत है कि मानसिक रोगियों के उपचार के लिए मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक, काउंसलर और थेरेपिस्ट हैं जो उनका उपचार करते हैं। ये डॉक्टर्स प्राइवेट और गवर्नमेंट दोनों ही स्थापनाओं में उपचार करते हैं। आज कल मानसिक स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है तो काफी एनजीओ भी है जो मानसिक रोगियों की सहायता के लिए उपलब्ध हैं।

डिप्रेशन के लक्षण

सभी मानसिक रोगों में से सबसे ज्यादा मामले डिप्रेशन के ही होते हैं।  आत्महत्या के मामले भी डिप्रेशन कि वजह से ही सबसे अधिक होते हैं। डिप्रेशन किसी को भी हो सकता है,  बच्चे, युवा या बुजुर्गों में। कैसे पहचाने की किसी को डिप्रेशन है या नहीं। डिप्रेशन के प्रमुख लक्षण:

  • डिप्रेशन मुख्य रूप से एक मूड डिसऑर्डर है मतलब जिसमें आपका मूड आपके नियंत्रण में नहीं रहता। डिप्रेशन का प्रमुख लक्षण यही है कि उसका मन बहुत उदास रहता है और किसी भी काम में मन नहीं लगता, जिन काम को करने में पहले उसको आंनद आता था वह भी करने का मन नहीं करता।
  • नींद में बदलाव आना, या तो हद से ज्यादा नींद आना या नींद में बहुत ज्यादा कमी आना।
  • भूख कम होना।
  • अचानक ही वजन का बढ़ना या घटना।
  • व्याकुलता, बेचैनी और एक जगह ना बैठ पाना।
  • चलने की गति और बोलने की गति धीरे हो जाना।
  • थकान महसूस होना और कमज़ोरी होना।
  • अपने आप को बेकार समझना और किसी बात के लिए दोषी ठहराना।
  • सोचने की क्षमता कम हो जाना, ध्यान में कमी आना और कोई निर्णय ना ले पाना।
  • निराशावादी होना और बार – बार मरने का या आत्महत्या करने का खयाल आना या आत्महत्या करने की कोशिश करना।

पहचान के बाद कहां से और कैसे करवाए इलाज?

अगर आपके संपर्क में किसी व्यक्ति को ऊपर दिए गए लक्षण हैं और इन लक्षणों की वजह से उसकी दिनचर्या बहुत ज्यादा प्रभावित हो रही है तो उसे तुरंत इलाज के लिए जाना चाहिए। चूंकि डिप्रेशन एक मूड की बीमारी है तो मूड किसी का भी थोड़ा बहुत ऊपर – नीचे हो सकता है, किसी दिन हमें अच्छा लगता है तो किसी दिन हम थोड़ा उदास महसूस करते हैं पर इसका मतलब यह नहीं कि सबको डिप्रेशन है। आज कल वैसे भी किसी का थोड़ा सा भी मन उदास हो तो वह कहता है कि वह डिप्रेस है। पर ऐसा नहीं करना चाहिए क्यूंकि डिप्रेशन एक बीमारी है ना कि आम भाषा में इस्तेमाल करने वाला कोई शब्द जो कि आपके मूड को बताए।

अब जब आप किसी ऐसे इंसान के संपर्क में आए जिसको डिप्रेशन हो तो सबसे पहले तो बेहद संवेदनशीलता के साथ उनसे पेश आए क्यूंकि वह वैसे भी निराशावादी हो जाता है और मरने के खयाल भी आते है। कुछ डिप्रेशन से ग्रस्त लोग दिखने में सामान्य लोग कि तरह ही होंगे और शायद किसी से कुछ ना कहना पसंद करें। वे दिखाएंगे कि वे ठीक हैं पर असल में उनका मतलब होता है मुझे बचाओ प्लीज़, इसलिए सबसे पहले उनका भरोसा जीतना होगा कि हम मदद के लिए तैयार हैं और वास्तव में मदद करनी होगी अन्यथा उनका भरोसा टूटेगा तो वो फिर मदद लेने की हिम्मत भी नहीं कर पाएंगे।

