हाईकोर्ट ने पाक्सो के आरोपी को किया बरी, कहा– नाबालिग अपनी मर्जी से गई थी, परिस्थितियां देखना भी जरूरी

कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा

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ब्यूरो प्रयागराज- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुंगेली जिले से जुड़े एक चर्चित POCSO मामले में अहम फैसला सुनाते हुए बड़ा संदेश दिया है. कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी मामले में केवल पीड़िता की उम्र को आधार बनाकर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि पूरे घटनाक्रम, साक्ष्यों और परिस्थितियों का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी है. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को असंगत मानते हुए आरोपी दीपक वैष्णव को बरी कर दिया. कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा.

यह मामला 13 सितंबर 2022 का है. मुंगेली जिले की एक नाबालिग लड़की स्कूल जाने के लिए घर से निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी. काफी तलाश के बाद भी जब उसका कोई पता नहीं चला तो पिता ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई. शिकायत में आशंका जताई गई कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया है.

मामले की सुनवाई के बाद विशेष POCSO कोर्ट, मुंगेली ने आरोपी दीपक वैष्णव को IPC की धारा 363 और 366 के साथ-साथ POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी माना था. ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को गंभीर अपराध का दोषी ठहराते हुए 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी.

हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि पीड़िता और आरोपी के बीच पहले से संपर्क था. दोनों के बीच फोन पर बातचीत होती थी और लड़की ने खुद अपनी इच्छा से आरोपी के साथ जाने का फैसला किया. दोनों ने मुंगेली, रायपुर, हैदराबाद और विजयवाड़ा जैसे शहरों की यात्रा की और करीब एक महीने तक साथ रहे. बचाव पक्ष का कहना था कि पूरे मामले में कहीं भी जबरदस्ती, दबाव या लालच के कोई साक्ष्य नहीं हैं.

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वहीं राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि पीड़िता नाबालिग थी, इसलिए उसकी सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं है. आरोपी ने उसे उसके माता-पिता की देखरेख से दूर ले जाकर अपराध किया है, जो सीधे तौर पर POCSO एक्ट के तहत दंडनीय है.

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दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों की गहराई से समीक्षा करने के बाद हाईकोर्ट ने साफ कहा कि “ले जाना” और “साथ जाना” दोनों अलग-अलग बातें हैं. कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि आरोपी ने पीड़िता को जबरदस्ती या धोखे से उसके अभिभावकों की देखरेख से दूर किया. कोर्ट के अनुसार, यदि कोई लड़की खुद अपनी मर्जी से किसी के साथ जाती है, तो केवल इसी आधार पर अपहरण का अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता.

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कोर्ट ने मेडिकल जांच और FSL रिपोर्ट पर भी गौर किया. रिपोर्ट्स में जबरन शारीरिक संबंध या हिंसा के कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिले. इस आधार पर कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों को ठोस साक्ष्यों के साथ साबित करने में विफल रहा है.

अदालत ने पाया कि घटना के समय पीड़िता की उम्र करीब 15 वर्ष 10 माह थी. वह नाबालिग जरूर थी, लेकिन कोर्ट ने यह भी कहा कि हर मामले में केवल उम्र के आधार पर दोष तय नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब परिस्थितियां यह दिखाती हों कि पीड़िता अपनी इच्छा से गई थी और कोई जोर-जबरदस्ती नहीं हुई, तो ऐसे मामलों में विशेष सावधानी बरतना जरूरी है.

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