युद्ध की विभीषिका से त्रासदीपूर्ण मानवीय जीवन

ईरान-इजराइल और अमेरिकी युद्ध छिड़ जाने से एक बार फिर तीसरे महायुद्ध के बादल मंडराने लग गए हैं।

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दुनिया में किसी भी देश के लिए चाहे वह सत्य के लिए लड़ रहा हो या असत्य के लिए लड़ रहा हो, युद्ध की विभीषिकाएँ कभी भी किसी भी देश के मानवीय जीवन के लिए वरदान साबित नहीं हुई हैं। धर्म और अधर्म के नाम पर दुनिया को महाभारत काल में रक्तरंजित कर लाखों शूरवीरों को लीलने वाला कौरव-पांडवों का दिल दहला देने वाला दारुण युद्ध दुनिया के देशों के सामने सबसे बड़ा उदाहरण है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। आज एक बार फिर दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर खड़ी है। आज दुनिया का हर देश एक-दूसरे की संप्रभुता पर कब्जा कर अपना दबदबा कायम करना चाहता है। ऐसे में विश्व में चारों ओर युद्ध की स्थिति निर्मित हो चुकी है। दुनिया में रूस-यूक्रेन युद्ध वर्षों से बिना नतीजे के अब तक जारी है और हाल ही में डेढ़ सप्ताह से ईरान-इजराइल और अमेरिकी युद्ध छिड़ जाने से एक बार फिर तीसरे महायुद्ध के बादल मंडराने लग गए हैं।

युद्ध की विभीषिका से मध्य पूर्व के देशों की हालत बेहद खराब हो रही है। ईरान में कट्टरपंथी शासन का खात्मा आज का हर आधुनिक सोच का नागरिक चाहता है, लेकिन कट्टरपंथी ताकतों की जड़ें इतनी गहरी जमी हुई हैं कि उसे उखाड़ फेंकने में शूरवीरों और मासूम लोगों की जिंदगी दांव पर लग जाती है। मध्यपूर्व के खाड़ी देशों में तेल के असीम भंडार हैं। दुनिया के देशों की सर्वाधिक तेल आपूर्ति भी खाड़ी देशों से ही होती है। अमेरिका की शुरू से ही तेल भंडारों पर अपना कब्जा जमाए रखने की नीति रही है, इसलिए वह कई खाड़ी देशों में अपने धनबल और बाहुबल के आसरे तेल पर कब्जा किए हुए है । ईरान एक प्रमुख तेल उत्पादक देश होने के साथ समुद्री मार्ग से सटा हुआ है। वर्तमान में इजरायल और अमेरिका मिलकर ईरान के कट्टरपंथी शासन का अंत करने हेतु युद्ध का बिगुल फूंके हुए हैं, जिससे दुनिया भर के देशों में कच्चे तेल और गैस की कमी आना स्वाभाविक है।

    बेशक भारत एक बहुत बड़ा देश है और ईरान युद्ध का भारत पर भी गैस और तेल को लेकर प्रभाव पड़ना सहज है। भारत सरकार द्वारा गैस और तेल की पर्याप्त व्यवस्था के बाद भी देशभर में गैस की किल्लत से जूझते लोग इस बात का प्रतीक हैं कि दूसरे देशों के युद्ध का असर कैसे दुनिया के अन्य देशों के जीवन को प्रभावित करता है। युद्ध की विभीषिका नैतिक पतन, अमानवीयता और अंधी सत्ता-लालसा से उत्पन्न घोर त्रासदीपूर्ण स्थिति होती है, जिसका भय वर्षों बाद भी लोगों के जेहन से जाता नहीं है।

युद्ध न सिर्फ दो देशों या दो राष्ट्राध्यक्षों के बीच लड़ा जाता है, बल्कि युद्ध में दोनों देशों के लोगों और उनकी संपत्ति का भी विनाश होता है। दो देशों के युद्ध की परिणति से कई देशों के आर्थिक-व्यापारिक रिश्तों के साथ मानवीय जनजीवन भी बुरी तरह से प्रभावित होता है। युद्ध तो कुछ दिनों या महीनों में समाप्त होकर रह जाएगा, लेकिन उसकी विभीषिका पूरी एक पीढ़ी के जहन में जीवनभर भयावह खौफ की तरह छाई रह जाती है। युद्ध की विभीषिकाओं से उभरने और सामान्य जीवन जीने में लोगों को पूरी एक जिंदगी लग जाती है। अतः युद्ध किसी भी समस्या का अंतिम हल नहीं है, इसलिए युद्ध को टालना ही आज दुनिया के देशों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

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अरविंद रावल

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