हनुमान जयंती: भक्ति, शक्ति और समर्पण का अद्भुत संगम

वे शिव के ग्यारहवें रुद्र अवतार माने जाते हैं, जिनका जन्म पवन देव के आशीर्वाद से हुआ, इसलिए वे पवनपुत्र कहलाए

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महेन्द्र तिवारी

हनुमान जयन्ती का पावन पर्व हिंदू धर्मानुयायियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी उत्सव है। यह दिन भगवान श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता हैजो शक्तिभक्तिनिष्ठा और त्याग के प्रतीक हैं। यह पर्व हर वर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता हैऔर वर्ष 2026 में यह 2 अप्रैल को है। हनुमान जी का चरित्र अद्भुत हैक्योंकि वे एक ओर असीम बल के स्वामी हैं तो दूसरी ओर विनम्रता की प्रतिमूर्ति। वे शिव के ग्यारहवें रुद्र अवतार माने जाते हैंजिनका जन्म पवन देव के आशीर्वाद से हुआइसलिए वे पवनपुत्र कहलाए।

उनके जन्म की कथा अत्यंत प्रेरणादायक हैजिसमें माता अंजना की तपस्या और भगवान शिव का वह अंश समाहित है जो संसार को बुराइयों से मुक्ति दिलाने के लिए अवतरित हुआ। हनुमान जी के बचपन की वह कथा आज भी बच्चों से लेकर वृद्धों तक के मन में रोमांच भर देती हैजब उन्होंने सूर्य देव को एक लाल फल समझकर निगलने का प्रयास किया था। यह घटना उनके उस अदम्य साहस और अलौकिक क्षमता का प्रतीक हैजो सीमाओं से परे है।

इंद्र के वज्र प्रहार से उनकी ठुड्डी पर लगी चोट ने उन्हें 'हनुमाननाम दियालेकिन उसी क्षण देवताओं द्वारा मिले वरदानों ने उन्हें अपराजेय बना दिया। ब्रह्मा जी ने उन्हें लंबी आयु का वरदान दियातो अग्नि ने उन्हें आग से न जलने का और वरुण ने जल से सुरक्षित रहने का आशीष दिया। ये वरदान केवल व्यक्तिगत सिद्धियाँ नहीं थींबल्कि भविष्य में होने वाले धर्म और अधर्म के युद्ध की तैयारी थी। हनुमान जयंती पर जब हम उनके जीवन का स्मरण करते हैंतो उनकी शिक्षा-दीक्षा का प्रसंग भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने सूर्य देव से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया और व्याकरण में इतनी निपुणता हासिल की कि वे 'महाव्याकरणकहलाए। उनका व्यक्तित्व बल और बुद्धि के विलक्षण समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है।

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रामचरितमानस और रामायण में हनुमान जी की भूमिका एक ऐसे सेतु की तरह हैजो विरक्त को अनुराग से और भक्त को भगवान से जोड़ती है। ऋष्यमूक पर्वत पर जब उनकी भेंट श्री राम से हुईतो वह मिलन इतिहास का सबसे पवित्र मिलन बन गया। एक साधारण वानर के वेश में वे अपने प्रभु के पास गएलेकिन राम की पारखी नजरों ने पहचान लिया कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। इसके बाद हनुमान जी का पूरा जीवन राममय हो गया। हनुमान जयंती के इस अवसर पर उनके द्वारा किए गए अद्भुत कार्यों का विश्लेषण करना आवश्यक है।

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समुद्र लांघने की उनकी क्षमता हमें सिखाती है कि यदि आत्मविश्वास दृढ़ होतो सौ योजन का विशाल सागर भी छोटा पड़ जाता है। लंका में अशोक वाटिका के भीतर माता सीता की खोज करना और उन्हें प्रभु राम की मुद्रिका देना उनके धैर्य और बुद्धिमानी की पराकाष्ठा थी। उन्होंने लंका दहन के माध्यम से रावण के अहंकार की लंका को भस्म कियाजो यह संदेश देता है कि अधर्म कितना ही शक्तिशाली क्यों न होसत्य की एक लौ उसे राख करने के लिए पर्याप्त है।

