गर्मी की मार, गिरता जनस्वास्थ्य: आखिर कब जागेगी नीति-व्यवस्था?

छाया भी लूट ली गई: देश चलाने वाले हाथ अब जल रहे हैं, तपता भारत, टूटता स्वास्थ्य: क्या स्वास्थ्य आपातकाल की जरूरत नहीं?

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तपता हुआ आसमान अब सिर्फ मौसम का मिज़ाज नहींबल्कि एक सुलगता संकट है जो हमारी सांसोंश्रम और अस्तित्व को चुपचाप निगल रहा है। आसमान की तीखी तपिश एक अदृश्य आपदा बन चुकी हैजिसने भारत में जीवन के संतुलन को डगमगा दिया है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में गर्मी अब सहनशीलता की सीमा नहींबल्कि सीधे स्वास्थ्य पर प्रहार करने वाली ताकत बन गई है। बढ़ती हीटवेव की आवृत्ति और तीव्रता साफ दिखाती है कि यह अस्थायी नहींबल्कि स्थायी और गहराता संकट है। ऐसे में इसे केवल पर्यावरण का मुद्दा मानना भूल होगीइसे सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में स्वीकार करना अब न केवल आवश्यकबल्कि अपरिहार्य हो गया है।

इस उभरते संकट की सबसे निर्मम मार उसी विशाल अनौपचारिक श्रमबल पर पड़ रही हैजो देश की अर्थव्यवस्था की धुरी हैफिर भी नीतिगत प्राथमिकताओं में हाशिये पर रहता है। भारत में अनौपचारिक क्षेत्र के करीब 12.8 करोड़ कार्यकर्ता—निर्माण स्थलों की धूलसड़कों की तपिशबाजारों की भीड़ और डिलीवरी के चक्र में जुटे मजदूर—खुले आसमान के नीचे बिना सुरक्षा के काम करने को विवश हैं। उन्हें न पर्याप्त छाया मिलती हैन स्वच्छ व ठंडे पानी की नियमित उपलब्धताऔर न ही स्वास्थ्य सुरक्षा का भरोसेमंद तंत्र। यह विडंबना है कि जो हाथ देश की प्रगति को गति देते हैंवही जलवायु संकट के सामने सबसे अधिक असहाय और असुरक्षित हैं।

स्वास्थ्य के मोर्चे पर बढ़ती गर्मी के दुष्प्रभाव अब गहरेव्यापक और चिंताजनक रूप ले चुके हैं। ऊंचा तापमान हृदय संबंधी बीमारियों से होने वाली मौतों के खतरे को बढ़ा रहा हैवहीं गर्भवती महिलाओं में समय से पहले प्रसव का जोखिम 15-16 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। निर्जलीकरणअत्यधिक थकावटगुर्दे की खराबी और मांसपेशियों में ऐंठन जैसे लक्षण अब अपवाद नहींबल्कि रोजमर्रा की सच्चाई बनते जा रहे हैं। जो आंकड़े सामने आते हैंवे इस संकट की केवल ऊपरी परत दिखाते हैंअसल तस्वीर कहीं अधिक भयावह हैजहां अनगिनत पीड़ाएं और मामले बिना दर्ज हुए चुपचाप दब जाते हैं।

गर्मी का प्रभाव अब केवल शरीर की सहनशक्ति तक सीमित नहीं रहायह बीमारियों की प्रकृतिउनकी गति और उनके फैलाव की दिशा तक को बदल रहा है। तापमान में निरंतर वृद्धि और वर्षा के अस्थिर पैटर्न ने मच्छरों के जीवनचक्र को इस तरह परिवर्तित किया है कि डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियां तेजी से नए भूभागोंयहां तक कि हिमालयी क्षेत्रों में भी पैर पसार रही हैं। जो संक्रमण कभी सीमित भौगोलिक दायरों में बंधे थेवे अब उन क्षेत्रों में भी उभर रहे हैं जहां पहले उनका नामोनिशान तक नहीं था। इस बदलाव ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर असामान्य दबाव डाल दिया हैजबकि पहले से ही वंचित और कमजोर समुदाय और अधिक खतरे में आ गए हैं।

