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जब मोहल्ले का कर्जदार पंच बन जाए
कहीं से कुछ बिलियन डॉलर का 'जुगाड़' हो जाए, चाहे वह शांति की दलाली से आए या किसी नए कर्ज से
आजकल अंतरराष्ट्रीय राजनीति की फिजाओं में एक अजीब सी 'खुशबू' तैर रही है। कूटनीति के बाजार में एक नया 'स्टार्टअप' खुला है, जिसका नाम है—"शांति मेडिएशन सेंटर"। जी हां, वही जो कल तक वर्ल्ड बैंक की दहलीज पर 'कटोरा-डेमोक्रेसी' का सबसे बड़ा ब्रांड एंबेसडर था, आज विश्व शांति का 'ठेकेदार' बनकर उभरा है। उसे दो देशों के बीच सुलह करवाने की ऐसी ललक जागी है, जैसे मोहल्ले का वो शख्स, जिस पर खुद राशन वाले का उधार बाकी हो, लेकिन वो अंबानी और अडानी के बीच जायदाद का बंटवारा करवाने की जिद्द ठाने बैठा हो।
इस 'मध्यस्थता के गुरुर' को देखकर समझ नहीं आता कि यह कूटनीति है या 'अस्तित्व बचाने की छटपटाहट'। घर में आटे के लिए कतारें लगी हैं, लेकिन दुनिया के मंच पर 'शांति दूत' का गाउन पहनकर ऐसे घूम रहे हैं जैसे सारा विश्व इनके 'होरमोज़ जलडमरूमध्य' वाले ज्ञान का प्यासा हो। असल में, जब जेब खाली हो और साख 'ग्रे-लिस्ट' वाली, तो आदमी अक्सर बड़ी-बड़ी बातें करता है ताकि कोई उसे गलती से 'महत्वपूर्ण' समझ ले। यह तो वही बात हुई कि आप अपनी बाइक में पेट्रोल डलवाने के पैसे नहीं रखते, लेकिन फॉर्मूला-1 रेस के आयोजक बनने का दावा कर रहे हैं।
इधर सरहद के इस पार, हमारे अपने विपक्षी दिग्गजों की नींद उड़ी हुई है। उन्हें इस बात का गम नहीं कि पाकिस्तान के पास खाने को नहीं है, बल्कि उन्हें इस बात की 'टेंशन' है कि अमेरिका ने पाकिस्तान के फोन रिसीव कैसे कर लिए! विपक्ष के गलियारों में सन्नाटा कम और 'हाहाकार' ज्यादा है। जयराम बाबू और राहुल जी को लगता है कि पाकिस्तान का 'ब्रोकर' बनना मोदी जी की विदेश नीति का 'फ्लॉप शो' है। विपक्षी तर्क बड़े निराले हैं : "देखिए!
हमने तो पाकिस्तान को आइसोलेट किया था, लेकिन मोदी जी के रहते वो तो पंचायती कर रहा है! यह तो हमारी कूटनीतिक हार है!" वाह! यानी अगर पड़ोस का गुंडा जेल से छूटकर मोहल्ले की लड़ाई सुलझाने का नाटक करे, तो दोष पुलिस का है कि उसने गुंडे को सुधारने के बजाय उसे 'एक्टर' बनने का मौका क्यों दिया? विपक्ष की व्याकुलता ऐसी है कि मानो वे चाहते हों कि जो भी पाकिस्तान बोले, पहले साउथ ब्लॉक से 'अनापत्ति प्रमाणपत्र' लेकर बोले।
वहीं मोदी जी की विदेश नीति का अपना ही टशन है। उधर पाकिस्तान मध्यस्थता की फाइलें दबाए इस्लामाबाद में चाय की प्यालियां खड़का रहा है, और इधर भारत 'ऑपरेशन सिंदूर' और 'पहलगाम' के बाद वाले तेवरों के साथ अपनी चाल चल रहा है। भारत का स्टैंड साफ है - "हम दलाल नहीं, खिलाड़ी हैं।"
विपक्ष इसे 'हगलोमेसी' का अंत कह रहा है, तो सरकार इसे 'रणनीतिक धैर्य' बता रही है। जयशंकर साहब की कड़क अंग्रेजी और तीखे कटाक्षों ने पाकिस्तान की मध्यस्थता को 'पुरानी शराब, नई बोतल' करार दे दिया है। विपक्ष को डर है कि कहीं 'विश्वगुरु' का तमगा सरककर इस्लामाबाद न चला जाए, जबकि हकीकत यह है कि इस्लामाबाद तो खुद इस खोज में है कि कहीं से कुछ बिलियन डॉलर का 'जुगाड़' हो जाए, चाहे वह शांति की दलाली से आए या किसी नए कर्ज से।
कुल मिलाकर, पाकिस्तान की यह मध्यस्थता वैसी ही है जैसे किसी फटे हुए गुब्बारे में जबरदस्ती हवा भरना। बाहर से गोल दिख रहा है, पर हवा कभी भी निकल सकती है। और रही बात हमारे विपक्ष की, तो उनकी हालत उस छात्र जैसी है जिसे इस बात का दुख नहीं कि वह खुद फेल हो गया, बल्कि इस बात की चिड़ है कि पड़ोस वाला 'नकलची' लड़का मॉनिटर कैसे बन गया। दुनिया देख रही है—एक तरफ 'शक्ति' का मौन है, दूसरी तरफ 'मजबूरी' का शोर। और बीच में खड़ा पाकिस्तान सोच रहा है, "शांति तो करवा दी, अब क्या कोई बिल का भुगतान करेगा?"
डॉ स्नेहलता श्रीवास्तव


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