लालगंज पुलिस की कार्यशैली पर उठा सवाल, खूंखार बहरूपिया रमेश चौधरी के सामने नतमस्तक हुआ कानून

गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज होने के बावजूद पुलिस की यह 'लाचारी' क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है।​

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बस्ती। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भले ही अपराधियों के गले में तख्ती लटकाकर सरेंडर कराने का दावा करती हो, लेकिन लालगंज थाना क्षेत्र में कानून की धज्जियां सरेआम उड़ाई जा रही हैं। पत्रकार पर जानलेवा हमला करने वाला मुख्य आरोपी रमेश चौधरी उर्फ 'बहरूपिया' और उसका कुनबा पुलिस की 'मूक सहमति' के चलते आज भी खुलेआम घूम रहा है। गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज होने के बावजूद पुलिस की यह 'लाचारी' क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है।​सत्ता की दलाली और 'बहरूपिया' का नकाब।
आरोपी रमेश चौधरी खुद को भाजपा का बड़ा नेता बताकर रसूख झाड़ता है, जबकि सच्चाई यह है कि पार्टी विरोधी गतिविधियों और संदिग्ध चरित्र के कारण भाजपा इसे काफी पहले ही दूध में से मक्खी की तरह निकाल बाहर कर चुकी है। सफेदपोश नेताओं के साथ पुरानी तस्वीरें दिखाकर यह बहरूपिया न सिर्फ जनता को डराता है, बल्कि पुलिस के आला अधिकारियों पर भी दबाव बनाने का काम कर रहा है।
 
​पत्रकार को मरा समझ नदी किनारे फेंका, रोंगटे खड़े कर देगी दरिंदगी।​घटना की रात रमेश चौधरी ने अपने भाई उमेश चौधरी, राकेश चौधरी और भांजे अंकित चौधरी के साथ मिलकर पत्रकार पर वहशीपन की सारी हदें पार कर दी थीं। लोहे की रॉड और लाठी-डंडों से पीट-पीटकर अधमरा करने के बाद, आरोपी उसे मृत समझकर साक्ष्य मिटाने की नीयत से नदी किनारे फेंककर भाग निकले थे।
 
​CDR में 'खास' मददगारों के चेहरे बेनकाब, फिर भी हाथ खाली।​विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, घटना के समय और उसके बाद रमेश चौधरी के फोन की सीडीआर (CDR) में कई सफेदपोशों और पुलिस के 'करीबियों' के नाम सामने आए हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर वो कौन से रसूखदार 'आका' हैं, जो इस अपराधी को पुलिसिया शिकंजे से बचा रहे हैं? क्या लालगंज पुलिस किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रही है या फिर खाकी की कमान अब अपराधियों के हाथ में गिरवी रख दी गई है?

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