मानसिक रोग का इलाज मुख्य तौर पर 4 प्रकार से होता है:

1. मनोचिकित्सक,  जिनको आसान भाषा में अगर समझना चाहे तो बोल सकते हैं कि वे मानसिक रोग की दवाई देते है और शायद इसलिए लोगों को छोंटी सी भी दिक्कत हो तो उन्हीं के पास जाना पसंद करते है क्यूंकि उन्हें लगता है कि दवाई से सब कुछ जल्दी ठीक हो जाएगा।

2. मनोवैज्ञानिक, जो कई प्रकार के होते हैं, चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट, कॉग्निटिव साइकोलॉजिस्ट, क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट और भी कई तरह के। ये मनोवैज्ञानिक व्यक्ति के मानसिक प्रतिक्रियाओं, भावो, स्वभावो का अध्ययन करते है।

3. काउंसलर, ये भी कई तरह के होते हैं,  जैसे मैरिज एंड फैमिली काउंसलिंग, गाइडेंस एंड कैरियर काउंसलिंग, मेंटल हेल्थ काउंसलिंग। काउंसलर कम समय में व्यक्ति के परेशानी का हल निकालने की कोशिश करता है।

4. थेरेपिस्ट, ये इंसान की थेरेपी करते हैं, थैरेपी लंबे समय तक चलती है और बहुत सारे विषयों पर काम किया जाता है।

आम तौर पर भारत में लोग मनोचिकित्सक के पास जाना पसंद करते है क्यूंकि वे दवा देते है और लोग समझते है कि इससे सब ठीक हो जाएगा। पर ऐसा नहीं है लोगों को मनोचिकित्सक के साथ – साथ काउंसलिंग भी लेनी चाहिए क्यूंकि वो  ही असल में आपकी मदद करेंगे कि आपको कैसे अपने जीवन को और सुखद बनाना है। लेकिन भारत में बहुत कम ही जगह ऐसा देखने को मिलता है कि लोग ऐसे स्थापना में जाते हैं जहा मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और काउंसलर की टीम साथ में काम कर रही हो। इन तीनों का साथ में काम करना बहुत जरूरी है।

जब भी लोगों को थोड़े से भी लक्षण दिखने लगे तो उनको काउंसलिंग के लिए जाना चाहिए। काफी हद तक वहीं से मदद मिल जाएगी और रोग भी नहीं बढ़ेगा। अगर लक्षण हद से ज्यादा हो जाए तो लोगों को ऐसे स्थापना में जाना चाहिए जहां मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और काउंसलिंग की टीम हो। क्यूंकि दवा तो  दिमाग पर काम करेगी पर रोग की वजह से रोगी में जो बदलाव आ गए हो जैसे आत्मविश्वास की कमी, जीवनशैली में परिवर्तन, उत्साह की कमी इन सबको ठीक करने के लिए रोगी को काउंसलिंग की जरूरत होती है।

स्वयं की देखभाल

  • रोजाना एक ही वक्त पर सोए और एक ही वक़्त पर जागें
  • रोज़ नियमित रूप से व्यायाम और ध्यान करें और सूरज कि रोशनी में थोड़ी देर बैठे
  • अपने लिए रोज़ कुछ समय निकाले और अपनी पसंदीदा चीज को करें
  • डायरी लिखने का शौक हों तो वो भी करें
  • खुद से सकारात्मक बातें करें

मानसिक रोग इतना व्यापक होने के बाद भी अभी तक लोग इसे लेकर जागरूक क्यों नहीं है?

अभी भी लोगों के मन में मानसिक रोगी क लिए गलत धारणाएं क्यों है?

आज भी मानसिक रोगी अगर इलाज करवाता है तो समाज से क्यों छुपाया जाता है?

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