‌पीठ प्रशांत भूषण के स्पष्टीकरण पर करेगी फैसला

‌पीठ प्रशांत भूषण के स्पष्टीकरण पर करेगी फैसला।

‌ स्वतंत्र प्रभात

‌ प्रयागराज।

‌उच्चतम न्यायालय ने सोमवार 4 अगस्त, 20 को वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के विरुद्ध वर्ष 2009 में दायर एक अवमानना मामले में उनके द्वारा प्रस्तुत स्पष्टीकरण को स्वीकार करने या न करने पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।

‌यह आदेश आज न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, बीआर गवई और कृष्ण मुरारी की खंडपीठ ने एमिकस क्यूरी बनाम प्रशांत भूषण और अन्य में पारित किया। आदेश में कहा गया है कि प्रशांत भूषण / प्रतिवादी नंबर1 और तरुण तेजपाल / प्रतिवादी नंबर 2 द्वारा प्रस्तुत स्पष्टीकरण / माफी, अब तक प्राप्त नहीं हुई है। यदि हम स्पष्टीकरण / माफी स्वीकार नहीं करते हैं, तो हम मामले की सुनवाई करेंगे। हम आदेश सुरक्षित रखते हैं।
‌आज की सुनवाई शुरू होने पर जस्टिस मिश्रा ने वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन से कहा कि बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अदालत की अवमानना के बीच मौजूद पतली रेखा को समाप्त करने में सहायता करने के लिए सहयोग करें।

‌जवाब में धवन ने कहा कि भूषण ने एक स्पष्टीकरण दिया है। यह स्पष्टीकरण इसका अंत कर सकता है। इसके बाद जस्टिस मिश्रा ने धवन से फोन पर बात की। इसके तुरंत बाद पीठ उठ गई।

‌ हालांकि पीठ ने दिन के लिए सूचीबद्ध मामलों को समाप्त करने के बाद दोपहर में फिर से सुनवाई शुरू की। तब तक उसने वरिष्ठ अधिवक्ता धवन और कपिल सिब्बल को व्हाट्सएप कॉल किया था।

‌जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष प्रशांत भूषण के खिलाफ 2009 के अवमानना मामले की सुनवाई में, आज सुबह खुली अदालत में सुनवाई के बजाय पीठ ने उत्तरदाताओं डॉ. राजीव धवन और कपिल सिब्बल से व्हाट्सएप कॉल पर बातचीत की। न्यायाधीशों ने काउंसिल से कहा कि वे अदालत और न्यायाधीशों की गरिमा की रक्षा के लिए इस मामले को समाप्त करना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने पार्टियों से उनके माफी मांगने वाले बयान जारी करने को कहा। प्रशांत भूषण ने माफी मांगने से इनकार कर दिया लेकिन वह स्पष्टीकरण बयान जारी करने पर सहमत हो गए।

‌प्रशांत भूषण ने 4 अगस्त, 2020 को अदालत में बयान दिया कि 2009 में तहलका को दिए अपने साक्षात्कार में मैंने भ्रष्टाचार शब्द का व्यापक अर्थ में उपयोग किया है। जिसका अर्थ है स्वामित्व की कमी। मेरा मतलब केवल वित्तीय भ्रष्टाचार या किसी भी प्रकार के लाभ को प्राप्त करना नहीं था। अगर मैंने जो कहा है, उससे किसी शख्स को या उससे जुड़े परिवारों को किसी भी तरह की ठेस पहुंची है, तो मुझे उस पर पछतावा है।

‌मैं अनारक्षित रूप से कहता हूं कि मैं न्यायपालिका की संस्था और विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय का समर्थन करता हूं जिसका मैं एक हिस्सा हूं, और न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को कम करने का मेरा कोई इरादा नहीं था जिसमें मुझे पूरा विश्वास है। मुझे पछतावा है कि अगर मेरे साक्षात्कार को ऐसा करने के लिए गलत समझा गया, तो यह न्यायपालिका, विशेष रूप से उच्चतम न्यायालय की प्रतिष्ठा को कम करना है, जो कभी भी मेरा उद्देश्य नहीं हो सकता था।

‌सुनवाई के दौरान कपिल  सिब्बल ने तेजपाल के बयान को पेश किया जिसमें  तेजपाल ने स्पष्ट तौर पर उस अपराध के लिए सशर्त क्षमा याचना किया है जिसके कारण उच्चतम न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंची, जैसा कि सुनवाई के दौरान कहा गया था।

‌अदालत दोपहर बाद फिर बैठी और जब न्यायमूर्ति मिश्रा ने संकेत दिया कि वह एक आदेश पारित कर सकते हैं कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार संबंधी कोई भी बयान अवमानना के दायरे में आएगा, तो डॉ. धवन ने उनसे कहा कि ऐसी कोई टिप्पणी या निर्णय तब तक नहीं हो सकता जब तक सभी पक्षों को पूरी तरह सुना न जाए । व्हाट्सएप पर पहले की चर्चा केवल इस बारे में थी कि क्या बयानों के आलोक में कार्यवाही को रद्द किया जा सकता है। इसलिए डॉ. धवन ने अदालत से कहा कि अगर माननीय न्यायाधीश इस तरह का कोई निर्णय सुनाना चाहते हैं कि साक्षात्कार अवमानना का कारण है या नहीं तो उन्हें तथ्यों और कानून पर पक्षकारों को पूरी तरह से सुनना होगा। इसके बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित कर लिया।

‌ प्रयागराज ब्यूरो से दया शंकर त्रिपाठी और कानून के जानकार वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।