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हनुमान जी का 'सुंदरकांडकेवल एक अध्याय नहीं हैबल्कि वह जीवन के हर मोड़ पर हार रहे मनुष्य के लिए विजय का मंत्र है। लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा के लिए जब वे द्रोणागिरि पर्वत उठाने गएतो वे केवल एक जड़ी-बूटी नहीं लाएबल्कि उन्होंने सिद्ध कर दिया कि श्रद्धा के मार्ग पर असंभव शब्द का कोई स्थान नहीं है। यदि औषधि की पहचान नहीं हो सकीतो उन्होंने पूरे पर्वत को ही उठा लिया—यह उनके निर्णय लेने की क्षमता और कार्य के प्रति अटूट समर्पण को दर्शाता है।

हनुमान जयंती की पूजा विधि और इसमें निहित प्रतीकों का भी गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। भक्त मंदिरों में जाकर हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करते हैं। इसके पीछे वह प्रसिद्ध कथा है जिसमें उन्होंने माता सीता को अपनी मांग में सिंदूर लगाते देखा था और जब उन्हें पता चला कि यह श्री राम की लंबी आयु के लिए हैतो उन्होंने अपने पूरे शरीर पर ही सिंदूर मल लिया। यह निश्छल भक्ति का वह स्वरूप है जहाँ भक्त अपने आराध्य की प्रसन्नता के लिए स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर देता है। हनुमान चालीसा का पाठजो गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हैआज दुनिया के कोने-कोने में गूंजता है। इसकी हर पंक्ति में एक विशेष ऊर्जा है। 'भूत पिशाच निकट नहीं आवैजैसी पंक्तियाँ मनुष्य को अज्ञात भय से मुक्ति दिलाती हैं। हनुमान जयंती पर भंडारों का आयोजन और 'बूंदी के लड्डूका भोग सामाजिक समरसता का प्रतीक हैजहाँ समाज के हर वर्ग के लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।

यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि शक्ति का उपयोग सदैव रक्षा और सेवा के लिए होना चाहिए। हनुमान जी चाहते तो स्वयं रावण का वध कर सकते थेउनमें इतनी सामर्थ्य थीलेकिन उन्होंने सदैव अपने प्रभु की आज्ञा का पालन किया और खुद को एक सेवक के रूप में ही प्रस्तुत किया। उनकी यह विनम्रता आज के आधुनिक युग के लिए एक बहुत बड़ी सीख हैजहाँ थोड़े से अधिकार मिलते ही मनुष्य अहंकार से भर जाता है।

आधुनिक संदर्भ में हनुमान जयंती की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। आज का मनुष्य मानसिक तनावअवसाद और आत्मविश्वास की कमी से जूझ रहा है। हनुमान जी का व्यक्तित्व हमें आत्मविश्वास का पाठ पढ़ाता है। जामवंत जी द्वारा हनुमान जी की सोई हुई शक्ति को याद दिलाना इस बात का प्रतीक है कि हम सबके भीतर अनंत शक्तियाँ छिपी हैंबस हमें एक सही दिशा और आत्मबोध की आवश्यकता है। हनुमान जयंती पर अखाड़ों में होने वाले आयोजन हमें शारीरिक स्वास्थ्य और अनुशासन के प्रति सचेत करते हैं। वे ब्रह्मचर्य के पालक हैंजो इंद्रिय निग्रह और मानसिक एकाग्रता का मार्ग है।

विद्यार्थी जीवन के लिए हनुमान जी का चरित्र आदर्श है क्योंकि वे एक कुशल वक्ताचतुर कूटनीतिज्ञ और एकाग्रचित्त साधक हैं। उनकी पूजा करने से व्यक्ति को केवल धार्मिक लाभ नहीं मिलताबल्कि उसे अनुशासनसमयबद्धता और निष्ठा की भी प्रेरणा मिलती है। हनुमान जी 'अष्टसिद्धि और नवनिधिके दाता हैंलेकिन वे ये सिद्धियाँ केवल उसे प्रदान करते हैं जो धर्म के मार्ग पर अडिग रहता है। वे 'चिरंजीवीहैंजिसका अर्थ है कि वे हर युग में विद्यमान हैं। ऐसी मान्यता है कि जहाँ भी रामकथा होती हैवहाँ हनुमान जी किसी न किसी रूप में अदृश्य रूप से उपस्थित रहते हैं। यह अटूट विश्वास ही भक्तों को कठिन से कठिन समय में भी संबल प्रदान करता है।

