9 साल हिरासत में रहने के बावजूद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नहीं दी जमानत

सुप्रीम कोर्ट ने की आलोचना

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ब्यूरो प्रयागराज। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में हत्या के आरोपी को ज़मानत दी, जिसने हत्या के मामले में विचाराधीन कैदी के तौर पर जेल में लगभग नौ साल बिताए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि हाई कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी के 'जल्द सुनवाई के मौलिक अधिकार' को समझने में नाकाम रहा।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के ज़मानत न देने के आदेश पर कड़ी नाराज़गी ज़ाहिर की। बेंच ने इस मामले को "बहुत चौंकाने वाला" और विवादित आदेश को "बहुत निराशाजनक" बताया। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल खत्म हुए बिना याचिकाकर्ता को इतने लंबे समय तक जेल में रखना, 'जल्द सुनवाई के अधिकार' का घोर उल्लंघन है।

यह पहली बार नहीं है जब जस्टिस पारदीवाला की अगुवाई वाली बेंच ने ज़मानत के मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट की आलोचना की। हाल ही में, बेंच की ऐसी ही एक आलोचना के बाद हाईकोर्ट के जज ने अनुरोध किया था कि उन्हें ज़मानत से जुड़े मामलों की लिस्ट (रोस्टर) से हटा दिया जाए। पिछले साल, जस्टिस पारदीवाला की बेंच ने निर्देश दिया था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक और जज को आपराधिक मामलों की लिस्ट से हटा दिया जाए। इस आदेश को बाद में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के अनुरोध पर वापस ले लिया गया था।

याचिकाकर्ता वैभव सिंह को 7 मार्च, 2017 को गिरफ्तार किया गया था। उन पर गोरखपुर के कैंट पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 148, 149, 120-B और 302 के तहत अपराधों का आरोप है। जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट दाखिल की गई और मामला सेशंस कोर्ट को सौंप दिया गया, जहां ट्रायल अभी भी चल रहा है।

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लंबे समय तक हिरासत में रहने की बात पर ध्यान देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता लगभग नौ सालों से एक विचाराधीन कैदी के तौर पर जेल में बंद है।

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सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले में गलती पाई, जिसमें उसने ट्रायल शुरू होने के बाद ज़मानत न देने के लिए 'X बनाम राजस्थान राज्य' (2024 INSC 909) मामले के पिछले फैसले का हवाला दिया था। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि एक बार ट्रायल शुरू हो जाने के बाद आम तौर पर ज़मानत नहीं दी जानी चाहिए और उस चरण में सबूतों में मौजूद कमियों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।

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बेंच ने माना कि हाई कोर्ट, जिस फैसले का हवाला दिया गया, उसका असली मतलब समझने में नाकाम रहा और उसने याचिकाकर्ता के लगातार जेल में रहने की मुख्य बात को नज़रअंदाज़ किया।

कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि हाईकोर्ट को हिरासत की अवधि और जल्द सुनवाई के संवैधानिक आदेश पर विचार करना चाहिए था। कानून के स्थापित सिद्धांतों पर ज़ोर देते हुए बेंच ने दोहराया कि सिर्फ़ अपराध की गंभीरता के आधार पर किसी को अनिश्चित काल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब मुक़दमे में बेवजह देरी हो रही हो।

कोर्ट ने कहा, “अपने कई फ़ैसलों में और कई मौकों पर हमने साफ़ शब्दों में कहा है कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, लेकिन अगर आरोपी को जल्द सुनवाई का उसका अधिकार नहीं मिलता है और वह अपनी किसी भी गलती के बिना सालों से जेल में सड़ रहा है तो उसे अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता।”

कोर्ट ने आगे कहा कि यह मामला ऐसी स्थिति दिखाता है, जहां अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का उल्लंघन साफ़ तौर पर रिकॉर्ड में दिख रहा था। इसलिए राहत देने से पहले राज्य के जवाब का इंतज़ार करना ज़रूरी नहीं था।

 

तदनुसार, कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को तुरंत ज़मानत पर रिहा किया जाए, बशर्ते उस पर ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई शर्तें लागू होंगी। साथ ही अगर किसी अन्य मामले में उसकी ज़रूरत न हो

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