जनसंघर्ष की जीत: राकेश केशरी की मुहिम रंग लाई, ईओ मधुसूदन जायसवाल का प्रत्यावेदन निरस्त

न्यायालय से आदेश के दिन पद पर अस्तित्व नहीं था,प्रत्यावेदन बलहीन स्थानांतरण निरस्त करने का कोई औचित्य नहीं

राजेश तिवारी Picture
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ओबरा नगर पंचायत का मामला

स्वतंत्र प्रभात संवाददाता

सोनभद्र/(ओबरा) / उत्तर प्रदेश-

उत्तर प्रदेश पालिका (केन्द्रीय प्रशासनिक अधीनस्थ सेवा के अधिशासी अधिकारी मधुसूदन जायसवाल के स्थानांतरण प्रकरण में शासन ने महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए उनके द्वारा प्रस्तुत प्रत्यावेदन को निरस्त कर दिया है। यह आदेश दिनांक 24 मार्च 2026 को प्रमुख सचिव नगर विकास विभाग पी. गुरु प्रसाद द्वारा पारित किया गया।प्राप्त जानकारी के अनुसार शासन के कार्यालय ज्ञापन दिनांक 06.01.2026 द्वारा मधुसूदन जायसवाल को नगर पंचायत ओबरा जनपद सोनभद्र से स्वतः कार्यमुक्त करते हुए नगर पंचायत निधौली कला जनपद एटा में स्थानांतरित किया गया था। साथ ही उसी दिनांक को जारी आदेश के माध्यम से नगर पंचायत ओबरा का अतिरिक्त प्रभार अखिलेश सिंह, अधिशासी अधिकारी नगर पंचायत डाला बाजार जनपद सोनभद्र को प्रदान किया गया, जिन्होंने दिनांक 12.01.2026 को कार्यभार ग्रहण कर लिया।

उक्त स्थानांतरण आदेश के विरुद्ध श्री जायसवाल द्वारा मा. उच्च न्यायालय इलाहाबाद में रिट याचिका संख्या ए-879/2026, मधुसूदन जायसवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य, दायर की गई। मा. न्यायालय ने दिनांक 27.01.2026 को आदेश पारित करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता 10 दिनों के भीतर प्रत्यावेदन प्रस्तुत कर सकते हैं, जिसे सक्षम प्राधिकारी द्वारा नियमानुसार विचार कर 10 दिनों में निर्णय लिया जाएगा तथा तब तक सेवा की स्थिति यथावत रखी जाएगी।

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न्यायालय के निर्देश के अनुपालन में श्री जायसवाल द्वारा दिनांक 02.02.2026 को शासन के समक्ष प्रत्यावेदन प्रस्तुत किया गया, जिसमें उन्होंने व्यक्तिगत कठिनाइयों, पारिवारिक परिस्थितियों एवं अपनी पुत्री के शैक्षिक सत्र के आधार पर स्थानांतरण निरस्त करने का अनुरोध किया।

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इस संबंध में शासन द्वारा जिलाधिकारी, सोनभद्र से आख्या मांगी गई। जिलाधिकारी द्वारा दिनांक 11.02.2026 को प्रस्तुत आख्या में उप जिलाधिकारी, ओबरा की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए बताया गया कि श्री जायसवाल को 06.01.2026 को ही कार्यमुक्त किया जा चुका था तथा उनके स्थान पर अखिलेश सिंह कार्यभार ग्रहण कर चुके थे।

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अतः न्यायालय के आदेश दिनांक 27.01.2026 के समय श्री जायसवाल का पद पर अस्तित्व नहीं था।शासन द्वारा यह भी उल्लेख किया गया कि मधुसूदन जायसवाल के विरुद्ध निर्माण कार्यों में अनियमितता, भ्रष्टाचार, आउटसोर्सिंग कर्मचारियों की नियुक्ति एवं निविदा प्रक्रिया में गड़बड़ी तथा नगर पंचायत निधि के दुरुपयोग संबंधी कई गंभीर शिकायतें प्राप्त हुई थीं, जिनकी जांच जिलाधिकारी सोनभद्र को सौंपी गई है। प्रकरण की संवेदनशीलता को देखते हुए उनका स्थानांतरण प्रशासनिक दृष्टि से आवश्यक पाया गया।

शासनादेश दिनांक 06.05.2025 के अनुसार स्थानांतरण नीति 2025-26 के प्रावधानों का भी हवाला दिया गया, जिसमें प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर कभी भी स्थानांतरण किए जाने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त, जनपद एटा में अधिशासी अधिकारियों की कमी तथा सोनभद्र में अपेक्षाकृत अधिक संख्या को भी निर्णय का आधार माना गया।उपरोक्त समस्त तथ्यों के आधार पर शासन ने यह निष्कर्ष निकाला कि श्री जायसवाल का प्रत्यावेदन बलहीन है और उनके स्थानांतरण आदेश को निरस्त किए जाने का कोई औचित्य नहीं है।

अतः प्रत्यावेदन को निरस्त करते हुए प्रकरण का निस्तारण कर दिया गया।इस पूरे प्रकरण में सामाजिक कार्यकर्ता राकेश केशरी द्वारा लगातार उठाई गई जनहित की आवाज और उनके संघर्ष को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप यह निर्णय सामने आया है।राकेश केशरी ने इस निर्णय के लिए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि शासन ने निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ जनहित में कार्य किया है, जो सराहनीय है।

उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपनाकर जनता का विश्वास मजबूत कर रही है। मामले में अभी कार्रवाई जारी रहेगी और जल्द ही इस प्रकरण में और भी बड़ी कार्रवाई होगी जो उत्तर प्रदेश के लिए नजीर बनेगा।

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