राजनीति
कछुए की तरह रेंग रहा है राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का सपना
छठे वर्ष में भी चुनौतियाँ बरकरार, क्रियान्वयन की गति धीमी
लेखक: राजीव शुक्ला
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 को लागू हुए छह वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान 5+3+3+4 की नई संरचना, बहु-विषयी शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और निरंतर मूल्यांकन जैसे सुधारों की दिशा में कुछ प्रगति हुई है, लेकिन आधारभूत चुनौतियाँ—शिक्षक कमी, बुनियादी ढांचे की कमी, शिक्षक प्रशिक्षण की अपर्याप्तता और धनराशि की कमी—अभी भी शिक्षा व्यवस्था को जकड़े हुए हैं। विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार, नीति का वास्तविक रूपांतरण अभी भी दूर है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और सरकारी स्कूलों में।
NEP 2020 का मूल उद्देश्य रट्टा-आधारित शिक्षा को समाप्त कर कौशल-उन्मुख, लचीली और समावेशी शिक्षा प्रणाली विकसित करना था। नीति में सार्वजनिक शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत व्यय करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन 2026 तक यह आंकड़ा अभी भी लगभग 2.9-3 प्रतिशत के आसपास ही है। इससे बुनियादी ढांचा विकास, शिक्षक क्षमता निर्माण और डिजिटल विस्तार प्रभावित हो रहा है।
देशभर में शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई है। संसद में प्रस्तुत आंकड़ों और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, प्राथमिक स्तर पर लाखों पद खाली हैं, जबकि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर रिक्तियां और बढ़ रही हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में यह समस्या और गंभीर है, जहां शिक्षक-छात्र अनुपात प्रभावित हो रहा है। कई शिक्षक अनुबंधित या अपर्याप्त प्रशिक्षित हैं, जिससे NEP की नई शिक्षण पद्धतियों—अनुभव-आधारित सीखना, समस्या-समाधान का क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण हो गया है।
बुनियादी ढांचे की स्थिति भी चिंताजनक है। ग्रामीण स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय और स्थिर इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमी डिजिटल डिवाइड को बढ़ा रही है। NEP में बहु-भाषी शिक्षा और मातृभाषा में शिक्षण पर जोर दिया गया है, लेकिन पाठ्यपुस्तकों, प्रशिक्षित शिक्षकों और क्षेत्रीय विविधता को ध्यान में रखते हुए मानकीकरण की चुनौती बनी हुई है। कई राज्यों में, विशेषकर दक्षिण भारत में, तीन-भाषा फॉर्मूला और कुछ प्रावधानों पर विरोध या आंशिक स्वीकार्यता देखी जा रही है।
उच्च शिक्षा में भी चुनौतियाँ समान हैं। लचीले प्रवेश-निकास विकल्प , क्रेडिट बैंक और बहु-विषयी पाठ्यक्रमों को लागू करने में संसाधनों और शिक्षक प्रशिक्षण की कमी बाधक बन रही है। डिजिटल कनेक्टिविटी और उपकरणों की उपलब्धता ग्रामीण तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक नहीं पहुंच पा रही है।
उत्तर प्रदेश, जहां शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ी संख्या में बच्चे प्रभावित होते हैं, NEP 2020 को चरणबद्ध तरीके से लागू कर रहा है। 2026-27 के बजट में शिक्षा क्षेत्र को महत्वपूर्ण बढ़ोतरी दी गई है—बुनियादी शिक्षा के लिए 77,622 करोड़ रुपये, माध्यमिक शिक्षा के लिए 22,167 करोड़ रुपये (15 प्रतिशत वृद्धि) और उच्च शिक्षा के लिए 6,591 करोड़ रुपये प्रस्तावित हैं। व्यावसायिक शिक्षा पर फोकस बढ़ाते हुए UP बोर्ड ने 2026-27 सत्र से कक्षा 9 और 11 में व्यावसायिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया है। यह कदम NEP के स्किल डेवलपमेंट लक्ष्य से मेल खाता है।
हाल ही में लखनऊ में आयोजित एजुकेशन कॉन्क्लेव 2026 में 'योगी मॉडल' ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा। फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेरसी (FLN), अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन, AI और एडटेक के उपयोग, निरंतर मूल्यांकन और शिक्षक सशक्तिकरण पर जोर दिया गया। राज्य सरकार स्मार्ट स्कूलों का विस्तार, मुख्यमंत्री मॉडल कंपोजिट स्कूल और अभ्युदय कोचिंग जैसी पहलों पर काम कर रही है।
फिर भी, UP में भी शिक्षक रिक्तियां (लगभग 1.93 लाख से अधिक), स्कूल मर्जर की प्रक्रिया और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी चर्चा में रहती है। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में नामांकन अभी कम है, जो दर्शाता है कि जागरूकता और बुनियादी ढांचे पर और काम की जरूरत है।
NEP के छठे वर्ष में हम एक मोड़ पर खड़े हैं। जहां नीति की दिशा सही है, वहीं क्रियान्वयन की गति और गुणवत्ता बढ़ाना अनिवार्य है। यदि इन चुनौतियों का समाधान नहीं किया गया, तो लाखों युवाओं का भविष्य प्रभावित होगा। सरकारों, शिक्षाविदों और समाज को मिलकर इस 'शिक्षा क्रांति' को वास्तविकता बनाने की जरूरत है।
शिक्षा राष्ट्र का भविष्य है। नई शिक्षा नीति 2020 को मात्र नीति-पत्र नहीं, बल्कि जन-आंदोलन बनाना होगा। बजट बढ़ोतरी और राज्य-स्तरीय पहलें सराहनीय हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव तभी दिखेगा जब हर स्कूल में योग्य शिक्षक, उचित बुनियादी ढांचा और छात्र-केंद्रित वातावरण उपलब्ध होगा। समय अब प्रतीक्षा का नहीं, त्वरित और प्रभावी कार्रवाई का है।


Comments