हनुमान जयंती का उत्सव भारत के विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता हैजो देश की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है। उत्तर भारत में जहाँ चैत्र पूर्णिमा का महत्व हैवहीं दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में इसे मार्गशीर्ष माह में मनाया जाता है। तमिलनाडु और केरल में इसे 'हनुमत जयंतीके रूप में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। तिथियों के भेद के बावजूदभाव एक ही है उस महाशक्ति की वंदना करना जिसने मानवता को सेवा का नया अर्थ दिया।

इस दिन मंदिरों को भव्य रूप से सजाया जाता हैप्रभात फेरियाँ निकाली जाती हैं और केसरिया ध्वजों से आकाश पट जाता है। 'जय श्री रामऔर 'जय हनुमानके नारों से वातावरण गुंजायमान हो उठता है। यह पर्व केवल हिंदुओं का नहींबल्कि उन सभी का है जो वीरता और सदाचार का सम्मान करते हैं। हनुमान जी का चरित्र संकीर्णताओं से ऊपर उठकर है। वे सुग्रीव जैसे मित्र के प्रति वफादार हैंविभीषण जैसे शरणागत के रक्षक हैं और श्री राम के अनन्य दास हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि रिश्ते कैसे निभाए जाते हैं और संकट के समय अपनों के साथ कैसे खड़ा रहा जाता है।

निष्कर्षतःहनुमान जयंती का यह पावन अवसर हमें आत्म-मंथन के लिए प्रेरित करता है। क्या हम अपने भीतर के डर को जीत पा रहे हैंक्या हम समाज की सेवा के लिए तत्पर हैंक्या हमारी शक्ति दूसरों की भलाई के लिए प्रयुक्त हो रही हैहनुमान जी का पूरा जीवन 'परोपकाराय पुण्यायका जीवंत दस्तावेज है। उनकी भक्ति में कोई शर्त नहीं थीकोई मांग नहीं थी। उन्हें जब विदा करते समय कीमती मोतियों की माला दी गईतो उन्होंने उन्हें दांतों से तोड़कर फेंक दिया क्योंकि उनमें 'रामनहीं दिख रहे थे। ऐसी अनन्य भक्ति ही मनुष्य को साधारण से असाधारण और जीव से शिव बनाती है।

आज के दौर में जब विश्व अनेक चुनौतियों से घिरा हैहनुमान जी का 'बजरंगरूप हमें साहस देता है और उनका 'शांतरूप हमें धैर्य। हनुमान जयंती हमें विश्वास दिलाती है कि यदि हम निष्ठापूर्वक अपने मार्ग पर चलते रहेंतो बाधाएँ चाहे कितनी ही विकट क्यों न होंविजय अंततः हमारी ही होगी। इस दिन हमें केवल दीये नहीं जलाने चाहिएबल्कि अपने भीतर के अंधकार को मिटाने का संकल्प लेना चाहिए।

भगवान हनुमान की कृपा हम सब पर बनी रहे और हम उनके पदचिह्नों पर चलते हुए एक बेहतर समाज और राष्ट्र का निर्माण कर सकेंयही इस जयंती की सच्ची सार्थकता होगी। अंत में यही कहा जा सकता है कि हनुमान जी की महिमा अपार हैवे बुद्धिमानों में अग्रगण्य हैंबलवानों में श्रेष्ठ हैं और भक्तों के हृदय में सदैव निवास करने वाले प्राणस्वरूप हैं। उनकी जयन्ती हमें उस शाश्वत सत्य की याद दिलाती रहती है कि ईश्वर के प्रति समर्पण ही वह एकमात्र चाबी है जिससे मोक्ष और सांसारिक सफलता दोनों के द्वार खुलते हैं।

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