मील का पत्थर साबित होगा नारी शक्ति वंदन अधिनियम 

नई जनगणना होगी और उसके आधार पर सीटों का नया चंटवारा यानी परिसीमन होगा

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मनोज कुमार अग्रवाल 
 
नारी शक्ति वंदन अधिनियम आज लोकसभा के पटल पर चर्चा के लिए रख दिया गया है। यह भारत की महिलाओं के उत्थान के लिए मील का पत्थर साबित होगा। देश की राजनीति और भविष्य निर्माण में महिलाओं की भूमिका हमेशा से उल्लेखनीय रही है। भारतीय संविधान सभा में कुल 15 महिला सदस्य थीं। इन महिलाओं ने संविधान के मसौदे को तैयार करने और देश के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। संविधान सभा के बाद महिलाओं ने संसद में भी एंट्री ली। भारतीय लोकतंत्र के सात दशकों के सफर में संसद की संरचना में कई बदलाव आए हैं, लेकिन अब एक बड़ा बदलाव अंतिम चरण में है।
 
यदि महिलाएं सशक्त देती हैं और देश के शासन-प्रशासन में उनकी भागीदारी बढ़ती है, तो हमारे लोकतंत्र और समाज के लिए इससे बेहतर भला और क्या होगा। आधी आबादी को उनका हक मिलना सिर्फ न्याय नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रगति के लिए अनिवार्य है। लेकिन जब हम महिला आरक्षण से जुड़े हालिया घटनाक्रमों और इसके कानूनी पेचीदगियों को देखते हैं, तो साफ नजर आता है कि सरकार की मंशा इस मुद्दे पर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
 
ऐसा लगता है कि इसे वास्तविक सशक्तिकरण के बजाय एक राजनीतिक हथियार के तौर पर अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। इस कानून की सबसे बड़ी और बुनियादी कमी इसका शतों में बंधा होना है। सरकार ने बिल तो पास कर दिया, लेकिन इसके साथ एक ऐसी शतं जोड़ दी जिसने इसे फिलहाल एक भविष्य का वादा बनाकर खेड़ दिया है। कानून के मुताबिक, आरक्षण तभी लागू होगा जब नई जनगणना होगी और उसके आधार पर सीटों का नया चंटवारा यानी परिसीमन होगा।
 
नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के माध्यम से लोकसभा में महिलाओं को मिलने वाला 33 प्रतिशत आरक्षण केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि उस असमानता को दूर करने का प्रयास है जो 1952 से लगातार चली आ रही है। लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ती रही है, हालांकि यह अब भी संतोषजनक स्तर तक नहीं पहुंची है। पहली लोकसभा में 22 महिलाएं चुनी गई थीं, जो कुल सदस्यों का 4.4 प्रतिशत थीं।
 
इसके बाद 1957 की दूसरी लोकसभा में यह संख्या बढ़कर 27 (5.4 प्रतिशत) हो गई और 1962 की तीसरी लोकसभा में 34 महिलाएं (6.7 प्रतिशत) सदन तक पहुंचीं।चौथी लोकसभा में यह संख्या थोड़ी घटकर 31 (5.9 प्रतिशत) रह गई, जबकि पांचवीं लोकसभा में केवल 22 महिलाएं (4.2 प्रतिशत) ही चुनी गईं। इसके बाद छठी लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी और कम होकर 19 (3.4 प्रतिशत) रह गई, लेकिन सातवीं लोकसभा में यह फिर बढ़कर 28 (5.1 प्रतिशत) हो गई।
 
आठवीं लोकसभा में महिलाओं की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई और 44 महिलाएं (8.11 प्रतिशत) चुनी गईं। हालांकि नौवीं लोकसभा में यह संख्या फिर घटकर 28 (5.3 प्रतिशत) रह गई, जबकि दसवीं लोकसभा में 36 महिलाएं (7 प्रतिशत) सांसद बनीं। इसके बाद 11वीं लोकसभा में 40 महिलाएं (7.4 प्रतिशत) और 12वीं लोकसभा में 44 महिलाएं (8 प्रतिशत) चुनी गईं। 13वीं लोकसभा में यह आंकड़ा बढ़कर 48 (8.8 प्रतिशत) हुआ, जबकि 14वीं लोकसभा में 45 महिलाएं (8.1 प्रतिशत) संसद पहुंचीं।
 
15वीं लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी पहली बार दो अंकों में पहुंची, जब 59 महिलाएं (10.9 प्रतिशत) सांसद बनीं। 16वीं लोकसभा में यह संख्या और बढ़कर 62 हो गई, जो कुल संख्याबल का लगभग 11 प्रतिशत है। वहीं, 2019 की 17वीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 78 रही जो कुल सांसदों का 14.3 प्रतिशत थी। वर्तमान 18वीं लोकसभा में मामूली बदलाव के साथ यह संख्या 74 पर है, जो पिछली बार से कम है।
 