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आर्थिक मोर्चे पर भी यह संकट अदृश्य चोट की तरह गहरा असर डाल रहा है। लैंसेट काउंटडाउन 2025 के अनुसार 2024 में गर्मी ने भारत से करीब 247 बिलियन श्रम घंटे छीन लिएजिससे लगभग 194 बिलियन डॉलर की आय हानि हुई। 2030 तक गर्मी से 34 मिलियन पूर्णकालिक नौकरियां प्रभावित होने का अनुमान है। बढ़ती गर्मी ने श्रम उत्पादकता को इस हद तक प्रभावित किया है कि काम की रफ्तार धीमी पड़ रही हैजिससे मजदूरों की कमाई घट रही है और देश की आर्थिक प्रगति भी बाधित हो रही है। अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों की स्थिति सबसे अधिक दयनीय हैजहां बीमारी के दौरान विश्राम या आय-सुरक्षा जैसी कोई व्यवस्था नहीं होतीइसलिए वे मजबूरी में काम जारी रखते हैं और अपनी सेहत को और गहरे संकट में धकेलते जाते हैं।

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इसके बावजूदनीति स्तर पर यह संकट अब भी अपेक्षित प्राथमिकता हासिल नहीं कर पाया है। हीटवेव को अभी राष्ट्रीय आपदा का दर्जा नहीं मिला हैजिसके कारण राहतपुनर्वास और मुआवजे की व्यवस्था सीमित और धीमी बनी हुई है। नतीजतनसबसे अधिक प्रभावित वर्ग ही सबसे कम संरक्षित रह जाता है। यदि जलवायु परिवर्तन को सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया जाएतो संसाधनों का अधिक प्रभावी और त्वरित आवंटन संभव होगानिर्णय प्रक्रिया में तेजी आएगी और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन मजबूत होगा। यह कदम औपचारिकता नहींबल्कि ठोस और निर्णायक बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकता है।

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समाधान के स्तर पर अब आधे-अधूरे उपायों से आगे बढ़कर ठोस और व्यापक कार्रवाई की जरूरत है। अनौपचारिक मजदूरों के लिए हीट-सेफ्टी कानून लागू करनाहर कार्यस्थल पर छाया और स्वच्छ पानी की अनिवार्य उपलब्धता सुनिश्चित करनातथा काम के घंटों को तापमान के अनुसार वैज्ञानिक ढंग से पुनर्निर्धारित करना बेहद जरूरी है। शहरी इलाकों में हरित क्षेत्र बढ़ानासुलभ कूलिंग सेंटर विकसित करना और जलवायु-लचीला स्वास्थ्य ढांचा तैयार करना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होंगे। साथ हीजागरूकता अभियानों को मजदूरों की भाषापरिस्थितियों और जरूरतों के अनुरूप ढालना अनिवार्य हैताकि ये उपाय वास्तव में प्रभावी बन सकें।

अब निर्णय की घड़ी आ चुकी है—यह मानने की कि जलवायु परिवर्तन कोई दूर का खतरा नहींबल्कि हमारे वर्तमान का सख्त और तेजी से विकराल होता सच है। इसकी तपिश अब केवल मौसम तक सीमित नहींबल्कि जीवनस्वास्थ्य और आजीविका के हर पहलू को झुलसा रही है। यदि इसे समय रहते सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में स्वीकार कर ठोस और साहसिक कदम नहीं उठाए गएतो इसके परिणाम और अधिक भयावह और व्यापक होंगे। यह लड़ाई केवल पर्यावरण बचाने की नहींबल्कि मानव जीवनसामाजिक न्याय और आर्थिक स्थिरता को सुरक्षित रखने की है—और अब इस सवाल को टालनादरअसलभविष्य को खतरे में डालना होगा।

 प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

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