वर्तमान 18वीं लोकसभा में मामूली बदलाव के साथ यह संख्या 74 पर है, जो पिछली बार से कम है। कुल मिला कर यह वृद्धि सुखद तो है, लेकिन भारत की उस आधी आबादी की आकांक्षाओं के सामने नाकाफी है, जो देश के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने में बराबर की हिस्सेदार है। हालांकि, साल 2026 की जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन ने महिला आरक्षण की राह को और अधिक स्पष्ट कर दिया है।
 
सरकार की नई योजना के अनुसार भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 की जा सकती है। इसमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, क्योंकि सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम लागू करने जा रही है। कानून के आने से ऐसा पहली बार होगा जब भारतीय संसद में महिला सांसदों की संख्या एक साथ लगभग 200 की बढ़त दर्ज करेगी।
 
महिला आरक्षण के लागू होने से केवल संख्या बल नहीं बदलेगा, बल्कि विधायी प्रक्रिया और नीति-निर्माण के मुद्दों में भी व्यापक बदलाव आने की उम्मीद है। शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सुरक्षा जैसे विषयों पर सदन के भीतर अब और अधिक प्रखर और संवेदनशील बहसें देखने को मिलेंगी।जानकारों का मानना है कि इस लंबी प्रक्रिया के कारण यह आरक्षण 2029 या शायद 2034 तक खिंच सकता है। सवाल यह उठता है कि अगर नीयत साफ थी, तो इसे तुरंत मौजूदा सीटों पर ही क्यों लागू नहीं किया गया?
 
जनगणना और परिसीमन जैसी उलझी हुई प्रक्रियाओं के साथ जोड़कर सरकार ने इसे एक ऐसे रास्ते पर डाल दिया है, जिसकी मंजिल का फिलहाल कोई पता नहीं है। जैसे ही सरकार सीटों के नए बंटवारे की बात करती है, दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता बढ़ जाती है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने पिछले कई सालों में जनसंख्या को काबू करने के लिए बहुत अच्छा काम किया है। अब तकनीकी दिक्कत यह है कि यदि सीटों का फैसला केवल आबादी के आधार पर होता है, तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की लोकसभा सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी और दक्षिण का राजनीतिक बजन कम हो जाएगा।
 
आंकड़ों के हिसाब से देखें तो उत्तर भारत के कुछ राज्यों में सीटें अस्सी प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं, जबकि दक्षिण में यह बढ़ोतरी बहुत कम होगी। दक्षिण के राज्यों का कहना है कि उन्हें अच्छा काम करने की सजा दी जा रही है। सरकार ने इस क्षेत्रीय विवाद को सुलझाने का कोई पका रास्ता बताए बिना ही महिला आरक्षण को सीटों के बंटवारे से जोड़ दिया। इससे यह डर पैदा हो गया है कि महिलाओं को हक देने के नाम पर कहीं देश के अलग-अलग हिस्सों के बीच का तालमेल ही न बिगड़ जाए। इस बिल की एक और बड़ी व्यावहारिक चिंता प्रॉक्सी संस्कृति और रसूखदार राजनीतिक घरानों का कब्जा है।
 
इसे आसान भाषा में समों तो यह नाम महिला का और काम पुरुष का वाली स्थिति है। गाँवों की पंच्चायतों में हमने अक्सर देखा है कि महिला चुनाव तो जीत जाती है, लेकिन दफ्तर में उसके पति, पिता या भाई बैठते हैं और सारे फैसले बही लेते हैं। इसे ही पति-सरपंच संस्कृति कहा जाता है। अब डर यह है कि विधानसभा और संसद में भी यही होगा। राजनीतिक पार्टियां जमीन से जुड़ी संघर्षशील महिलाओं के बजाय उन्हीं महिलाओं को टिकट देंगी जो पहले से ताकतवर राजनीतिक परिवारों से आती हैं। यानी एक आम महिला के लिए संसद के दरवाजे अभी भी बंद रह सकते हैं, क्योंकि आज के दौर में चुनाव लड़ना बहुत महंगा हो चुका है और महिलाओं के पास अपने खर्च के लिए पैसे नहीं होते।
 
बिना सरकारी मदद या चुनावी खर्च में छूट के, यह आरक्षण केवल अमीर वर्ग की महिलाओं तक सिमट कर रह जाएगा।गौरतलब है कि आज से लोकसभा सभा का तीन दिवसीय विशेष सत्र शुरू हो रहा है। इस दौरान केंद्र सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर चर्चा कर इसे लागू करेगी। इसके लागू होने के बाद 2029 की लोकसभा में संसद में महिला सांसदों की संख्या 273 तक पहुंचने की उम्मीद है। यह आरक्षण केवल सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के निर्माण में महिलाओं की बराबरी की दावेदारी का प्रमाण है।

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